अक्रूर घाट

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अक्रूर घाट / Akrur Ghat

मथुरा से चार मील उत्तर तथा वृन्दावन से एक मील दक्षिण में अक्रूर घाट है। पास में ही अक्रूर गाँव है।

प्रसंग

जिस समय अक्रूर जी नन्दगाँव से श्रीकृष्ण और श्रीबलदेवजी को रथ में बिठाकर मथुरा ला रहे थे, उस समय अक्रूर ने रथ को वहीं रोक दिया। रथपर ही कृष्ण-बलदेव को छोड़कर स्वयं स्नान और सन्ध्या आह्विक करने के लिए यमुनाहृद में उतरे। वे स्नान कर जल में ही अपने उपास्य सनातन ब्रह्म का मन्त्र जपने लगे तथा उनका ध्यान करने लगे। किन्तु, आज उनके ध्यान में अपने इष्ट सनातन ब्रह्म के बदले श्रीराम-कृष्ण के रूप का ही दर्शन हुआ। उधर रथ के ऊपर भी श्रीराम-कृष्ण को देखा। फिर पानी में डुबकी लगाकर राम-कृष्ण को ही देखा। तब उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि ये श्रीराम-कृष्ण ही सनातन पूर्ण-ब्रह्म हैं। गौड़ीय गोस्वामियों ने इस विषय में एक सुन्दर सिद्धान्त की अवतारणा की है। नन्द नन्दन श्रीकृष्ण और रोहिणी नन्दन श्रीराम ब्रज को छोड़कर अन्यत्र कहीं भी नहीं जाते। इसलिए अक्रूर के साथ ब्रज और मथुरा की सीमापर इस अक्रूर घाट तक नन्द नन्दन श्रीकृष्ण और रोहिणी नन्दन श्रीराम आये। तत्पश्चात् वहीं से वे दोनों अप्रकटरूप में ब्रज में ही रहे। इस अक्रूर घाट से अक्रूर के साथ जो रथपर मथुरा गये और वहाँ की लीलाएँ कीं, वे देवकी या वसुदेव नन्दन श्रीबलराम और देवकी या वसुदेव नन्दन श्रीकृष्ण ही थे। यशोदा नन्दन और देवकी नन्दन तत्त्वत: एक ही हैं, फिर भी रस की दृष्टि से इनमें वैशिष्टय वर्तमान है।

Blockquote-open.gif श्री चैतन्य महाप्रभु जब जगन्नाथपुरी से झाड़खण्ड के पथ से वृन्दावन पधारे थे, उस समय वृन्दावन में कोई बस्ती नहीं थी। केवल चारों ओर गभीर वन-ही-वन था। वे रात में अक्रूर घाट में ही वास करते थे। Blockquote-close.gif

दूसरा प्रसंग

एक समय नन्दबाबा ने एकादशी के दिन निर्जल उपवास कर उसी रात में द्वादशी लग जाने पर रात्रिकाल में ही स्नान करने के लिए यमुना में प्रवेश किया। आसुरी बेला में स्नान करने के कारण वरुणदेव के अनुचरों ने श्री नन्दबाबा को पकड़ कर उन्हें वरुण लोक में उपस्थित किया। कुछ ही देर में भगवान् श्रीकृष्ण भी वरुण लोक में पहुँचे। श्री वरुण देव ने सर्वेश्वर श्रीकृष्ण की उपहार के साथ पूजा-अर्चना करके श्री नन्द बाबा को आदरपूर्वक उन्हें समर्पण कर दिया। श्री नन्द बाबा इसे देखकर बड़े ही आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने दूसरे दिन यह घटना ब्रजवासियों को सुनाई। वे लोग भी श्रीकृष्ण से उनके परम-धाम का दर्शन कराने का अनुरोध करने लगे। महाकारूणिक भगवान् ने उन ब्रजवासियों को यही पर अपने सनातन ब्रह्मलोक का दर्शन कराया, जहाँ इससे पूर्व उन्होंने भक्त अक्रूरजी को उनके इष्टदेव का दर्शन कराया था- [1] यहाँ अक्रूर घाट में करोड़ो तीर्थ विद्यमान रहते हैं। सूर्य ग्रहण के समय यहाँ स्नान करने की विधि है। [2] श्री चैतन्य महाप्रभु जब जगन्नाथपुरी से झाड़खण्ड के पथ से वृन्दावन पधारे थे, उस समय वृन्दावन में कोई बस्ती नहीं थी। केवल चारों ओर गभीर वन-ही-वन था। वे रात में अक्रूर घाट में ही वास करते थे। प्रात:काल होने पर वे वृन्दावन में यमुना के किनारे इमलीतला घाट पर बैठकर प्रेम में आविष्ट होकर तृतीय प्रहर तक हरि नाम करते थे। उनके नेत्रों से अविरल अश्रुधारा प्रवाहित होती रहती तथा उनके अंगों में सुदीप्त अष्ट सात्त्विक विकार दृष्टिगोचर होते। उस समय इनके साथ केवल श्री बलभद्र भट्टाचार्य थे। श्री चैतन्य चरितामृत में इस प्रसगं का बड़ा ही हृदयग्राही वर्णन है। यहाँ पर प्राचीनकाल में बृहदसेन राजा के लिए शान्त ऋषि ने यज्ञ करवाया था। अक्रूर घाट का दूसरा नाम ब्रह्मह्रद भी है। क्योंकि कृष्ण ने गोपों को यहाँ ब्रह्म धाम का दर्शन कराया था। अक्रूरजी को भी यहीं पर सनातन पूर्णब्रह्म का दर्शन हुआ था।

यज्ञस्थल

अक्रूर घाट के पास ही माथुर ब्राह्मणों के यज्ञ करने का स्थान है।

प्रसंग

एक समय गोप सखाओं के साथ श्रीकृष्ण कहीं पास ही गोचारण कर रहे थे। भूख लगने पर कृष्ण ने सखाओं को यहीं यज्ञ करने वाले ब्राह्मणों के पास भोज्य-द्रव्य माँगने के लिए भेजा, किन्तु यज्ञ करने में संलग्न भक्ति रहित उन ब्राह्मणों ने उन्हें भोज्य पदार्थ नहीं दिये। सखा लोग तिरस्कृत होकर कृष्ण के पास लौट आये। श्रीकृष्ण ने उन्हें समझा-बुझाकर पुन: ब्राह्मणों की पत्नियों के पास कुछ माँगने के लिए भेजा।

भोजनस्थल या भातरोल गाँव

यहाँ पर कृष्ण ने यज्ञ पत्नियों के द्वारा लाये हुए नाना प्रकार के सुस्वादु अन्न-व्यंजनों का आस्वादन किया था।

प्रसंग

कृष्ण के समझाने-बुझाने से ग्वालबाल यज्ञ पत्नियों के निवास स्थान पर गये और कृष्ण बलदेव के लिए कुछ अन्न माँगा। राम और कृष्ण का नाम सुनते ही यज्ञ पत्नियाँ भाव विह्वल हो गईं। वे थालों में नाना प्रकार के सुस्वादु अन्न-व्यंजन लेकर कृष्ण के दर्शनों के लिए बड़ी उत्कण्ठित होकर चल पड़ीं। अपने पतियों के द्वारा बाधा दिये जानेपर भी वे रूकी नहीं। कुछ याज्ञिक विप्रों ने अपनी पत्नियों को घरों में बलपूर्वक बंद कर दिया। किन्तु वे भी विरह ताप से अपने शरीर को छोड़कर श्रीकृष्ण से जा मिलीं। जब ब्राह्मणियाँ श्रीकृष्ण के निकट पहुँचीं, तब उनका नवीन मेघ के समान श्याम वर्ण रूप देखकर मुग्ध हो गईं। उनके श्याम अंगों पर पीताम्बर स्थिर विद्युत् की भाँति फहरा रहा था।[3] वे कृष्ण का दर्शन कर प्रेम में इस प्रकार आविष्ट हो गईं कि अपने पतियों के पास वापस घर लौटना नहीं चाहतीं थीं। किन्तु कृष्ण के द्वारा समझाये जाने पर किसी प्रकार घर लौटने के लिए तैयार हुईं। उनके घर लौटने पर उनके पतियों के भाव सम्पूर्ण रूप से बदल गये। वे अपने तीन प्रकार के जन्म, विद्या और वैदिक क्रियाओं में अपनी दक्षता आदि को धिक्कार देते हुए अपनी पत्नियों की अलौकिक कृष्णभक्ति की प्रशंसा करने लगे।[4] यहाँ एक विचारणीय विषय है कि इन द्विज-पत्नियों को कृष्ण ने लौटा दिया और वे लौट गईं। किन्तु गोप रमणियाँ कृष्ण की मुरली की तान सुनकर कृष्ण के पास आईं। कृष्ण ने इनको भी अपने पतियों के पास लौट जाने के लिए कहा, किन्तु वे लौटी नहीं। श्रीकृष्ण ने उनके साथ नृत्य और गीतमय रासलीला की। यहाँ प्रश्न हो सकता है कि ऐसा क्यों? क्योंकि, कृष्ण की रास आदि लीलाओं में एकमात्र गोपियों का ही अधिकार है। श्रीकृष्ण का भी ब्रज में गोपवेश और गोप-आवेश रहता है। इसलिए ब्रज में गोपी गर्भजात गोपियों का ही ब्रजेन्द्र नन्दन श्रीकृष्ण की रास आदि तथा निकुंज-लीलाओं में अधिकार है। वैकुण्ठगत लक्ष्मी तथा द्विजपत्नियों का इन निकुंज आदि लीलाओं में अधिकार नहीं है। इसलिए वे लौटा दी गईं। हो सकता है कि बहुत जन्मों तक रागात्मिक गोपियों के आनुगत्य में कठोर आराधना करने पर वे प्रकट ब्रज में गोपी गर्भ से जन्म ग्रहण करें तथा नित्यसिद्ध गोपियों के संग के प्रभाव से कभी निकुंज आदि सेवाओं में अधिकार प्राप्त कर सकें।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. इति सचिंन्त्य भगवान् महाकारूणिको हरि:। दर्शयामास लोकं स्वं गोपानां तमस: परम् ॥
    ते तु ब्रह्महृदं नीता मग्ना: कृष्णेन चौद्धृता:। ददृशुब्रह्मणो लोकं यत्राक्रूरोऽध्यगात् पुरा ॥ (श्रीमद्भ0 10/28/14,16)
  2. विष्णुलोकप्रद तीर्थ मुक्ताक्रूरा प्रदायिने। कृष्णोक्षणप्रसादाय नमस्ते विष्णुरूपिणे ॥ (आदि वाराह पुराण)
  3. श्यामं हिरण्यपरिधिं वनमाल्यबर्हधातुप्रवालनटवेषमनुव्रतांसे।
    विन्यस्तहस्तमितरेण धुनानमब्जं कर्णोत्पलालककपोलमुखाब्जहासम ॥ (श्रीमद्भ0 10/23/22)
  4. दृष्ट्वा स्त्रीणां भगवति कृष्णे भक्तिमलौकिकीम्। आत्मानं च तथा हीनमनुतप्ता व्यगर्हयन् ॥ धिग् जन्म नस्त्रिवृद् विद्यां धिग् व्रतं धिग् बहुज्ञाता। धिक् कुलं धिक् क्रियादाक्ष्यं विमुखा ये त्वधोक्षजे ॥ (श्रीमद्भ0 10/23/38-39)
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