अम्बुवासी मेला

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देवी कामख्या का विश्व प्रसिद्ध मेला
भारत[1] के असम प्रदेश में शक्तिपीठ की आराध्य देवी आदिशक्ति भगवती कामाख्या का हैं। कहते हैं कि योगि मत्स्येन्द्रनाथ ने इस शक्तिपीठ में निवास करके देवी का दर्शन प्राप्त किया था। यहाँ का सबसे बड़ा व्रतोत्सव "अम्बुवाची" नामक व्रत है। नरकासुर नामक राक्षस, देवी कामाख्या से प्रेम कर बैठा। वह उनसे विवाह करना चाहता था। देवी असुर या राक्षस से विवाह नहीं करना चाहती थीं। अतः उन्होंने स्वयं की रक्षा हेतु एक तरक़ीब सोची। उन्होंने नरकासुर के समक्ष एक शर्त रखी कि उसे एक ही रात में देवी का मन्दिर निर्मित करना होगा। नरकासुर मान गया तथा उसने एक ही रात में मन्दिर का निर्माण लगभग पूर्ण कर लिया। इससे देवी व्याकुल हो उठीं तथा इससे पहले की मन्दिर की अन्तिम सीढ़ी बनकर तैयार हो, एक मुर्गें को प्रातः आगमन की सूचना देने भेजा गया। उषा तो अभी हुई नहीं थी। लेकिन मुर्गे की वांग को सुनकर नरकासुर ने सोचा कि सुबह हो गयी है। इससे नरकासुर क्रोधित हो उठा तथा उसने वहीं पर उस मुर्गे की हत्या कर दी। नरकासुर शर्त के अनुसार देवी से विवाह नहीं कर सका। ऐसा विश्वास किया जाता है कि आज का 'कामाख्या मन्दिर' नरकासुर द्वारा निर्मित वह मन्दिर ही है। इसी मन्दिर में अम्बुवासी मेले का आयोजन किया जाता है।

धार्मिक मेला

अम्बुवासी मेला भारत में मनाए जाने वाले अनगिनत धार्मिक मेलों में से एक है। इसे बहुत श्रद्धा व उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस मेले का आयोजन प्रतिवर्ष मानसून ऋतु में कामाख्या मन्दिर में किया जाता है। देश–विदेश से हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु इस मेले में भाग लेने के लिए आते हैं। मेले के अवसर पर अनेक प्रकार के तांत्रिक अनुष्ठान भी आयोजित किए जाते हैं।

शक्तिपीठ

श्रीविष्णु के चक्र से खंडित मृत सती के जो–जो अंग जहाँ–जहाँ पर गिरे थे, वह स्थान शक्तिपीठ कहलाए। असम प्रदेश के इस पहाड़ पर सती के मृतदेह की योनि गिरी थी, अतः यहाँ पर सती योनि की पूजा की जाती है। यहाँ के शक्तिपीठ की आराध्य देवी आदिशक्ति भगवती कामाख्या का हैं। कहते हैं कि योगि मत्स्येन्द्रनाथ ने इस शक्तिपीठ में निवास करके देवी का दर्शन प्राप्त किया था। यहाँ का सबसे बड़ा व्रतोत्सव "अम्बुवाची" नामक व्रत है। यह शक्तिपीठ योनिपीठ है, अतः यहीं पर यह उत्सव मनाया जाता है, अन्य पीठ में नहीं।

तन्त्र शास्त्र की मान्यता

तंत्रशास्त्र में सूर्य के मृगशिरा नक्षत्र में जाने के बाद पहले तीन दिन 'पृथ्वी का रजोदर्शन काल' मानकर उस समय में जुताई करना, बीज बोना आदि कार्य वर्जित किए गए हैं। बंगाल प्रदेश में यह 'रजोदर्शन काल' आषाढ़ कृष्ण दशमी से आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी तक माना जाता है। तब सूर्य आर्द्रा नक्षत्र के प्रथम चरण में होता है। यही काल 'अम्बुवाची' का पर्याय है। तीन दिन (रजोदर्शन) के पूरे होने के बाद चौथे दिन पत्थर को स्नान कराकर भू–माता शुद्ध हुई, ऐसी भावना की जाती है। असम प्रदेश में आषाढ़ शुक्ल पक्ष में देवीमन्दिर का द्वार तीन दिन के बाद बन्द रखा जाता है। कामाख्या देवी ऋतुमती हैं - ऐसी भावना करके किसी भी भक्त को देवी के दर्शन की अनुमति नहीं दी जाती। चौथे दिन प्रातःकाल देवी को सविधि स्नान कराकर तथा वस्त्रालंकारों से सुशोभित करके, देवी दर्शन के लिए मन्दिर का द्वार खोला जाता है। देवी को नैवेद्य निवेदन करके, उनकी आरती के बाद उपस्थित भक्तों को देवी के रजोदर्शन के प्रतीक रूप में लाल रंग के वस्त्र का टुकड़ा प्रसाद रूप में दिया जाता है।

मेले का विशेष आकर्षण

अम्बुवासी मेले में मन्दिर तीन दिन बन्द रहता है। इन्हीं दिनों भक्तगण मन्दिर में एकत्रित होते हैं तथा चौथे शुभ दिन की प्रतीक्षा करते हैं। चौथे दिन ही मन्दिर के भीतर पूजा की अनुमति दी जाती है। साधु–पंडों का यह महान संगम, स्थानीय कथा व कलाकृतियों के अभिनव वितरण व क्रय–विक्रय के बीच होता है। इन दिनों इस स्थान की यात्रा बहुत ही रोचक होती है। पंडितों का श्रद्धालुओं की ओर से मंत्रोच्चारण तथा तीर्थयात्रियों की पूजा–अर्चना और भक्तिभाव से वातावरण विभोर हो उठता है।

तांत्रिक अनुष्ठान

तांत्रिक विधि से की जाने वाली पूजा इस मेले का महत्वपूर्ण अंग है। प्रायः इस समय असम में मानसून अपनी चरम सीमा पर होता है। इस समय सप्ताह भर वर्षा होती है तथा इस प्रकार के प्राकृतिक चमत्कार को स्थानीय भाषा में 'कज़ार' कहते हैं। मान्यताओं के अनुसार, वर्षा धरती को शुद्ध करती है तथा खाद्य उत्पादन के लिए तैयार करती है। प्राचीन विश्वासों के अनुसार इस मेले और वर्षा के उपरान्त ही ग्रीष्म फल ग्रहण करना चाहिए।

देवी भागवत का आख्यान

देवी भागवत पुराण के अनुसार, पार्वती ने बचपन से ही भगवान शिव से विवाह करने का निश्चय कर लिया था। उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अनेक प्रकार के दुष्कर व्रत व कठिन तपस्याएँ की थीं। अन्ततः शिव ने पार्वती की इच्छा स्वीकार की तथा उन्हें अपनी धर्मपत्नी बनाया। परन्तु पार्वती के माता–पिता इस वर से प्रसन्न नहीं थे।

एक बार पार्वती के पिता दक्ष ने एक यज्ञ का आयोजन किया, परन्तु उन्होंने न तो अपनी बेटी, और न ही अपने दामाद (शिव) को इस यज्ञ में आमंत्रित किया। पिता के इस व्यवहार से क्रुद्ध पार्वती अपने पिता के पास कारण जानने के लिए गई। दक्ष ने पार्वती का अपमान पुनः शिव को निर्धन व जंगली कहकर किया। शिव की पत्नी होने के कारण अपने पति का यह सर्वाधिक अपमान पार्वती सह न सकीं। क्रोध व शर्म से वह तुरन्त ही उस यज्ञ की ज्वाला में कूद पड़ीं तथा आत्महत्या कर ली। जब भगवान को यह सूचना मिली, तो वे क्रोधित हो दक्ष प्रासाद की ओर चल पड़े। अपनी पत्नी का मुत शरीर देखकर शिव इतने कुपित हुए कि उन्होंने पार्वती के शरीर को अपने कंधे पर उठा लिया और विनाश नृत्य, ताण्डव करना प्रारम्भ कर दिया। बहुत दिनों तक यह नृत्य चलता रहा तथा सम्पूर्ण पृथ्वी विनाश के कगार पर ही पहुँच गई। तब सभी देवी–देवताओं ने भगवान विष्णु की सहायता के लिए गुहार लगाई कि किसी प्रकार से पार्वती का शरीर शिव के कंधे से अलग हो, जिससे की उनका नृत्य समाप्त हो सके। भगवान विष्णु ने अपने चक्र से उस मृत शरीर के खंड करना आरम्भ किया। ऐसा कहा जाता है कि पार्वती के शरीर के अंग देश के भिन्न–भिन्न स्थानों पर गिरे। इन्हीं स्थानों को शक्ति केन्द्र या शक्तिपीठ कहते हैं। इन्हीं अंगों में से एक सती की योनि इस स्थान पर गिरा। अतः यहाँ पर योनि की पूजा की जाती है और अम्बुवासी मेले का आयोजन किया जाता है। वस्तुतः पृथ्वी को अन्न के गर्भधारण की क्षमता अम्बुवासी के बाद ही प्राप्त होने से "अम्बुवासी" पर्व महत्व कृषि जीवन में विशेष रूप से देखा जाता है। पृथ्वी की यह गर्भधारण क्षमता या आद्रर्ता "अम्बुवासी" ही कही गयी है।


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. भारत को हमारी वेबसाइट भारतकोश पर विस्तार से पढ़ें।

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