अश्वघोष

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महाकवि अश्वघोष / Ashvaghosh

संस्कृत में बौद्ध महाकाव्यों की रचना का सूत्रपात सर्वप्रथम महाकवि अश्वघोष ने ही किया था। अत: महाकवि अश्वघोष संस्कृत के प्रथम बौद्धकवि हैं। चीनी अनुश्रुतियों तथा साहित्यिक परम्परा के अनुसार महाकवि अश्वघोष सम्राट कनिष्क के राजगुरु एवम् राजकवि थे। इतिहास में कम से कम दो कनिष्कों का उल्लेख मिलता है। द्वितीय कनिष्क प्रथम कनिष्क का पौत्र था। दो कनिष्कों के कारण अश्वघोष के समय असंदिग्ध रूप से निर्णीत नहीं था।

स्त्रीणां विरेजुर्मुखपङकजानि सक्तानि हर्म्येष्विव पङकजानि॥* कुमारसंभव तथा रघुवंश के निम्नश्लोक-

विलोलनेत्रभ्रमरैर्गवाक्षा: सहस्रपत्राभरणा इवासन्।* की प्रतिच्छाया है। उपर्युक्त श्लोकद्वय के तुलनात्मक अध्ययन से यह सिद्ध होता है कि अश्वघोष कालिदास के ऋणी थे, क्योंकि जो मूल कवि होता है वह अपने सुन्दर भाव को अनेकत्र व्यक्त करता है। उस भाव का प्रचार-प्रसार चाहता है इसीलिए कालिदास ने कुमारसंभव और रधुवंश में अपने भाव को दुहराया है। परन्तु अश्वघोष ने कालिदास का अनुकरण किया है। अत: उन्होंने एक ही बार इस भाव को लिया है। फलत: अश्वघोष कालिदास से परवर्ती हैं।

व्यक्तित्व तथा कर्तृव्य

संस्कृत के प्रथम बौद्ध महाकवि अश्वघोष के जीवनवृत्त से सम्बन्धित अत्यल्प विवरण ही प्राप्त है। 'सौन्दरनन्द' नामक महाकाव्य की पुष्पिका से ज्ञात होता है कि इनकी माता का नाम सुवर्णाक्षी था तथा ये साकेत के निवासी थे। ये महाकवि के अतिरिक्त 'भदन्त', 'आचार्य' तथा 'महावादी' आदि उपाधियों से विभूषित थे।* उनके काव्यों की अन्तरंग परीक्षा से ज्ञात होता है कि वे जाति से ब्राह्मण थे तथा वैदिक साहित्य, महाभारत-रामायण के मर्मज्ञ विद्वान थे। उनका 'साकेतक' होना इस तथ्य का परिचायक है कि उन पर रामायण का व्यापक प्रभाव था।

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