आगियारा

ब्रज डिस्कवरी, एक मुक्त ज्ञानकोष से
यहां जाएं: भ्रमण, खोज

आगियारा गाँव / Agiyara Ganv

प्रसंग

सखाओं के साथ श्रीकृष्ण भाण्डीरवट की छाया में खेल रहे थे। पास ही गऊएँ यमुना जल पानकर हरी-भरी घासों से पूर्ण मैदान में चर रहीं थीं। चरते-चरते वे कुछ दूर मुञ्जाटवी में पहुँचीं। गर्मी के दिन थे। चिलचिलाती हुई धूप पड़ रही थीं। मुञ्ज के पौधे सूख गये थे। नीचे बालू तप रही थीं। कृष्ण को पीछे छोड़कर जल तथा छाया विहीन इस मुञ्जवन में गऊओं ने प्रवेश किया। सघन मुञ्जों के कारण वे मार्ग भी भूल गईं। प्यास और गर्मी के मारे गऊएँ छटपटाने लगीं। सखा लोग भी कृष्ण और बलराम को छोड़कर गऊओं को ढूँढ़ते हुए वहीं पहुँचे। इनकी अवस्था भी गऊओं जैसी हुई। वे भी गर्मी और प्यास से छटपटाने लगे। इसी बीच दुष्ट कंस के अनुचरों ने मुञ्जवन में आग लगा दी। आग हवा के साथ क्षण-भर में चारों ओर फैल गई। आग की लपटों ने गऊओं और ग्वाल-बालों को घेर लिया। वे बचने का और कोई उपाय न देख कृष्ण और बलदेव को पुकारने लगे। उनकी पुकार सुनकर कृष्ण और बलदेव वहाँ झट उपस्थित हुए। श्रीकृष्ण ने सखाओं को एक क्षण के लिए आँख बंद करने के लिए कहा। उनके आँख बंद करते ही श्रीकृष्ण ने पलक झपकते ही उस भीषण दावाग्नि को पान कर लिया। सखाओं ने आँख खोलते ही देखा कि वे सभी भाण्डीरवट की सुशीतल छाया में कृष्ण बलदेव के निकट खड़े हैं तथा पास में गऊएँ भी आराम से बैठीं हुईं जुगाली कर रहीं हैं। कृष्ण के शरणागत होने पर संसार रूपी दावाग्नि से प्रपीड़ित जीव का उससे सहज ही उद्धार हो जाता है। यह लीला यहीं पर हुई थीं। मुञ्जाटवी का दूसरा नाम ईषिकाटवी भी है। यमुना के उस पार भाण्डीर गाँव है। यह भाण्डीर गाँव ही मुञ्जाटवी है।

निजी टूल
नामस्थान
संस्करण
क्रियाएं
सुस्वागतम्
टूलबॉक्स