आर्षेय कल्पसूत्र

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आर्षेय कल्पसूत्र / Arsheya Kalpsutra

विषय सूची

सामान्यत: श्रौतसूत्रों और विशेष रूप से साम–लक्षण ग्रन्थों के मध्य इसका अत्यन्त सम्मानपूर्ण स्थान है। कालन्द के अनुसार यह लाट्यायन एवं द्राह्यायण श्रौतसूत्रों की अपेक्षा अधिक प्राचीन है।[1] इसके रचियता मशक या मशक गार्ग्य माने जाते हैं। परिमाण की दृष्टि से इसमें एकादश अध्याय हैं, जिनमें विभिन्न सोमयागों में गेय स्तोमों की क्लृप्तियाँ दी गई हैं, जिनसे यागों का औद्गात्र पक्ष सम्पन्न होता है। वस्तुत: सोमयाग त्रिविध होते हैं– एकाह (एक सुत्यादिवस वाले) याग, अहीन (दो से ग्यारह सुत्यादिवसों वाले) तथा सत्रयाग (12 से लेकर तीन सौ इकसठ दिनों में साध्य)।

स्तोत्रीय ऋचा

आर्षेयकल्प में एकाह से लेकर सहस्त्र संवत्सरसाध्य सोमयागों से सम्बद्ध विविध सामों और उनकी स्तोत्रीय ऋचाओं की सूची मात्र प्रदत्त है, जो किसी सीमा तक याग–परम्परा में रुचि न रखने वाले को नीरस भी प्रतीत हो सकती है। प्रारम्भ गवामयन सत्रयाग से हुआ है। आर्षेयकल्प पूर्णतया ताण्ड्य ब्राह्मण के क्रम का अनुसर्त्ता है। 361 दिनों में सम्पद्यमान गवामयन सत्र के अनन्तर इसमें एकाह, अहीन और सत्रयागों से सम्बद्ध विवरण दिया गया है। श्येन, इषु, संदंश और वज्र प्रभृति अभिचार यागों के निरूपण में, जो पंचविंश ब्राह्मण में न निरूपित होकर षडविंश ब्राह्मण में विहित हैं, आर्षेयकल्प यजुर्वेदीय क्रम का अनुयायी है, जहाँ श्येन का उल्लेख साद्यस्क्र के रूप में इषु का ब्रहस्पतिसव के तथा संदेश और वज्र का एकाह यागों के अनन्तर हुआ है। सोमयागों में गान–विनियोग प्रायेण नियमत: ऊह और ऊह्य ग्रन्थों से हुआ है, किन्तु इसके कतिपय अपवाद भी हैं, जहाँ ग्रामेगेय और अरण्येगेय गानों से भी गान विहित हैं। आर्षेयकल्प में बतलाया गया है कि तत्तत् सोमयागों के विभिन्न स्त्रोतों में केन सामों का गान किया जाना चाहिए और उनकी स्तोत्रगत ऋचाएँ कौन–कौन सी हैं? प्रतीक ऋक् के प्रथम पाद से उल्लिखित हैं, किन्तु वे उस प्रतीक से आरम्भ होने वाले सम्पूर्ण तृच के द्योतक हैं। कल्पकार जब यह अनुभव करते हैं कि ताण्ड्य ब्राह्मण में से किसी याग की विस्तार से स्तोम–क्लृप्ति दी गई है, तब वे वहाँ पुनरूक्ति नहीं करते। हाँ, भाष्यकार वरदराज अवश्य उस स्थल पर आवश्यक और अपेक्षित विवरण जुटाकर न्यूनता की पूर्ति का प्रयत्न करते हैं।

साम–गान

सोमयागों के साम–गान की प्रक्रिया अत्यन्त जटिल है। इसलिए यहाँ उसका आंशिक परिचय दे देना आवश्यक है। साम–गान दो भागों में विभक्त हैं– पूर्वगान और उत्तरगान। पूर्वगान में ग्रामेगेयगान और अरण्येगेयगान नाम से दो भाग हैं। इन्हें प्रकृतिगान भी कहते हैं। सोमयाग में उत्तरगानों का ही मुख्यतया व्यवहार होता है। ये सामवेद के उत्तरार्चिक पर आधृत हैं जिसके 20 अध्यायों पर ऊह और ऊह्यगान प्राप्त होते हैं। उत्तरगानों के 'ऊह' और 'ऊह्य' नाम इनके विचारपूर्वक गान होने की सूचना देते हैं। सोमयागों में उद्गातृ–मण्डल इनका पाँच अथवा साप्तभक्तिक रूप में आगान करता है। ये पाँच विभक्तियाँ क्रमश: इस प्रकार हैं– प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार, उपद्रव और निधन। इन्हीं में ओङ्कार और हिङ्कार का समावेश करने से इनकी संख्या सात हो जाती है। प्रस्तोता प्रतिहर्त्ता और उद्गाता अपने–अपने भागों का गान करते हैं। अन्तिम निधन भक्ति का गान समवेत स्वर में होता है। किसी सामविशेष में कितना–कितना भाग किस ऋत्विक् के द्वारा गेय है, यही विचार वस्तुत: 'ऊह' है। वह आधारभूत ऋचा, जिस पर साम (गान) आधृत होता है, 'योनि' या 'सामयोनि' कहलाती है। ऊह और ऊह्य गानगततृच की प्रथम स्तोत्रीय ऋक् ग्रामेगेयगान या अरण्येगेयगान के एकर्च गान के सदृश होती है और अन्य दो स्तोत्रीय ऋचाओं में वही ज्ञान अपनाया जाता है जो प्रथम स्तोत्रीय ऋचा में होता है। इस प्रकार उत्तरगान में सामान्यत: एक स्तोत्र का सम्पादन तीन ऋचाओं से होता है। इसे ही 'प्रगाथ' भी कहा जाता है। इन्हीं तृच रूप स्तोत्रों का आवृत्तिपूर्वक गान 'स्तोत' है– 'आवृत्तियुक्तं तत्साम स्तोम इत्यभिधीयते।'[2] स्तोमों की कुल संख्या नौ है– त्रिवृत, पञ्चदश, सप्तदश, एकविंश, त्रिणव, त्रयस्त्रिंश, चतुर्विंश, चतुश्चत्वारिंश तथा अष्टचत्वारिंश। स्तोमों के विभिन्न प्रकारों को ‘विष्टुति’ कहा जाता है। 'पञ्चपञ्चिनी', 'उद्यती', 'कुलायिनी' इत्यादि विभिन्न विष्टुतियाँ हैं, जिनका विशेष विवरण ताण्ड्यमहाब्राह्मण में है।

याग दृष्टि

इस प्रकार याग दृष्टि से साम–गान में सामान्यत: बहिष्पवमानादि तैंतीस प्रमुख स्तोत्र, नौ स्तोम और 28 विष्टुतियाँ व्यवहृत होती हैं। ऋचा को गान रूप देने के लिए कतिपय परिवर्तन होते हैं, जिन्हें 'विकार' कहा जाता है। इनमें 'स्तोभ' (ऋग्भिन्न 'औहोवा', 'हाउ' इत्यादि अक्षर) मुख्य हैं। इनके अतिरिक्त पुष्पसूत्र में आइत्व, प्रकृतिभाव इत्यादि 20 भाव विकार भी बतलाए गए हैं।[3] चतु:संस्थ सोमयागों का नामकरण इन्हीं सामों और स्तोमों के आधार पर सम्पन्न हुआ है। अग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी तथा अतिरात्र नाम वस्तुत: विभिन्न स्तोत्रों और स्तोमों के ही उपलक्षक है। उदाहरण के लिए सभी सोमयागों के प्रकृतिभूत याग 'अग्निष्टोम' का नामकरण 'यज्ञायज्ञा वो अग्नये'* इस आग्नेयी ऋचा में उत्पन्न 'यज्ञायज्ञीय अग्निष्टोम' संज्ञक साम से समाप्त होने के कारण हुआ है। इसी प्रकार 'उक्थ्य' संज्ञक तीन विशेष स्तोत्रों (साकमश्व साम, सौरभ साम तथा नार्मेध साम) का एकविंश स्तोम में प्रयोग उक्थ्य संस्थ ज्योतिष्टोम में होता है।

विषय

अध्याय–क्रम से ‘आर्षेयकल्प’ में प्रतिपादित विषयों का विवरण इस प्रकार है:–

व्याख्या

'आर्षेयकल्प' पर वरदराज की वैदुष्यपूर्ण व्याख्या उपलब्ध है जिसका नाम है 'विवृति'। आरम्भ में लगभग 90 पृष्ठों का उनका उपोद्घात सोमयागों के स्वरूप के परिज्ञान के लिए अत्यन्त उपादेय है। व्याख्या की पुष्पिका से ज्ञात होता है कि वरदराज के पिता का नाम वामनार्य तथा पितामह का नाम अनन्तनारायण यज्वा था। वे तमिलनाडु के निवासी तथा श्री वैष्णव सम्प्रदाय के अनुयायी थे। सामवेदीय राणायनीय शाखा से उनका विशेष सम्बन्ध था।

संस्करण

टीका टिप्पणी

  1. Pancavimsa Brahmana, Eng. Trans., Introduction, Page IX (Asiatic Society, Calcutta)
  2. ताण्ड्यब्राह्मण पर सायण–भाष्य की उपक्रमणिका।
  3. साम गान की सांगीतिक प्रक्रिया के लिए द्रष्टव्य ग्रन्थ है– सामवेद का परिशीलन (डॉ. ओमप्रकाश पाण्डेय) भारत भारती अनुष्ठानम्, 346 कानूनगोयांन, बारांबकी (उ. प्र.) से प्रकाशित।

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