इन्द्रप्रस्थ

ब्रज डिस्कवरी, एक मुक्त ज्ञानकोष से
यहां जाएं: भ्रमण, खोज

इन्द्रप्रस्थ / Indraprastha

विषय सूची

प्राचीन नगर

नागरिक

नागरिक विद्या-विनय से सम्पन्न, सभ्य और धर्मपरायण थे। उनमें से कुछ ऐसे थे, जो कई भाषाओं को बोल लेते थे, कुछ कई तरह के शिल्पों पर अधिकार रखते थे। धन प्राप्ति की इच्छा से वहाँ पर विभिन्न दिशाओं के वणिक आते थे। विभिन्न पुर-भागों में धवल तथा उत्तुंग भवन सुशोभित थे। अपनी विलक्षण शोभा द्वारा यह नगर अमरावती की छटा का स्मरण दिला रहा था। महाभारत में आने वाला यह इन्द्रप्रस्थ-वर्णन इस नगर का सर्वोत्तम निरूपण है जिससे उसके पुराने ठाट-बाट और ऐश्वर्य का ज्ञान होता है।


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. तस्मात् त्वं खांडव-प्रस्थं पुरं राष्ट्रं च वर्धय, ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: शूद्राश्च कृत निश्चया:। त्वद्भक्तया जन्तग्श्चान्ये भजन्त्वेव पुरं शुभम्’ महाभारत आदि पर्व 206।
  2. ‘विश्वकर्मन् महाप्राज्ञ अद्यप्रभृति तत् पुरम्, इन्द्रप्रस्थमति ख्यातं दिव्यं रम्यं भविष्यति’ आदि पर्व 206।
  3. ‘सागर प्रतिरुपाभि: परिखाभिरलंकृताम् प्राकारेण च सम्पन्नं दिवमावृत्य तिष्ठता, पांडुराभ्र प्रकाशेन हिमरश्मिनिभेन च शुशुभेतत् पुरश्रेष्ठ्नागैभोर्गव- तीयथा’ आदि पर्व 206,30-3।
  4. ‘तल्पैश्चाभ्यासिकैर्युक्तं शुशुमेयोधरक्षितम् तिक्ष्णांकुश शतध्निभिर्यन्त्र जालैश्च शोभितम्;’ ‘सर्वशिल्पविदस्तत्र वासायाभ्यागमंस्तदा, उद्यानानि च रम्याणि नगरस्य समन्तप: ;’ ‘मनोहरैश्चित्र गृहैस्तथा जगतिपर्वतै: वापीभिविर्विधाभिश्च पूर्णाभि: परमाभ्भसा, रम्याश्च विविधास्तत्र पुष्करिण्यो बनावृता:’ आदि पर्व 206, 34-40-46-48
  5. ‘इत्थं वदन्ययौ विष्णुरिन्द्रप्रस्थं पुरोत्तम्’ विष्णु पुराण 5, 38,34।
निजी टूल
नामस्थान
संस्करण
क्रियाएं
सुस्वागतम्
टूलबॉक्स
अन्य भाषाएं