ऐतरेयोपनिषद

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ऐतरेयोपनिषद

दूसरे ऋग्वेदीय आरण्यक के चौथे, पांचवें और छठे अध्याय में 'ब्रह्मविद्या' का प्रमुख रूप से उल्लेख मिलता है। इसीलिए इसे 'ऐतरेयोपनिषद' की मान्यता दी गयी है। इसमें तीन अध्याय हैं।

प्रथम अध्याय

इस उपनिषद के प्रथम अध्याय में तीन खण्ड हैं

  1. पहले खण्ड में सृष्टि का जन्म,
  2. दूसरे खण्ड में मानव-शरीर की उत्पत्ति और
  3. तीसरे खण्ड में उपास्य देवों की क्षुधा-तृप्ति के लिए अन्न के उत्पादन का वर्णन किया गया है।

प्रथम खण्ड / सृष्टि की उत्पत्ति

प्रथम खण्ड में ऋषि कहता है कि सृष्टि के आरम्भ में एकमात्र 'आत्मा' का विराट ज्योतिर्मय स्वरूप विद्यमान था। तब उस आत्मा ने विचार किया कि सृष्टि का सृजन किया जाये और विभिन्न लोक बनाये जायें तथा उनके लोकपाल निश्चित किये जायें। [1] ऐसा विचार कर आत्मा ने 'अम्भ', 'मरीचि', 'मर' और 'आप:' लोकों की रचना की।

विषय सूची


ॠग्वेद में आप: को सृष्टि के मूल क्रियाशील प्रवाह के रूप में व्यक्त किया है। वही हिरण्यगर्भ रूप है। इस हिरण्यगर्भ रूप में ब्रह्म का संकल्प बीज पककर विश्व-रूप बनता है। इसी हिरण्यगर्भ से विराट पुरुष एवं उसकी इन्द्रियों की उत्पत्ति होती है और उसकी इन्द्रियों से देवताओं का सृजन होता है। यही जीवन का विकास-क्रम है। वेद हिरण्यगर्भ रूप को पृथिवी और द्युलोक का आधार स्वीकार करते हैं- यह हिरण्यगर्भ रूप ही 'आप:' के मध्य से जन्म लेता है। अत: सृष्टि का आधारभूत हव्य है। [2]

द्वितीय खण्ड / मानव-शरीर की उत्पत्ति

द्वितीय खण्ड में, मानव-शरीर की रचना का उल्लेख किया गया है। परमेश्वर द्वारा रचे गये अग्नि आदि देवता इस महासृष्टि के अनन्त सागर में डूबने-उतराने लगे। परमात्मा ने उन्हें भूख-प्यास से मुक्त कर दिया। तब देवों की याचना पर परमात्मा ने मानव-शरीर की रचना की। यह मानव-शरीर उनके लिए आश्रयस्थल बन गया। अग्निदेव वाकेन्द्रिय के माध्यम से मनुष्य के मुख में प्रविष्ट हो गये। वायु ने प्राण वायु के रूप में नासिका के छिद्रों में अपना आश्रयस्थल बना लिया। सूर्य देवता ने नेत्रों में अपना स्थान ग्रहण किया। दिक्पाल, अर्थात दिशाओं के स्वामी मनुष्य के कानों में प्रवेश कर गये। औषधियों व वनस्पतियों ने त्वचा के रोमों में अपना स्थान बना लिया। चन्द्रमा मन के रूप में हृदय में प्रविष्ट कर गया और मृत्यु देवता अपानवायु के रूप में गुदामार्ग से शरीर में प्रवेश करके नाभिप्रदेश पर स्थित हो गया तथा जल देवता वीर्य के रूप में जननेन्द्रियों में प्रवेश कर गये। इस प्रकार ईश्वर द्वारा उत्पन्न सृष्टि के सभी देवता और लोकपाल मानव-शरीर पर अपना अधिकार जमाकर बैठ गये। ठीक उसी प्रकार, जैसे 'हिरण्य पुरुष' से उनका जन्म हुआ था, मानव-शरीर में वे उन्हीं स्थानों पर समाविष्ट हो गये। उनकी भूख-प्यास भी उन्हीं अंगों के माध्यम से पूरी होने लगी। वस्तुत: भूख-प्यास का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। वह विभिन्न अंगों-अवयवों में स्थित देव-शक्तियों के साथ ही संयुक्त है।

तृतीय खण्ड / अन्न की उत्पत्ति

तृतीय खण्ड में देवताओं, अर्थात लोकपालों के लिए अन्न की व्यवस्था करने का उल्लेख है। साथ ही 'आत्मा' के मानव-शरीर में प्रवेश का मार्ग बताया गया है। परमात्मा ने देवताओं की भूख-प्यास की सन्तुष्टि के लिए अन्न की उत्पत्ति का निर्णय किया। पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश, इन पंच महाभूतों को पकाकर अन्न का सृजन किया गया। प्रारम्भ में इस अन्न को देवताओं ने मनुष्य की विभिन्न इन्द्रियों द्वारा ग्रहण करने का प्रयत्न किया, परन्तु वे इसे स्वीकार नहीं कर सके। तब अन्त में मुख के द्वारा इसे ग्रहण करना सम्भव हो सका। तभी परमात्मा को लगा कि इसमें उसका अंश कहां है। तब ब्रह्म ने मानव-शरीर के सिर की कठोर सीमा को चीरकर उसमें प्रवेश किया। उसके प्रवेश करते ही सम्पूर्ण शरीर और शरीर में स्थित सभी देवगण चैतन्य हो उठे। बालक के सिर में जो कोमल स्थान है, उसे ही आत्मा के प्रवेश का मार्ग कहा जाता है। कपाल के इसी स्थल पर 'ब्रह्मरन्ध्र' का स्थान है, जहां पहुंचने के लिए योगी योग-साधना करते हैं। इसे सहस्त्रार, अर्थात दल कमल भी कहते हैं। इसे 'विदृति' नाम से भी जाना जाता है; क्योंकि इस स्थल को विदीर्ण करके ही परमात्मा ने अपने प्रवेश का मार्ग बनाया था। तब मानव-देह में उत्पन्न हुए उस जीव ने परब्रह्म परमेश्वर का सूक्ष्म रूप पहचाना और कहा 'इदन्द्र' (इदम्+द=इसको मैंने देख लिया), अर्थात परमात्मा से साक्षात्कार को ही 'इदन्द्र' कहा गया। इसी का दूसरा रूप 'इन्द्र' है, अर्थात ऐसी अगोचर वस्तु, जिसे आंखों से देखा न जा सके, केवल हृदय में जिसका अनुभव किया जा सके। यह शरीर निश्चित रूप से परमात्मा का आवास है। इस शरीर में तीन स्वचालित तन्त्र और तीन ग्रन्थियों में आत्मा का सीधा नियन्त्रण रहता है- मस्तिष्क में सहस्त्रार, हृदय तथा नाभि ग्रन्थि। इन्हें ही शरीर, ब्रह्माण्ड और परम व्योम, स्थूल, सूक्ष्म तथा पालन का आधार माना जा सकता है।

द्वितीय अध्याय

द्वितीय अध्याय में एक ही खण्ड है। इसमें जीव के तीन जन्मों का विवरण प्राप्त होता है।

मनुष्य के तीन जन्म

तृतीय अध्याय

तृतीय अध्याय में उपास्य देव के स्वरूप को निश्चित किया गया है। जिस आत्मा की हम उपासना करते हैं, वह कौन है? जिसके द्वारा यह प्राणी देखता है, सुनता है, विविध ग्रन्थों को सूंघता है, बोलता है तथा स्वाद का रसास्वादन करता है, वह आत्मा कौन है?

आत्मा का स्वरूप


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. आत्मा वा इदमेक एवाग्रआसीन्नान्यत्किंचन मिषत्। स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति ॥1॥
  2. स दाधार पृथिवी द्यामुतेमां।


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