ऐतरेय आरण्यक

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ऐतरेय आरण्यक

ऐतरेय आरण्यक में, पाँच प्रपाठक हैं, जो पृथक आरण्यक के नाम से ही प्रसिद्ध हैं। यह आरण्यक साहित्य का ही एक अंग है।

द्वितीय प्रपाठक के प्रारम्भ में कहा गया है कि वैदिक अनुष्ठान के मार्ग का उल्लंघन करने वाले पक्षी, पौधे तथा सर्प प्रभृति रूपों में जन्म लेते हैं और इसके विपरीत वैदिक मार्ग के अनुयायी अग्नि, आदित्य, वायु प्रभृति देवों की उपासना करते हुए उत्तम लोकों को प्राप्त करते हैं। पुरुष को प्रज्ञा–सम्पन्न होने के कारण इससे विशेष गौरव प्रदान किया गया है।[1] ऐतरेय आरण्यक में आत्मा के स्वरूप का निरूपण करते हुए कहा गया है कि जो पुरुष सब प्राणियों में विद्यमान अश्रुत, अदृष्ट और अविज्ञात है, किन्तु जो श्रोता, मन्ता, द्रष्टा, विज्ञाता इत्यादि है, वही आत्मा है।[2] 'महाव्रत' संज्ञक कृत्य के नामकरण की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि इन्द्र वृत्र को मारकर महान् हो गए इसीलिए इसे 'महाव्रत' कहा गया (ऐतरेय आरण्यक 1.1.1)।

ऐतरेय आरण्यक से ज्ञात होता है कि उस समय समाज में स्त्रियों को विशिष्ट स्थान प्राप्त था। कहा गया है कि पत्नी को प्राप्त करके ही पुरुष पूर्ण होता है।[3] नैतिकता पर, इसमें, विशेष बल दिया गया है। कहा गया है, सत्यवादी लौकिक सम्पत्ति तो प्राप्त करता ही है, वैदिकानुष्ठानों से कीर्तिभाजन भी हो जाता है।[4]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 'पुरुषे तवेवाविस्तरामात्मा स हि प्रज्ञानेन सम्पन्नतमो विज्ञातं विज्ञानं पश्यति' (ऐतरेय आरण्यक 2.3.2)
  2. 'स योऽतोऽश्रुतोऽगतोऽमतोऽनतोऽदृष्टोऽविज्ञातोऽनादिष्टः श्रोता मन्ता द्रष्टाऽऽदेष्टा घोष्टा विज्ञाता प्रज्ञाता सर्वेषां भूतानामान्तर पुरुषः स म आत्मेति विद्यात्' (3.2.4)
  3. 'पुरुषो जायां वित्त्वा कृत्स्नतरमिवात्मानं मन्यते' (1.3.5)
  4. 'तदेतत् पुण्यं फलं यत्सत्यं स हेश्वरो यशस्वी कल्याण–कीर्तिर्भवितोः पुष्पं हि फलं वाचः सत्यं वदति' (2.3.6)

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