खरोष्ठी

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खरोष्ठी लिपि / Kharoshthi Script

Blockquote-open.gif सिकन्दर के भारत-आक्रमण (326 ई॰पू॰) के बाद पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा बल्ख पर यूनानियों का शासन स्थापित हुआ तो उन्होंने भी अपने सिक्कों पर खरोष्ठी लिपि के अक्षरों का उपयोग किया। यूनानियों से भी पहले ईरानी शासकों के चांदी के सिक्कों पर खरोष्ठी के अक्षरों के ठप्पे देखने को मिलते हैं। Blockquote-close.gif

खरोष्ठी लिपि
अशोक के सिद्दापुर (ज़िला चित्रदुर्ग, कर्नाटक) के पास के ब्रह्मगिरि लेख की अंतिम पंक्ति।
इसमें बाईं ओर के शब्द हैं चपडेने लिखिते (ब्राह्मी में) और दाईं ओर का शब्द है
लिपकिरेण (खरोष्ठी लिपि में), जो दाईं ओर से बाईं ओर पढ़ा जाएगा।

खरोष्ठी लिपि
हिंद-यवन शासक मिनांदर (ई॰पू॰ दूसरी सदी) के
सिक्के पर अंकित खरोष्ठी लेख (दाएं से बाएं):
महरजस त्रतरस मेनंद्रस

खरोष्ठी लिपि
पश्चिमोत्तर भारत के शक शासक मोअस (लगभग 90 ई॰ पू॰) के
सिक्के पर अंकित खरोष्ठी लेख (दाएं से बाएं) :
रजतिरजस महतस मोअस Blockquote-close.gif

इस लिपि का नाम खरोष्ठी क्यों पड़ा

इसके बारे में विद्वानों में काफ़ी मतभेद है। कुछ विद्वानों ने इसे 'इंडो-बैक्ट्रियन' , 'बैक्ट्रियन' 'बैक्ट्रो-पालि', 'काबुली' , 'गांधारी' आदि नाम भी दिए हैं। लेकिन अब इसके लिए 'खरोष्ठी' नाम ही रूढ़ हो गया है। किंतु इस नाम की उत्पत्ति के बारे में भी नाना प्रकार के मत प्रचलित हैं।

खरोष्ठी लिपि
लिप्यंतर (दाएं से बाएं):

1. स 1 100 20 10 4 2 (=136) अयस अषडस मसस दिवसे 1 4 1 (=15) इश दिवसे प्रदिस्तवित भगवतो धतुओ उरस
2. केन लोत फ्रिअपुत्रन बहलिएन नोअचए नगरे वस्तवेन तेन इमे प्रदिस्तवित भगवतो धतुओ धमर-
3. इए तछशि (ल) ए तनुवए बोधिसत्व गहमि महरजस रजतिरजस देवपुत्रस खुषनस अरोग दक्षिणए
4. सर्व बुधन पुयए प्रचग बुधन पुयए अरह (त) न पुयए सर्वसन पुयए मतपितु पुयए मित्रमच ञतिस
5. लोहिन पुयए अत्वनो अरोग दछिनए निवनए होतु अ (य) दे समपरिचगो


तक्षशिला के धर्मराजिका स्तूप से प्राप्त, रजतपत्र पर अंकित खरोष्ठी लेख (प्रथम शताब्दी ई॰)
इसमें इस बात का उल्लेख है कि अय-वर्ष 136 (लगभग 78 ई॰) में बल्ख देश के उरसक ने
उपर्युक्त स्तूप के निजी उपासना-गृह में अपने गुरुजनों,
संबंधियों और मित्रों के सम्मान के लिए तथा महान कुषाण सम्राट के तथा
अपने स्वास्थ्य के लिए भगवान बुद्ध के अस्थि-अवशेषों की प्रतिष्ठापना की।

खरोष्ठी लिपि
खरोष्ठी वर्णमाला Blockquote-close.gif

खरोष्ठी लिपि
खरोष्ठी व्यंजनों के साथ स्वर-मात्राएं जोड़ने की व्यवस्था

खरोष्ठी लिपि
अशोक के खरोष्ठी लेखों के कुछ संयुक्ताक्षर, क्रमश:

1. त्र त्व थ्र थ्रि द्र ध्र ध्र क्र ग्रं
2. प्र प्रि ब्र ब्र भ्ये भ्र म्म म्य म्रु
3. श्र व्रं स्प स्पि स्त्र स्त्र ठ्र

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खरोष्ठी लिपि
आरमेई और खरोष्ठी अक्षरों में साम्य Blockquote-close.gif

खरोष्ठी लिपि
खरोष्ठी लिपि में शाहबाजगढ़ी का सप्तम शिलालेख।
दाईं ओर से बाईं को इसे यों पढ़ा जाता है:

1. देवनं प्रियो प्रियशि रज सव्रत्र इछति सव्र
2. प्रषंड वसेयु सवे हि ते सयमे भवशुधि च इछंति
3. जनो चु उचवुचछंदो उचवुचरगो ते सव्रं व एकदेशं व
4. पि कषंति विपुले पि चु दने बस नस्ति सयम भव
5. शुधि किट्रञत द्रिढ भतित निचे पढं

अर्थात्,
देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा चाहते हैं कि सब जगह सब संप्रदायों
के लोग (एकसाथ) निवास करें, क्योंकि सब संप्रदाय संयम और चित्त की शुद्धि चाहते हैं।
परंतु भिन्न-भिन्न मनुष्यों की प्रवृत्ति तथा रूचि भिन्न-भिन्न- ऊंची या नीची,
अच्छी या बुरी – होती है। वे या तो संपूर्ण रूप से या केवल आंशिक रूप से
(अपने धर्म का पालन) करेंगे। किंतु जो बहुत अधिक दान नहीं कर
सकता उसमें संयम, चित्तशुद्धि,
कृतज्ञता और दृढ़ भक्ति का होना नितांत आवश्यक है। Blockquote-close.gif

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