गया

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गया / Gaya

विषय सूची

आधुनिक काल में भी सभी धार्मिक हिन्दुओं की दृष्टि में गया का विलक्षण महत्व है। इसके इतिहास प्राचीनता, पुरातत्त्व-सम्बन्धी अवशेषों, इसके चतुर्दिक पवित्र स्थलों, इसमें किये जानेवाले श्राद्ध-कर्मों तथा गया वालों के विषय में बहुत-से मतों का उद्घोष किया गया है। गया के विषय में सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है गया-माहात्म्य (वायुपुराण, अध्याय 105-112)। विद्वानों ने गया-माहात्म्य के अध्यायों की प्राचीनता पर सन्देह प्रकट किया है। राजेन्द्रलाला मित्र ने इसे तीसरी या चौथी शताब्दी में प्रणीत माना है। ओ' मैली ने गयासुर की गाथा का आविष्कार 14वीं या 15वीं शताब्दी का माना है, क्योंकि उनके मत से गयावाल वैष्णव हैं, जो मध्वाचार्य द्वारा स्थापित सम्प्रदाय के समर्थक हैं और हरि नरसिंहपुर के महन्त को अपना गुरु मानते हैं किन्तु यह मत असंगत है। वास्तव में गयावाल लोग आलसी, भोगासक्त एवं अज्ञानी हैं और उनकी जाति अब मरणोन्मुख है।

महाभारत में गया

डा॰ बरूआ ने व्याख्या करके यह प्रतिष्ठापित किया है कि गया-माहात्म्य 13वीं या 14वीं शताब्दी के पूर्व का लिखा हुआ नहीं हो सकता। डा॰ बरूआ का निष्कर्ष दो कारणों से असंगत ठहर जाता है। वे वनपर्व (महाभारत) में पाये जानेवाले वृत्तान्त की जाँच करते हैं और उसकी तुलना गयामाहात्म्य के अपेक्षाकृत अधिक पूर्ण वृतान्त से करके निम्न निष्कर्ष निकालते हैं- 'महाभारत में वर्णित गया प्रमुखत: धर्मराज यम, ब्रह्मा एवं शिव शूली का तीर्थस्थल है, और विष्णु एवं वैष्णववाद नाम या भावना के रूप में इससे सम्बन्धित नहीं हो सकते। ब्रह्मयूप, शिवलिंग एवं वृषभ के अतिरिक्त यहाँ किसी अन्य मूर्ति या मन्दिर के निर्माण की ओर संकेत नहीं मिलता।' ॠग्वेद के दो सूक्तों के रचयिता प्लति के पुत्र गय थे। ऋग्वेद (10।63।17 एवं 10।64।17) में आया है 'अस्तवि जनो दिव्यो गयेन' (दैवी पुरोहित गय द्वारा प्रशंसित हुए)। ये ऋग्वेद के एक ऋषि हैं। ऋग्वेद में 'गय' शब्द अ य अर्थों में भी आया है जिनका यहाँ उल्लेख असंगत है। अथर्ववेद (1।14।4) में असित एवं कश्यप के साथ गय नामक एक व्यक्ति जादूगर या ऐन्द्रजालिक के रूप में वर्णित है। वैदिक संहिताओं में असुरों, दासों एवं राक्षसों को जादू एवं इन्द्रजाल में पारंगत कहा गया है (ऋग्वेद 7।99।4, 7।104।24—25 एवं अथर्ववेद 4।23।5)। संभव है कि 'गय' आगे चलकर 'गयासुर' में परिवर्तित हो गया हो।

निरूक्त में गया

निरूक्त (12।19) ने 'इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम्' (ऋग्वेद 1।22।17) की व्याख्या करते हुए दो विश्लेषण दिये हैं, जिनमें एक प्राकृतिक रूप की ओर तथा दूसरा भौगोलिक या किंवदन्ती पूर्ण मतों की ओर संकेत करता है- 'वह (विष्णु) अपने पदों को तीन ढंगों से रखता है।' शाकपूणि के मत से विष्णु अपने पद को पृथिवी, अन्तरिक्ष एवं स्वर्ग में रखते हैं, और्णवाभ के मत से समारोहण, विष्णुपद एवं गय-शीर्ष पर रखते हैं [1]वैदिक उक्ति का तात्पर्य चाहे जो हो, किन्तु यह स्पष्ट है कि ईसा की कई शताब्दियों पूर्व इसके दो विश्लेषण उपस्थित हो चुके थे, और यदि बुद्ध के निर्वाण की तिथियाँ ठीक मान ली जायँ तो यह कहना युक्तिसंगत है कि और्णवाभ एवं यास्क बुद्ध के पूर्व हुए थे। [2]

विभिन्न तथ्य

मोक्ष

मोक्ष चार प्रकार का होता है (अर्थात मोक्ष की उत्पत्ति चार प्रकार से होती है)—

गया में पितृ-पिण्ड

ब्रज में गया की बहुत मान्यता है, ब्रजवासी गया में ही पितृ - पिंड का दान करते हैं। गया में पितृ-पिण्ड निम्न वस्तुओं से दिया जा सकता है; पायस (दूध में पकाया हुआ चावल), पका चावल, जौ का आटा, फल, कन्दमूल, तिल की खली, मिठाई, घृत या दही या मधु से मिश्रित गुड़। गयाश्राद्ध में जो विधि है वह है पिण्डासन बनाना, पिण्डदान करना, कुश पर पुन: जल छिड़कना, (ब्राह्मणों को) दक्षिणा देना एवं भोजन देने की घोषणा या संकल्प करना; किन्तु पितरों का आवाहन नहीं होता, दिग्बन्ध (दिशाओं से कृत्य की रक्षा) नहीं होता और न (अयोग्य व्यक्तियों एवं पशुओं से) देखे जाने पर दोष ही लगता है। [16]जो लोग (गया जैसे) तीर्थ पर किये गये श्राद्ध से उत्पन्न पूर्ण फल भोगना चाहते हैं उन्हें विषयाभिलाषा, क्रोध, लोभ छोड़ देना चाहिए, ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, केवल एक बार खाना चाहिए, पृथ्वी पर सोना चाहिए, सत्य बोलना चाहिए, शुद्ध रहना चाहिए और सभी जीवों के कल्याण के लिए तत्पर रहना चाहिए। प्रसिद्ध नदी वैतरणी गया में आयी है, जो व्यक्ति इसमें स्नान करता है और गोदान करता है वह अपने कुल की 21 पीढ़ियों की रक्षा करता है। अक्षयवट के नीचे जाना चाहिए और वहाँ (गया के) ब्राह्मणों को संतुष्ट करना चाहिए। गया में कोई भी ऐसा स्थल नहीं है जो पवित्र न हो।*

कथा

106वें अध्याय में गयासुर की गाथा आयी है। गयासुर ने, जो 125 योजन लम्वा एवं 60 योजन चौड़ा था, कोलाहल नामक पर्वत पर सहस्त्रों वर्षों तक तप किया। उसके तप से पीड़ित एवं चिन्तित देवगण रक्षा के लिए ब्रह्मा के पास गये। ब्रह्मा उन्हें लेकर शिव के पास गये जिन्होंने विष्णु के पास जाने का प्रस्ताव किया। ब्रह्मा, शिव एवं देवों ने विष्णु की स्तुति की और उन्होंने प्रकट होकर कहा कि वे लोग अपने-अपने वाहनों पर चढ़कर गयासुर के पास चलें। विष्णु ने उससे कठिन तप का कारण पूछा और कहा कि वह जो वरदान चाहे माँग ले। उसने वर माँगा कि वह देवों, ऋषियों, मन्त्रों, संन्यासियों आदि से अधिक पवित्र हो जाय। देवों ने 'तथास्तु' अर्थात 'ऐसा ही हो' 'कहा और स्वर्ग चले गये। जो भी लोग गयासुर को देखते थे या उसके पवित्र शरीर का स्पर्श करते थे, वे स्वर्ग चले जाते थे। यम की राजधानी ख़ाली पड़ गयी और वे ब्रह्मा के पास चले गये। ब्रह्मा उन्हें लेकर विष्णु के पास गये। विष्णु ने ब्रह्मा से उससे प्रार्थना करने को कहा कि वह यज्ञ के लिए अपने शरीर को दे दे। गयासुर सन्नद्ध हो गया और वह दक्षिण-पश्चिम होकर पृथ्वी पर इस प्रकार गिर पड़ा कि उसका सिर कोलाहल पर्वत पर उत्तर की ओर और पैर दक्षिण की ओर हो गये। ब्रह्मा ने सामग्रियाँ एकत्र कीं और अपने मन से उत्पन्न ऋत्विजों (जिनमें 40 के नाम आये हैं) को भी बुलाया और गयासुर के शरीर पर यज्ञ किया। उसका शरीर स्थिर नहीं था, हिल रहा था, अत: ब्रह्मा ने यम से गयासुर के सिर पर अपने घर की शिला को रखने को कहा। यम ने वैसा ही किया। किन्तु तब भी गयासुर का शरीर शिला के साथ हिलता रहा। ब्रह्मा ने शिव एवं अन्य देवों को शिला पर स्थिर खड़े होने को कहा। उन्होंने वैसा किया, किन्तु तब भी शरीर हिलता-डोलता रहा। तब ब्रह्मा विष्णु के पास गये और उनसे शरीर एवं शिला को अडिग करने को कहा। इस पर विष्णु ने स्वयं अपनी मूर्ति दी जो शिला पर रखी गयी, किन्तु तब भी वह हिलती रही। विष्णु उस शिला पर जनार्दन, पुण्डरीक एवं आदि-गदाधर के तीन रूपों में बैठ गये, ब्रह्मा पाँच रूपों (प्रपितामह, पितामह, फल्ग्वीश, केदार एवं कनकेश्वर) में बैठ गये, विनायक हाथी के रूप में और सूर्य तीन रूपों में, लक्ष्मी (सीता के रूप में), गौरी (मंगला के रूप में), गायत्री एवं सरस्वती भी बैठ गयीं। हरि ने प्रथम गदा द्वारा गयासुर को स्थिर कर दिया, अत: हरि को आदि गदाधर कहा गया। गयासुर ने पूछा- 'मैं प्रवंचित क्यों किया गया हूँ? मैं ब्रह्मा के यज्ञ के लिए उन्हें अपना शरीर दे चुका हूँ। क्या मैं विष्णु के शब्द पर ही स्थिर नहीं हो सकता था (गदा से मुझे क्यों पीड़ा दी जा रही है)?' तब देवों ने उससे वरदान माँगने को कहा। उसने वर माँगा; 'जब तक पृथ्वी, पर्वत, सूर्य, चन्द्र एवं तारे रहें, तब तक ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव एवं अन्य देव शिला पर रहें। यह तीर्थ मेरे नाम पर रहे, सभी तीर्थ गया के मध्य में केन्द्रित हों, जो पाँच कोसों तक विस्तृत है और सभी तीर्थ गयाशिर में भी रहें जो एक कोस विस्तृत है और सभी लोगों का कल्याण करें। सभी देव यहाँ व्यक्त रूपों (मूर्तियों) में एवं अव्यक्त रूपों (पदचिह्न आदि) अचानक नष्ट हो जायँ।' देवों ने 'तथास्तु' कहा। इसके उपरान्त ब्रह्मा ने ऋत्विजों को पाँच कोसों वाला गया-नगर, 55 गाँव, सुसज्जित घर, कल्पवृक्ष एवं कामधेनु, दुग्ध की एक नदी, सोने के कूप, पर्याप्त भोजन आदि समान दिये, किन्तु ऐसी व्यवस्था कर दी कि वे किसी से कुछ माँगें नहीं। किन्तु लोभी ब्राह्मणों ने धर्मारण्य में धर्म के लिए यज्ञ किया और उसकी दक्षिणा माँगी। ब्रह्माँ ने वहाँ आकर उन्हें शाप दिया और उनसे सब कुछ छीन लिया। जब ब्राह्मणों ने विलाप किया कि उनसे सब कुछ छीन लिया गया और अब उन्हें जीविका के लिए कुछ चाहिए, तब ब्रह्मा ने कहा कि वे गया-यात्रियों के दान पर जीएँगे और जो लोग उन्हें सम्मानित करेंगे वे मानो उन्हें (ब्रह्मा को) ही सम्मानित करेंगे।

शिला की गाथा

107वें अध्याय में उस शिला की गाथा है जो गयासुर के सिर पर उसे स्थिर करने के लिए रखी गयी थी। धर्म की धर्मव्रता नामक कन्या थी। उसके गुणों के अनुरूप धर्म को कोई वर नहीं मिल रहा था, अत: उन्होंने उसे तप करने को कहा। धर्मव्रता ने सहस्त्रों वर्षों तक केवल वायु पीकर कठिन तप किया। मरीचि ने, जो ब्रह्मा के मानस पुत्र थे, उसे देखा और अपनी पत्नी बनाने की इच्छा प्रकट की। धर्मव्रता ने इसके लिए उन्हें पिता धर्म से प्रार्थना करने को कहा। मरीचि ने वैसा ही किया और धर्म ने अपनी कन्या मरीचि को दे दी। मरीचि उसे लेकर अपने आश्रम में गये और उससे एक सौ पुत्र उत्पन्न किये। एक बार मरीचि श्रमित होकर सो गये और धर्मव्रता से पैर दबाने को कहा। जब वह पैर दबा रही थी तो उसके श्वसुर ब्रह्मा वहाँ आये। वह अपने पति का पैर दबाना छोड़कर उनके पिता की आवभगत में उठ पड़ी। इसी बीच में मरीचि उठ पड़े और अपनी पत्नी को वहाँ न देखकर उसे शिला बन जाने का शाप दे दिया। क्योंकि पैर दबाना छोड़कर उसने उनकी आज्ञा का उल्लंघन जो कर दिया था। वह निर्दोष थी अत: क्रोधित होकर शाप देना चाहा, किन्तु रूककर उसने कहा-- 'महादेव तुम्हें शाप देंगे।' उसने गार्हपत्य अग्नि में खड़े होकर तप किया और मरीचि ने भी वैसा ही किया। इन्द्र के साथ सदा की भाँति देवगण विचलित हो गये और वे विष्णु के पास गये। विष्णु ने धर्मव्रता से वर माँगने को कहा। उसने पति के शाप को मिटाने का वर माँगा। देवों ने कहा कि मरीचि ऐसे महान ऋषि का शाप नहीं टूट सकता अत: वह कोई दूसरा वर माँगे। इस पर उसने कहा कि वह सभी नदियों, ऋषियों, देवों से अधिक पवित्र हो जाय, सभी तीर्थ उस शिला पर स्थिर हो जायँ, सभी व्यक्ति जो उस शिला के तीर्थों में स्नान करें या पिण्डदान एवं श्राद्ध करें, ब्रह्मलोक चले जायँ और गंगा के समान सभी पवित्र नदियाँ उसमें अवस्थित हों। देवों ने उसकी बात मान ली और कहा कि वह गयासुर के सिर पर स्थिर होगी और हम सभी उस पर खड़े होंगे। [17]


शिला गयासुर के सिर पर रखी गयी और इस प्रकार दो अति पुनीत वस्तुओं का संयोग हुआ, जिस पर ब्रह्मा ने अश्वमेध किया और जब देव लोग यज्ञिय आहुतियों का अपना भाग लेने के लिए आये तो शिला ने विष्णु एवं अन्य लोगों से कहा- प्रण कीजिए कि आप लोग शिला पर अवस्थित रहेंगे और पितरों को मुक्ति देंगे। देव मान गये और आकृतियों एवं पदचिह्नों के रूप में शिला पर अवस्थित हो गये। शिला असुर के सिर के पृष्ठ भाग में रखी गयी थी अत: उस पर्वत को मुण्डपृष्ठ कहा गया, जिसने पितरों को ब्रह्मलोक दिया। इसके उपरान्त प्रभास नामक पर्वत का, प्रभास पर्वत एवं फल्गु के मिलन-स्थल के समीप रामतीर्थ, भरत के आश्रम का, यमराज एवं धर्मराज तथा श्याम एवं शबल नामक यम के कुत्तों को दी जाने वाली बलि का, शिला की वाम दिशा के पास अवस्थित उद्यन्त पर्वत का, अगस्त्त्य कुण्ड का तथा गृंध्रकूट पर्वत, च्यवन के आश्रम, पुनपुना नदी, कौञ्चपद एवं भस्मकूट पर स्थित जनार्दन का वर्णन आया है। गयासुर की गाथा से डा॰ मित्र एवं पश्चात्कालीन लेखकों के मन में दुविधाएँ उत्पन्न हो गयी हैं। डा॰ राजेन्द्रलाल मित्र ने गयासुर की गाथा को चित्र-विचित्र एवं मूर्खतापूर्ण माना है। उनका कहना है कि वह राक्षस या दुष्ट पिशाच नहीं है, प्रत्युत एक भक्त वैष्णव है (बोधगया, पृ0 15-16)। गयासुर की गाथा विलक्षण नहीं है। पुराणों में ऐसी गाथाएँ हैं जो आधुनिक लोगों को व्यर्थ एवं कल्पित लगेंगी। प्रह्लाद बाण (शिव का भक्त) एवं बलि (जो श्रेष्ठ राजा एवं विष्णु-भक्त था) ऐसे असुर थे, जो राक्षस या पिशाच के व्यवहार से दूर भक्त व्यक्ति थे, किन्तु उन्होंने देवों से युद्ध अवश्य किया था। कूर्म पुराण (1।16।59-60 एवं 91-92) में वर्णन आया है कि प्रह्लाद ने नृसिंह से युद्ध किया था; पद्म पुराण (भूमिखण्ड, 1।8) में आया है कि उसने सर्वप्रथम विष्णु से युद्ध किया और वैष्णवी तनु में प्रवेश किया (इस पुराण ने उसे महाभागवत कहा है); वामन पुराण (अध्याय 7-8) ने उसके नर-नारायण के साथ हुए युद्ध का उल्लेख किया है। पालि ग्रन्थों (अंगुत्तरनिकाय, भाग 4,पृ0 197-204) में वह पहाराद एवं असुरिन्द (असुरेन्द्र) कहा गया है। बलि के विषय में, जो प्रह्लाद का पौत्र था, अच्छा राजा एवं विष्णुभक्त था,* बलि के पुत्र बाण द्वारा शिव की सहायता से कृष्ण के साथ युद्ध किये जाने के लिए*

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. त्रेधा निधत्ते पदम्। पृथिव्यामन्तरिक्षे दिवीति शाकपूणि:। समारोहणे गयाशिरसि-इति और्णवाभ:। निरूक्त (12।19)।
  2. अधिकांश संस्कृत-विद्वान निरूक्त को कम-से-कम ई॰पू॰ पाँचवीं शताब्दी का मानते हैं। और्णवाभ निरूक्त के पूर्वकालीन हैं। विंटरनित्ज का हिस्ट्री ऑफ संस्कृत लिटरेचर, भाग 1, पृ0 69, अंग्रेजी संस्करण)। गयाशीर्ष के वास्तविक स्थल एवं विस्तार के विषय में विद्वान एकमत नहीं हैं। डा॰ राजेन्द्रलाल मित्र कृत 'बुद्ध-गया' (पृ0 19), डा॰ बरूआ (भाग 1,पृ0 246) एवं सैकेड बुक ऑफ दि ईस्ट (जिल्द 13, पृ0 134, जहाँ कनिंघम ने 'गयासीस' को बह्मयोनि माना है)
  3. महावग्ग (1।21।1, जहाँ यह आया है कि उरवेला में रहकर बुद्ध सहस्त्रों भिक्षुओं के साथ गयासीस अर्थात गयाशीर्ष में गये)
  4. महरौली (देहली से 9 मील उत्तर) के लौह-स्तम्भ के लेख का अन्तिम श्लोक यों है- 'तेनायं प्रणिधाय भूमिपतिना.... प्रांशुर्विष्णुपदे गिरौ भगवतो विष्णोर्ध्वज: स्थापित:' (गुप्ताभिलेख, सं0 32, पृ0 149)। यह स्तम्भाभिलेख किसी चन्द्र नामक राजा का है। इससे प्रकट होता है कि 'विष्णुपद' नामक कोई पर्वत था। किन्तु यह नहीं प्रकट होता कि इसके पास कोई 'गयाशिरस्' नामक स्थल था। अत: 'विष्णुपद' एवं 'गयशिरस्' साथ-साथ गया की ओर संकेत करते हैं। अभिलेख में कोई तिथि नहीं है, किन्तु इसके अक्षरों से प्रकट होता है कि यह समुद्रगुप्त के काल के आस-पास का है। अत: विष्णुपद चौथी शताब्दी में देहली के पास के किसी पर्वत पर रहा होगा। उसी समय या उसके पूर्व में यह वर्णन आया है कि विपाशा नदी के दक्षिण में एक विष्णुपद था।
  5. मौनादित्यसहस्त्रलिंगकमलार्धागींणनारायण,-- द्विसोमेश्वरफल्गुनाथविजयादित्याह्वयानां कृती। स प्रासादमचीकरद् दिविषदां केदारदेवस्य च, ख्यातस्योत्तरमानसस्य खननं सत्रं तथा चाक्षये॥ (इण्डियन ऐण्टीक्वेरी, जिल्द 16, पृ0 63)
  6. वायु पुराण (77।108, और यह श्लोक कल्पतरू द्वारा 1110 ई॰ में उद्धृत किया गया है), पुन: वायु पुराण (82।21) एवं अग्नि पुराण (115।10)
  7. एष्टव्या बहव: पुत्रा यधेकोपि गयां व्रजेत्। यजेत वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सुजेत्॥ महानदी च तत्रैव तथा गयशिरो नृप। यत्रासौ कोर्त्यते विप्रैरक्षय्यकरणो वट:॥ यत्र दत्तं पितृभ्योन्नमक्षय्यं भवति प्रभो। सा च पुच्यजला तत्र फल्गुनामा महानदी॥ वनपर्व (87।10-12); राजर्षिणा पुण्यकृता गयेनानुपमद्युते। नगो गयशिरो यत्र पुण्या चैव महानदी॥...ऋषियज्ञेन महता यत्राक्षयवटो महान। अक्षये देवयजने अक्षयं यत्र वै फलम्॥ वनपर्व (95।9-14)। और एष्टव्या... नामक श्लोक के लिए विष्णुत्रर्मसूत्र (85। अन्तिम श्लोक), मत्स्य पुराण (22।6), वायु पुराण (105।10), कूर्म पुराण (2।35।12), पद्म पुराण (1।38।17 एवं 5।11।62) तथा नारदीय पुराण (उत्तर 44।5-6) (वनपर्व 87।10-12)
  8. यह ज्ञातव्य है कि रामायण (1।32।7) के अनुसार धर्मारण्य की संस्थापना ब्रह्मा के पौत्र, कुश के पुत्र असूर्तरय (या अमूर्तरय) द्वारा हुई थी।
  9. यह कुछ आश्चर्यजनक है कि डा॰ बरूआ (गया एवं बुद्धगया, जिल्द 1, पृ0 66) ने शंख के श्लोक 'तीर्थे वामरकण्टके ' में 'वामरकण्टक' तीर्थ पढ़ा है न कि 'वा' को पृथक् कर 'अमरकण्टक'!
  10. वायु0 (105।7-8) एवं अग्नि0 (114।41)-- 'गयोपि चाकरोद्यार्ग बह्वन्नं बहुदक्षिणम्। गयापुरी तेन नाम्ना0, त्रिस्थलीसेतु (पृ0 340-341) में यह पद्य उद्धृत है।
  11. यहीं पर "एष्टव्या बहव: पुत्रा यद्येकोपि गयां व्रजेत्।... उत्सृजेत्" (वायु पुराण 105।10) नामक श्लोक आया है। त्रिस्थली0 (पृ0 319) में एक श्लोक उद्धृत किया है जिसमें योग्य पुत्र की परिभाषा दी हुई है-- 'जीवतो वाक्यकरणात्..... त्रिभि: पुत्रस्य पुत्रता॥'
  12. आत्मजोवान्यजो वापि गयाभूमौ यदा यदा। यन्नाम्ना पातयेत्पिण्डं तन्नयेद् ब्रह्म शाश्वतम्॥ नामगोत्रे समुच्चार्य पिण्डपातनभिष्यते। (वायु0 105।14-15); आधा पाद 'यन्नाम्ना... शाश्वतम्' अग्नि पुराण (116।21) में भी आया है।
  13. ब्रह्मज्ञानं गयाश्राद्धं गोग्रहे मरणं तथा। वास: पुसां कुरुक्षेत्रे मुक्तिरेषा चतुर्विधा॥ ब्रह्मज्ञानेन किं कार्य... यदि पुत्रो गयां ब्रजेत॥ गयायां सर्वकालेषु पिण्डं वद्याद्विचक्षण:। वायु पुराण (105।16-18)। अग्नि पुराण (115।8) 'न कालादि गयातीर्थे दद्यात्पिण्डांश्च नित्यश:।' नारदीय पुराण (उत्तर, 44।20), अग्नि पुराण (115।3-4 एवं 5-6) एवं वामन पुराण (33।8)
  14. दण्डं प्रदर्शयेद् भिक्षुर्गयां गत्वा न पिण्डद:। दण्डं न्यस्य विष्णुपदे पितृभि: सहमुच्यते॥ वायु पुराण (105।26), नारदीय पुराण एवं तीर्थप्रकाश (पृ0 390)
  15. पंचकोशं गयाक्षेत्रं कोशमेकं गयाशिर:। तन्मध्ये सर्वातीर्थानि त्रैलोक्ये यानि सन्ति वै॥ वायु पुराण (105।29-30 एवं 106।653; त्रिस्थली0,पृ0 335; तीर्थप्र0,पृ0 391)। और अग्नि पुराण (115।42) एवं नारदीय पुराण (उत्तर, 44।16)। प्रसिद्ध तीर्थों के लिए पाँच कोसों का विस्तार मानना एक नियम-सा हो गया है।
  16. पिण्डसनं पिण्डदानं पुन: प्रत्यवनेजनम्। दक्षिणा चान्नसंकल्पस्तीर्थश्राद्धेष्वयं विधि:॥ नावाहनं न दिग्बन्धो न दोषो दृष्टिसम्भव:।... अन्यत्रावाहिता: काले पितरो यान्त्यमुं प्रति। तीर्थे सदा वसन्त्येते तस्मादावहनं न हि॥ वायु पुराण (105।37-39)।'नावाहनं...विधि:' फिर से दुहराया गया है (वायु पुराण 110।28-29)
  17. अग्नि पुराण (114।8-22) में भी शिला की गाथा संक्षेप में कही गयी है। बहुत-से शब्द वे ही हैं जो वायु पुराण में पाये जाते हैं।
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