गीता 3:34

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गीता अध्याय-3 श्लोक-34 / Gita Chapter-3 Verse-34

प्रसंग-


यहाँ अर्जुन के मन में यह बात आ सकती है कि मैं यह युद्ध रूप घोर कर्म न करके यदि भिक्षावृत्ति से अपना निर्वाह करता हुआ शान्तिमय कर्मों में लगा रहूँ तो सहज ही राग-द्वेष से छूट सकता हूँ, फिर आप मुझे युद्ध करने के लिये आज्ञा क्यों दे रहे हैं ? इस पर भगवान् कहते हैं-


इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेतौ ह्रास्य परिपन्थिनौ ।।34।।



इन्द्रिय-इन्द्रिय के अर्थ में अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं, मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिये ,क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले महान शत्रु हैं ।।34।।

Attraction and repulsion are rooted in all sense-objects. Man should never allow himself to be swayed by them, because they are the two principal enemies standing in the way of his redemption.(34)


इन्द्रियस्य = इन्द्रिय के; अर्थे = अर्थ में; अर्थात् सभी इन्द्रियों के भोगों में; व्यवस्थितौ = स्थित (जो); रागद्वेषौ = राग और द्वेष हैं; तयो: = उन दोनों के; वशम् = वश में; न = नहीं; आगच्छेत् = होवे; हि; = क्योंकि; अस्य = इसके; तौ = वे दोनों (ही); परिपन्थिनौ = कल्याण मार्ग में विन्ध्र करने वाले महान शत्रु हैं;



अध्याय तीन श्लोक संख्या
Verses- Chapter-3

1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14, 15 | 16 | 17 | 18 | 19 | 20 | 21 | 22 | 23 | 24 | 25 | 26 | 27 | 28 | 29 | 30 | 31 | 32 | 33 | 34 | 35 | 36 | 37 | 38 | 39 | 40 | 41 | 42 | 43

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