गीता 7:6

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गीता अध्याय-7 श्लोक-6 / Gita Chapter-7 Verse-6

प्रसंग-


इस प्रकार भगवान् की समस्त विश्व के परमकरण और परमाधार हैं, तब स्वभावत: ही यह भगवान् स्वरूप है और उन्हीं से व्याप्त है । अब इसी बात को स्पष्ट करने के लिये भगवान् कहते हैं-


एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।
अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथा ।।6।।



हे अर्जुन ! तू ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों से ही उत्पत्र होने वाले हैं और मैं सम्पूर्ण जगत् का प्रभव तथा प्रलय हूँ अर्थात् सम्पूर्ण जगत् का मूल कारण हूँ ।।6।।

arjuna, know that all beings have evolved from this twofold prakrti, and that I am the source of the entire creation, and into me again it disappears.(6)


इति =ऐसा; उपधारय; = समझ (कि); सर्वाणि = संपूर्ण; भूतानि =भूत; एतद्योनीति = इन दोनों प्रकृतियों से ही उत्पत्ति वाले हैं (और); अहम् = मैं; कृत्स्त्रस्य = संपूर्ण; प्रभव: = उत्पत्ति; प्रलय: = प्रलरूप हूं



अध्याय सात श्लोक संख्या
Verses- Chapter-7

1 | 2 | 3 | 4, 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 | 17 | 18 | 19 | 20 | 21 | 22 | 23 | 24 | 25 | 26 | 27 | 28 | 29, 30

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