गुप्त काल उत्तरार्ध

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गुप्त काल : गुप्त काल उत्तरार्ध

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गुप्त काल उत्तरार्ध / Gupta Period

स्कंद गुप्त

स्कंद गुप्त के समय में आंतरिक और बाहरी अनेक कठिनाईयाँ थी, जिनसे मगध साम्राज्य हिला कर रख दिया था; किंतु उसने कुशलता पूर्वक विजय प्राप्त की । हूणों को पराजित करने पर उसको `विक्रमादित्य` की गौरवशाली उपाधि से अलंकृत किया गया । उसका देहावसान सम्भवतः सं.467में हुआ । उसके निधन से भारतवर्ष का एक योग्य प्रशासक खो गया । स्कंदगुप्त, समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त जैसे शक्तिशाली और विराट सम्राटों की यशस्वी परंपरा का अंतिम महापुरुष था ।


स्कंद गुप्त के बाद कई गुप्त सम्राट हुए किंतु वे गुप्त शासकों की गौरवशाली परंपरा को बना कर नहीं रख पाये । पाश्चात्य विद्वानों का मत है कि वे विशाल राज्य की रक्षा करने में असमर्थ रहे, जिससे वह एकछ्त्र राज्य शनैः शनैः छिन्न-भिन्न होते हुए कालांतर में नष्ट हो गया । स्कन्दगुप्त का उत्तराधिकारी उसका भाई पुरूगुप्त (468 - 473 ई.) हुआ । उसने संभवत: 'प्रकाशादित्य 'उपाधि धारण की । उसके बाद उसका पुत्र नरसिंहगुप्त पाटलिपुत्र की गद्दी पर बैठा और उसके पश्चात क्रमश: कुमारगुप्त द्वितीय तथा विष्णुगुप्त ने बहुत थोडे़ समय तक शासन किया ।

477 ई. में बुद्धगुप्त, जो शायद पुरूगुप्त का दूसरा पुत्र था, गुप्त-साम्राज्य का अधिकारी हुआ । इसका झुकाव बौद्ध मत की ओर था । उसके समय में गुप्त साम्राज्य में मध्य भारत, काशी तथा उत्तरी बंगाल तक का भाग सम्मिलित था । बुधगुप्त का शासन 500 ई॰ के लगभग समाप्त हुआ । इतिहासकारों के अनुसार गुप्तवंश के उत्तराधिकारी सम्राट् अपने राज्य की रक्षा करने में असमर्थ नहीं थे । वे स्कंद गुप्त के समान पराक्रमी तो नहीं थे, किंतु उनके समय में गुप्त साम्राज्य छिन्न-भिन्न भी नहीं हुआ था । इन गुप्त साम्राटों में बुद्वगुप्त का नाम उल्लेखनीय है, जिसने सम्भवतः सं. 533 से 553 तक शासन किया था । उसका राज्य अधिकार पूर्व में बंगाल से पश्चिम में मालवा तक के विशाल भूभाग पर था ।

बुधगुप्त के उत्तराधिकारियों (संभवत: तथागत गुप्त तथा बालादित्य) के समय में मगध साम्राज्य का पश्चिमी भाग अधिकार से निकाल गया । स्कन्दगुप्त के बाद हूणों के आक्रमणों को कोई रोक न सका । तोरमाण नामक सरदार के संरक्षण में वे बहुत शक्तिशाली हो गये थे । ई॰ 500 के लगभग मध्यभारत का पश्चिमी भाग हूणों के अधिकार में चला गया । जबलपुर के आस-पास का राज्य परिव्राजक राजाओं के अधिकार में था । ये गुप्तों के सामंत थे । पूर्व की ओर हूणों के प्रसार को रोकने के लिए ये शासक लगातार प्रयासरत रहे ।

ई॰ पाँचवी शती के अंत के कई लेख उन राजाओ के मिले है जो आधुनिक बुँदेलखंड, वघेलखंड तथा नर्मदा-तट पर शासन करते थे । इन लेखों में गुप्त सम्राटों का कोई उल्लेख न होने से ज्ञात होता है कि इन प्रदेशों ने परिस्थितियों का लाभ उठा कर स्वयं को गुप्त साम्राज्य से स्वतत्रं कर लिया । इसी काल में वाकाटयों की शक्ति बढ़ गई । वाकाटय राजा नरेंद्रसेन के एक लेख में उसे कोशल, मेकल और मालवा का शासक कहा गया है । इससे ज्ञात होता है कि ई॰ पाँचवी शती का अंत होते-होते वाकाटयों ने गुप्त साम्राज्य के दक्षिण का एक बड़ा भाग अपने राज्य में मिला लिया था ।

बुधगुप्त के समय तक गुप्त साम्राज्य बना रहा, पर उसकी मृत्यु के बाद चारों ओर से आपत्तियों के बादल उमड़े, कुछ समय बाद ही गुप्त साम्राज्य नष्ट हो गया । बुधगुप्त के बाद उस के उत्तराधिकारियों के समय का क्रमबद्ध इतिहास नहीं मिलता । इस वंश के अंतिम राजाओं के रुप में दो नाम वैन्यगुप्त तथा भानुगुप्त मिलते हैं । एरव ,जि0 सागर, मध्य प्रदेश से प्राप्त 510 ई॰ के एक लेख से संकेत मिलता है कि भानुगुप्त ने एक प्रसिद्ध युद्ध में भाग लिया । यह युद्ध संभवत: हूण-शासक तोरमाण से हुआ, इस लेख के अतिरिक्त भानुगुप्त के विषय में अधिक जानकारी नहीं मिलती । विद्वानों का अनुमान है कि उसने लगभग 533 ई॰ तक राज्य किया ।

हूण, शक और कुषाण जातियों की ही भाँति मध्य एशिया के निवासी थे । हूण अत्यंत क्रूर,बर्बर और असभ्य थे । वे जीविका की खोज में पश्चिम, दक्षिण-पश्चिम और फिर दक्षिण दिशाओं में दूर-दूर तक छा गये थे । हूणों के एक दल ने यूरोप में पहुँच कर शक्तिशाली रोम साम्राज्य का अंत कर अधिकार किया । दूसरा दल अफ़ग़ानिस्तान से होकर भारत के पश्चिमोत्तर सीमा से बढ़ता हुआ तक्षशिला तक आ गया था । उन्होंने तक्षशिला के सांस्कृतिक वैभव को और उसके विश्वविद्यालय को पूर्णतया नष्ट कर दिया । हूणों का प्रथम आक्रमण सम्राट कुमारगुप्त के शासन-काल के उत्तर काल में हुआ था, इस आक्रमण से मगध सम्राज्य की नींव हिल गई थी ।

स्कन्दगुप्त के काल का एक ताम्रपत्र बुलंदशहर ज़िले के इंदौर (प्राचीन इन्द्रपुर) नामक गाँव से मिला है । यह लेख गुप्त संवत 146(465- 66 ई॰) का है । इस महत्वपूर्ण लेख में इस लेख में स्कन्दगुप्त की उपाधि 'परम भट्टारक महाराजधिराज' अंकित है । और उसके शासन को 'अभिवर्द्धमान-विजयराज्य' कहा गया है । [1] इससे ज्ञात होता है कि इस लेख के समय तक गुप्त साम्राज्य में शांति स्थापित थी और प्रजा धार्मिक कार्य करती थी । इस लेख के कुछ वर्ष बाद का एक दूसरा लेख इलाहाबाद ज़िले के गड़वा नामक स्थान से प्राप्त हुआ है । यह लेख गुप्त संवत 148(467 - 68 ई॰) का है । इसमें भी गुप्त-शासन के लिए 'प्रबर्द्धमान विजय' राज्य कहा गया है । इस लेख से भी उक्त कथन की पुष्टि होती है । ऐसा प्रतीत होता है कि स्कन्दगुप्त ने हूणों को जो हार दी उसके कारण हूणों ने उसके जीवनकाल में कोई आक्रमण नहीं किया ।


स. 484 में हूणों ने ईरानी राज्य को नष्ट कर अफ़ग़ानिस्तान को तहस नहस किया और आँधी की तरह भारत में बढ़ते चले । हूणों का नेता तोरमाण था । जिसने गुप्त सम्राट को हरा पूर्वी मालवा अपने अधिकार मे ले लिया, परन्तु उसके पश्चात गुप्त शासक बालादित्य द्वितीय ने हूणों को मगध से भगा दिया । इस हार के पश्चात हूण भारत के उत्तरी-पश्चिमी भाग में छिप गये और मौक़ा मिलते ही लूटमार करते रहे और धीरे धीरे आगे बढ़ते रहे । धीरे धीरे हूणों का अधिकार कश्मीर पर भी हो गया । सम्भवत: सं. 515 में तोरमाण की मृत्यु हो गई । तोरमाण के बाद मिहिरकुल हूणों का नेता बना । मिहिरकुल तोरामण से भी अधिक क्रूर, अत्याचारी और हिंसक और निष्ठुर था ।

ई॰ छठी शती के प्रारंभ में हूण-शासन भारत में काश्मीर तथा पंजाब के अतिरिक्त राजपूताना, उत्तरप्रदेश तथा मध्यभारत के कुछ भागों पर स्थापित हो गया । ग्वालियर तथा एरण के लेखों से तोरमाण की प्रभुता का पता चलता है । 515 ई॰ के लगभग तोरमाण की मृत्यु हो जाने पर मिहिरकुल उसका उत्तराधिकारी हुआ । यह बड़ा़ क्रूर और अत्याचारी शासक था । चीनी यात्री हुएन-सांग ने लिखा है कि राजा बालादित्य ने तोरमाण के पुत्र मिहिरकुल को कैद कर लिया, पर बाद में वह छोड़ दिया गया । बालादित्य संभवत: भानुगुप्त की उपाधि थी । 533ई॰ के लगभग मालवा का शासक यशोधर्मन् हुआ । मंदसौर से प्राप्त इसके एक लेख से पता चलता है कि इसने हूण शासक मिहिरकुल को हरा कर उसे काश्मीर की ओर भगा दिया । 565 ई॰ के लगभग तुर्को तथा ईरानियों ने बल्ख के हूणों को परास्त कर उधर से भी उनका प्रभुत्व समाप्त कर दिया ।

हूणों के ऊपर विजय पाने के उपरांत यशोधर्मन् ने भानुगुप्त के पुत्र वज्र को पराजित कर संभवत: उसे मार डाला । वज्र गुप्तवंश की प्रधान शाखा का अंतिम शासक था । उसके बाद यद्यपि परवर्ती गुप्तों का शासन मगध तथा उत्तरी बंगाल में कुछ समय बाद तक बना रहा पर मध्यदेश तथा उसके पश्चिमी तथा दक्षिणी भागों से प्रधान गुप्तवंश का शासन समाप्त हो गया । ई॰ छठी शती के मध्य में मौखरी वंश ने ईशानवर्मन् की अध्यक्षता में कन्नौज पर अपनी स्वतन्त्र सत्ता जमा ली । उसी प्रकार वर्धन या पुष्यभूति वंश के द्वारा थानेश्वर और उसके आस-पास के इलाके पर अपना नया राज्य स्थापित किया गया । धीरे-धीरे बंगाल भी गुप्तों के अधिकार से बाहर हो गया और वहाँ गौड़ के एक नये राजवंश का उदय हुआ, जिसमें शशांक एक शक्तिशाली शासक हुआ । इस प्रकार हम देखते है कि लगभग 225 वर्षों के बाद भारत के एक महान साम्राज्य का अंत हो गया ।

हूणों की एक विशाल सेना ने मिहिरकुल के नेतृत्व में आक्रमण किया । मिहिरकुल के नेतृत्व में हूण पंजाब, मथुरा के नगरों को लूटते हुए ,ग्वालियर होते हुए मध्य भारत तक पहुँच गये । [2] इस समय उन्होंने मथुरा के समृद्विशाली और सांस्कृतिक नगर को जी भर कर लूटा । मथुरा मंडल पर उस समय गुप्त शासन था । गुप्त शासकों की ओर नियुक्त शासक हूणों के आक्रमण से रक्षा में असमर्थ रहा । गुप्तकाल में मथुरा अनेक धर्मो का केन्द्र था और धार्मिक रुप से प्रसिद्व था । मथुरा में बौद्ध, जैन और हिन्दू धर्मो के मंदिर, स्तूप, संघाराम और चैत्य थे । इन धार्मिक संस्थानों में मूर्तियों और कला कृतियाँ और हस्तलिखित ग्रंथ थे । इन बहुमूल्य सांस्कृतिक भंडार को बर्बर हूणों ने नष्ट किया ।

श्री कृष्णदत्त वाजपेयी ने हूणों द्वारा की बर्बादी का विवरण इस प्रकार किया है

'मथुरा नगरी गुप्तकाल में बहुत समृद्व थी ।यहाँ अनेक बौद्व स्तूपों और संघारामों के अतिरिक्त विशाल जैन तथा हिंदू इमारतें विद्यमान थीं । हूणों के द्वारा अधिकांश इमारतें जलाई और नष्ट की गई, प्राचीन मूर्तियाँ तोड़ डाली गई और नगर को बर्बाद किया गया । चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के समय में जिस विशाल मंदिर का निर्माण श्री कृष्ण जन्मस्थान पर किया गया था, वह भी हूणों की क्रुरता का शिकार हुआ होगा ।'

हूणों के आक्रमण के लगभग सौ वर्ष पश्चात चीनी यात्री हुएनसांग मथुरा आया । उसने विभिन्न धर्मो के अनेक पुरातन भवन देखे । इससे ज्ञात होता है कि हूणों ने अधिकांश धार्मिक भवन नष्ट नहीं किये । हूणों ने धार्मिक भवनों को तोड़ने में अपना समय नष्ट नहीं किया सम्भवतः हूणों में धार्मिक विद्वेष की भावना नहीं थी । हूण अपनी बर्बर प्रकृति के कारण मारकाट और लूट करते थे । हूणों ने मथुरा की सम्पदा लूटी , छोटे मंदिर-स्तूप नष्ट किये और ग्रंथों को जला दिया, इससे अपार सांस्कृतिक हानि हुई । मथुरा में लूटमार कर हूणों ने यहाँ अपना स्थायी पड़ाव ड़ाला । यहाँ खुदाई में हूणों के अनेक सिक्के मिले हैं । मथुरा में अपना स्थायी पड़ाव बना हूणों की अत्याचारी सेना ग्वालियर बुंदेलखण्ड और मध्यभारत में लूटमार करती रही । क्रूर प्रकृति के कारण सब जगह पर बर्बादी और विनाश का तांडव था ।

देश में मिहिरकुल और उसके बर्बर हूण सैनिक के अत्याचार कर रहे थे, तत्त्कालीन मालवा-नरेश यशोधर्मन ने, जो बहुत शक्तिशाली और बलशाली था, सम्भवतः सं. 587 में हूणों को रोका और पराजित कर उत्तर दिशा की ओर खदेड़ दिया । यशोधर्मन की ऐतिहासिक विजय का विवरण मालवा के शिलालेख में मिलता है । शिलालेख में अंकित है कि यशोधर्मन मालवा का शासक था, उसके राज्य की राजधानी मंदसौर थी । वह वैश्य जाति का वीर पुरुष था । यशोधर्मन ने मगध के अंतिम सम्राट वज्रगुप्त से संधि की और लडखड़ाते हुए गुप्त साम्राज्य का बहुत सा भाग भी अपने राज्य में मिला लिया था । मथुरा में भी सम्भवतः उस काल में उसी का शासन रहा होगा ।


यशोधर्मन के विषय में सं. 589 के मालवा के मंडसर शिलालेख के अतिरिक्त कोई प्रमाणिक तथ्य नहीं मिलते, अत: उसका विशेष विवरण नहीं मिलता । श्री गौरीशंकर चटर्जी ने लिखा है - "भारत के प्राचीन इतिहास के रंगमंच पर यशोधर्मन का लोप हो जाना उतना ही रहस्यमय है, जितना कि उस पर उसका प्रवेश करना ।" यशोधर्मन के शासन-काल की जो उल्लेखनीय घटनायें मिलती हैं, वे है- गुप्त साम्राज्य की समाप्ति तथा बर्बर हूणों के आक्रमण से रक्षा और हूणों की पराजय । यशोधर्मन से पराजित होकर हूण भारत के उत्तर-पश्चिम की ओर चले गये,जहाँ से वे कभी आगे नहीं बढ़ सके ।

हूणों के नेता मिहिरकुल का शासन काश्मीर और गंधार तक ही सीमित रह गया था । मिहिरकुल का देहांत सं. 600 के लगभग हुआ । हूणों को पराजित करने की घटना इतनी महत्वपूर्ण मानी जाती है कि यशोधर्मन की गणना इतिहास के प्रसिद्ध वीरों में होने लगी । हूणों पर विजय प्राप्त कर 'अश्वमेघयज्ञ' और 'विक्रमादित्य' उपाधि धारण करने वाला यशोधर्मन अंतिम वीरपुरुष था ।

विदेशी आक्रमणकारियों की पराधीनता से मातृभूमि को मुक्त करने वाले अथवा कोई अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य करने वाले महापुरुषों की परंपरा में जो कई -विक्रमादित्य हुए हैं, उनकी तालिका इस प्रकार है:-

गुप्त साम्राज्य समुद्रगुप्त से लेकर स्कंद गुप्त के शासन काल ( लगभग सं. 335 से सं. 467) तक उन्नति करता रहा । स्कंद गुप्त के पश्चात जो गुप्त सम्राट हुए वे अपने शासन काल में इस प्रगति को बनाये न रख सके । क्रमशः अवनति होने से गुप्त शासन लगभग सं. 467 तक अपने चरम उत्कर्ष पर पहुंच गया था । सं. 557 के लगभग बर्वर हूणों ने एक बार फिर आक्रमण किया, जिसमें तत्कालीन गुप्त शासक अयोग्य रहे और राज्य के पश्चिमी भाग पर हूणों ने अधिकार कर लिया राज्य के कुछ अन्य प्रशासक ,गुप्त सम्राटों की शक्तिहीनता को भांप कर स्वतंत्र हो गये थे । अंतिम गुप्त शासक भानुगुप्त और वज्रगुप्त थे, जो लगभग सं. 560 तक शासक रहे थे । वज्रगुप्त के शासनावधि में गुप्त साम्राज्य समाप्त हो गया ।

विद्वान व इतिहासकार गुप्तकाल को भारतीय इतिहास का 'स्वर्ण युग' मानते है क्योंकि इस काल में देश में धर्म, संस्कृति, साहित्य, विद्या-कला, ज्ञान-विज्ञान, उद्योग-वाणिज्य सभी अपने चरम विकास पर थे । इस समय धर्म, संगीत, विद्या, कला कुशलता और सुख समृद्वि की अभूतपूर्व उन्नति हुई । गुप्तवंश के शासक महान, वीर और प्रतापी हुए । उनमें दिग्विजयी समुद्रगुप्त, उनके यशस्वी एवं वीर पुत्र चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, चंद्रगुप्त के वीर पौत्र स्कंदगुप्त का महत्वपूर्ण योगदान है । ये सभी महान सम्राट् थे ।

फ़ाह्यान ने लिखा है कि यहाँ वस्तुओं के बेचने और ख़रीदनें में कौड़ियों का प्रयोग होता था । गुप्त शासकों ने सोने, चाँदी और ताँबे के सिक्के बड़ी संख्या में चलाये थे । इन सिक्कों से उस काल की व्यावसायिक समृद्धि का पता चलता है । गुप्त काल में अनेक बड़ी सड़कों का निर्माण कराया गया , जिनसे आंतरिक यातायात तथा व्यापार में बड़ी सुविधा हुईं । देश के अनेक नगर वाणिज्य और व्यवसाय के केन्द्र बने, जहाँ से विदेशों से भी व्यापार होने लगा । गुप्तकाल में भारत लगभग सारे एशिया पर छा गया था । विदेशों में भारतीय धर्म, भाषा, साहित्य और कला का व्यापक प्रसार हुआ जिसका प्रभाव शताब्दियों बाद तक विद्यमान रहा ।

साहित्य और ललित कलाओं की उन्नति गुप्त-काल में हुई । गुप्तकाल में भारत की प्रधान भाषा संस्कृत हुई । गुप्त अभिलेख तथा साहित्य संस्कृत में ही मिलते है । अनेक पुराणों को अंतिम रूप इसी काल में दिया गया । नारद, बृहस्पति, कात्यायन आदि के महत्वपूर्ण स्मृति-ग्रन्थों की रचना इस काल में हुई । प्रसिद्ध ज्योतिषी आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और बराहमिहिर तथा नैयायिक एवं दार्शनिक गौडपाद, कुमाररिल और प्रभाकर गुप्त-काल की महान विभूतियाँ हैं, अमरकोश के रचियता अमर तथा भामह-जैसे काव्यशास्त्र मर्मज्ञ भी गुप्तकाल में हुए । परंतु सबसे अधिक उल्लेखनीय काव्य और नाटक हैं । महाकवि कालिदास तथा प्रवरसेन आदि कवियों ने अपनी रचनाओं में जिस सौंदर्य की रचना की वह सहित्य में अमर है ।

उस समय विद्वानों की भाषा संस्कृत और सामान्यतः प्राकृत भाषा बोली जाती थी । उस गुप्तकाल के महान साहित्यकार मैथिलकवि कालिदास के सभी काव्य ग्रंथ और नाटक संस्कृत भाषा में हैं, परन्तु उनमें प्रासंगिक रूप में प्राकृत भाषा का भी प्रयोग हुआ है । उनके नाटकों के सामान्य पुरुष और नारी पात्र प्राकृत भाषा बोलते है । ये रचनायें प्राकृत भाषा के विविध रूपों-मागधी प्राकृत, शौरसेनी प्राकृत और महाराष्ट्र प्राकृत में थी । इन सभी भाषाओं की रचनाओं ने गुप्त काल की साहित्यिक समृद्वि में अत्यधिक योगदान दिया । गुप्त काल के साहित्य के मुख्य कवि कालिदास थे । इनके काव्यों एवं नाटकों में गुप्तकाल के 'स्वर्ण काल' का महत्वपूर्ण एवं विस्तृत वर्णन किया ।

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