जय केशव 12

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जय केशव ऐतिहासिक उपन्यास-लेखक, श्री सत्येन्दु याज्ञवल्क्य

नन्द दुर्ग की प्राचीरों में घटनायें बड़ी द्रुतगति से घट रही थीं। रूपाम्बरा पर जहाँ सभी को विश्वास होने लगा, वहीं दिवाकर को उस पर सन्देह। सुखदा का अपहरण हुआ और बिना किसी रक्तपात और द्वेष के वह पुन: भेज दी गई। जिस तरह वह आई थी यूँ तो उसे लेकर उस युग में युद्ध का न होना असम्भ्व ही था परन्तु अन्तर्वेद की राज्य व्यवस्था वैभव के मद में बासुक हो चुकी थी। वहाँ का महामात्य ही सारी सत्ता को संभालने हुए था। समस्त ब्रज नित्य नया रूप ले रहा था। बौद्ध बिहारों में बड़ी संख्या में वैष्णवों को आता देख बौद्ध मतावलम्बियों ने यही विचार किया कि आक्रमण के भय से ही ये लोग धर्म परिवर्तन करने को आ रहे हैं परन्तु यह परिवर्तित रूपाकृतियां महामात्य की गुप्तचर सेना के अतिरिक्त और कोई नहीं थीं। शीलभद्र−ढूंढ−ढूंढ कर राज्य की दुर्बलताओं को मिटाने पर लगा हुआ था और इधर श्रावण के झूले भी समाप्त होने आये थे। समय के साथ ही जन्माष्टमी भी आ पहूँची। भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव बड़ी धूम−धाम से समस्त जनपद में मनाये जाने लगा। देश−देश के राजा -महाराजा ,सेठ -साहूकार, अमीर−गरीब, ज्ञानी और कलाकारों के साथ−साथ इस अवसर पर अपार जनसमूह सदैव की भांति एकत्रित हुआ।

केशव महालय के अन्दर जनमानस उमड़ रहा था। कहीं कथा भागवत तो कहीं नृत्य−संगीत का आयोजन। जन्माष्टमी में केवल एक दिन शेष था। जमुना का जल असीम हो उफन रहा था। आकाश पर इन्द्र का प्रकोप देख राजगुरु ब्रह्मदेव प्रसन्न थे। वे जन्मोत्सव की व्यवस्था में कर्मचारियों को विशेष आदेश देने में व्यस्त थे।

जन्माष्टमी के दिन प्रात: ही से ब्रजवासी केशव कोट में एकत्रित होने लगे। अधिकांश लोग उपवास (व्रत) रखे हुए थे। संध्या होते ही भीड़ महालय पर एकत्रित होने लगी । प्रभु के गुणगान और भगवान केशव की जय−जयकार से पूरा वातावरण गूँज उठा।
        महाराज कुलचन्द्र, पट्टमहिषी और रूपाम्बरा के साथ युवराज को लेकर पधारे। उनके साथ−साथ उनके राजे, महाराजे, अनेक परिवार व अंगरक्षक व आमात्य आये हुए थे। कुलचन्द्र के आते ही प्रजा स्वागत के लिये उमड़ पड़ी। पग−पग पर जय−जयकार करती प्रजा अपने प्रिय राजा और रानियों सहित युवराज का स्वागत करती हुई महालय की ओर बढ़ने लगी। लेकिन महामात्य शीलभद्र, सेनापति सोमदेव और विजय तीनों ही एक किनारे पर चलते हऐ आपस में धीरे−धीरे कुछ बातें करते जा रहे थे। वे क्या बाते कर रहे थे। कौन जाने ? परन्तु प्रांगण में पहुँचते ही दोनों भाई बाई ओर मुड़ गये। एक छोटी−सी कोठरी के द्वार पर बैठे पुजारी से विजय धीरे से बोला−"कहो कोई समाचार मिला ?"
        "जी−नहीं।" छोटा−सा उत्तर देकर पुजारी ने उन दोनों को ऊपर जाने का संकेत किया। वे तेजी से सीढियां चढ़ने लगे। इधर शीलभद्र आगे बढ़कर पुन: कुलचन्द्र के साथ हो लिये।
        जन्मोत्सव का कार्यक्रम धूमधाम से चलता रहा। अन्त में प्रसाद वितरण के साथ भक्त प्रजा अपने−अपने घरों को लौटने लगी। महारानी इन्दुमती अन्य महिलाओं के साथ बातचीत करती हुई लौटी। राजा कुलचन्द्र किसी विशेष कारण से रूक गये। वह कुछ देर तक राजगुरु ब्रह्मदेव के साथ प्रात: होने बाले दरबार के बारे में विचार−विमर्श कर पुन: सभी राजप्रमुखो को साथ लिये लौट गये। समस्त घटना चक्र गति के अदृश्य पंखों पर तीव्र गति से गतिमान हो उठा। राजदरबार में उपस्थित सभी राजाओं में यवन आक्रमण की संम्भावना को लेकर काफ़ी क्रोध था। सभी ने आक्रमण को विफल बनाने और यवन आक्रमणों को सदैव के लिये समाप्त कर देने की बलवती भावना का विश्वास, राजा कुलचन्द्र को दिया।
इन्दुमती अब तक पूर्ण स्वस्थ हो चुकी थी। हंसा पुन: अपनी रानी माँ का विश्वास प्राप्त कर सेवारत रहने लगी। जरीना को जो रहस्य वह अनजाने में बता गई थी उन सबका विवरण उसने श्री महाराज को दे दिया। अत: राजाज्ञा से वह सभी मार्ग बन्द कर दिये गये। अपरिचित गुप्त मार्गों की सफाई तथा उनकी मरम्मत का कार्य विश्वस्त सैनिकों के संरक्षण में होने लगा।
        यूँ तो आक्रन्ता की गुप्त योजना का जब तक पता न लगे तब तक इन सब योजनायों को क्रियान्वित करना कोई अर्थ नहीं रखता। लेकिन राज्य में अहमद का आना, कालभैरव के मन्दिर में नवासाशाह और अबुलफतह की गुप्त मंत्रणायें, महमूद के मन्तव्य को स्पष्ट करने के लिये पर्याप्त थीं। इसके अतिरिक्त चम्पा दासी बनकर जरीना द्वारा जासूसी और अर्जुनसिंह द्वारा महमूद की योजना से अवगत हो जाने पर भी सोते रहना कर्मयोगी की जन्मभूमि के अनुकूल न था।
        ब्रज का राज्य तंत्र बहुसम्प्रदाय−वादी होते हुए भी समन्वय भावना से ओत−प्रोत था। यहाँ की प्रजा में धर्म के प्रति जितनी श्रृद्धा थी उतनी ही राज्य−संकट के समय राजा से सहयोग की भावना। समस्त ब्रज में केवल कुछ स्वार्थीं तत्वों को छोड़ कर हर पल, हर क्षण ब्रज की सुरक्षा की भावना विकसित होने लगी थी।

अर्ध−रात्रि बीत चुकी थी। सभी लोग सो रहे थे। नन्द दुर्ग के उत्तरी द्वार पर बैठा द्वारपाल ऊँघ रहा था। आकाश पर तारे जगमगा रहे थे। दो घुड़सवार बड़ी तेजी से राजपथ पर बढ़े चल आ रहे थे। वे द्वार पर आकर रूके और धीरे से कुण्ड़ी खटखटाई। द्वारपाल हड़बड़ाकर उठ बैठा और आँखे मलते हुए बोला−

"कौन है भाई ?"
        "द्वार शीघ्र खोलो, हमें इसी समय श्री महाराज से कुछ निवेदन करना है।"
        "लेकिन आधी रात को द्वार नहीं खुलता।"
        "भाई मेरे हम परदेसी नहीं हैं। श्री महाराज की आज्ञा है कि हम कभी भी उनकी सेवा में आ सकते हैं। "
        "अच्छा....अच्छा। तब आपका परिचय ?" द्वारपाल ने द्वार से कान लगाते हुए पूछा।
        "विजय....।" आगन्तुकों की बात सुन द्वारपाल आश्वस्त हो गया और उसने शीघ्र खिड़की खोल दी। खिड़की से होकर वे तेज गति से राजमहल पहुँचे।
        अंगरक्षक जो कि महलों का पहरा दे रहे थे वे तुरन्त एक स्थान पर एकत्रित हो गये। आगन्तुक आगे बढ़े कि अंगरक्षक ने झुककर प्रणाम किया और धीरे से बोला−"आप और इस समय ?"
        "हाँ ! मेरे साथ बरन के दूत भी हैं। तुम शीघ्र श्री महाराज को सूचित करो कि हम किसी विशेष कार्य से अभी मिलना चाहते हैं।"
        "लेकिन अन्नदाता तो सो रहे हैं। प्रात: सम्भव होगा ?"
        "नहीं। बात के महत्व को समझा करो।"
        "तब मैं अभी निवेदन करता हूँ।" कह अंगरक्षक ने अपने खड्ग को कमर से लटकाया और अन्दर प्रविष्ट हुआ। कुछ क्षण पश्चात् वह वापिस लौटा और बोला−"क्षमा करें, अन्नदाता आपको अन्दर ही बुला रहे हैं।
        राजा कुलचन्द्र असमय शास्त्री और बरन के दूत के आने की बात सुन आश्चर्य में पड़ गये। वे सिराहने की तरफ पीठ लगाकर बैठ गये। शास्त्री बरन के दूत को लेकर श्री महाराज के समक्ष पहुँचा और अपना दाहिना हाथ उठाकर आशीष देते हुए बोला −
        "श्री महाराज एक आवश्यक सन्देश के कारण असमय कष्ट देने के लिए क्षमा चाहता हूँ।"
        "शास्त्री क्या बात है ? सब कुशल तो है ?"
        "ब्रज राज राजेश्वर श्री महाराज को बरन के गुप्त दूत का प्रणाम स्वीकार हो। अन्नदाता समाचार प्राप्त होते ही हमें तुरन्त आपको सूचित करने भेजा है कि गजनी की सेनायें कूँच कर चुकी हैं।"
        "क्या.....?" कुलचन्द्र आश्चर्य में पड़ गये, फिर शास्त्री ने सारी बात को विस्तार से बताया कि किस व्यवस्था के साथ यवन सेनायें सिन्ध पार करने वाली है।" यह सुनकर महाराज बोले−
        "क्या महामात्य तक यह समाचार पहुँचा दिया है ?"
        "सेवक को जो भी आज्ञा हो।"
        "अब आज्ञा का प्रश्न ही कहाँ है। यादवों की शक्ति को ललकारने वाले को कुचलना ही होगा। जाओ वीर, दूत के विश्राम का प्रबन्ध करा दो और महामात्य और सेनापति को शीघ्र यहाँ आने को लिये कहते जाओ।"
        जो आज्ञा, श्री महाराज।" कह शास्त्री साथी को ले महल से चल दिया।
        राजा कुलचन्द्र की आँखों की नींद उचट गई। बहुत देर तक तो वे मौन खड़े रहे, फिर पूर्वी गवाक्ष को खोले वे खड़े हुए तो पूर्व के गुलाबी आकाश पर काले मेघों का आँचल छितरा गया था। दूर−दूर तक प्रकृति हंस रही थी।


टीका टिप्पणी और संदर्भ