जाटों का इतिहास

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जाटों का इतिहास / History of jats

मुग़ल सल्तनत के आखरी समय में जो शक्तियाँ उभरी; जिन्होंने ब्रजमंडल के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उन जाट सरदारों के नाम इतिहास में बहुत मशहूर हैं। जाटों का इतिहास पुराना है। जाट मुख्यतः खेती करने वाली जाति है; लेकिन औरंगजेब के अत्याचारों और निरंकुश प्रवृति ने उन्हें एक बड़ी सैन्य शक्ति का रूप दे दिया। मुग़लिया सल्तनत के अन्त से अंगेज़ों के शासन तक ब्रज मंड़ल में जाटों का प्रभुत्व रहा। इन्होंने ब्रज के राजनैतिक और सामाजिक जीवन को बहुत प्रभावित किया। यह समय ब्रज के इतिहास में 'जाट काल' के नाम से जाना जाता है। इस काल का विशेष महत्व है।

राजनीति में जाटों का प्रभाव

विषय सूची

ब्रज की समकालीन राजनीति में जाट शक्तिशाली बन कर उभरे। जाट नेताओं ने इस समय में ब्रज में अनेक जगहों पर, जैसे सिनसिनी, डीग, भरतपुर, मुरसान और हाथरस जैसे कई राज्यों को स्थापित किया। इन राजाओं में डीग−भरतपुर के राजा महत्वपूर्ण हैं। इन राजाओं ने ब्रज का गौरव बढ़ाया, इन्हें 'ब्रजेन्द्र' अथवा 'ब्रजराज' भी कहा गया। ब्रज के इतिहास में कृष्ण ( अलबेरूनी ने कृष्ण को जाट ही बताया है)* के पश्चात जिन कुछ हिन्दू राजाओं ने शासन किया , उनमें डीग और भरतपुर के राजा विशेष थे। इन राजाओं ने लगभग सौ सालों तक ब्रजमंडल के एक बड़े भाग पर राज्य किया। इन जाट शासकों में महाराजा सूरजमल (शासनकाल सन 1755 से सन् 1763 तक )और उनके पुत्र जवाहर सिंह (शासन काल सन् 1763 से सन् 1768 तक )ब्रज के इतिहास में बहुत प्रसिद्ध हैं।

जाटों के क्रियाकलाप

इन जाट राजाओं ने ब्रज में हिन्दू शासन को स्थापित किया। इनकी राजधानी पहले डीग थी, फिर भरतपुर बनायी गयी। महाराजा सूरजमल और उनके बेटे जवाहर सिंह के समय में जाट राज्य बहुत फैला, लेकिन धीरे धीरे वह घटता गया। भरतपुर, मथुरा और उसके आसपास अंगेज़ों के शासन से पहले जाट बहुत प्रभावशाली थे और अपने राज्य के सम्पन्न स्वामी थे। वे कर और लगान वसूलते थे और अपने सिक्के चलाते थे। उनकी टकसाल डीग, भरतपुर, मथुरा और वृन्दावन के अतिरिक्त आगरा और इटावा में भी थीं। जाट राजाओं के सिक्के अंगेज़ों के शासन काल में भी भरतपुर राज्य के अलावा मथुरा मंडल में प्रचलित थे।

औरंगज़ेब और सूरजमल के पूर्वज

कुछ विद्वान जाटों को विदेशी वंश-परम्परा का मानते है, तो कुछ दैवी वंश-परम्परा का। कुछ अपना जन्म किसी पौराणिक वंशज से हुआ बताते है।

इतिहास में जाट

इतिहासकारों ने जाटों के विषय में नहीं लिखा।

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