जाबालदर्शनोपनिषद

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जाबालदर्शनोपनिषद

अष्टांग योग का विवेचन

  1. यम,
  2. नियम,
  3. आसन,
  4. प्राणायाम,
  5. प्रत्याहार,
  6. धारणा,
  7. ध्यान तथा
  8. समाधि हैं।
  1. अहिंसा,
  2. सत्य,
  3. अस्तेय,
  4. ब्रह्मचर्य,
  5. दया,
  6. क्षमा,
  7. सरलता,
  8. धृति,
  9. मिताहार और
  10. ब्राह्याभ्यन्तर की पवित्रता। इनके पालन के बिना 'योग' करना व्यर्थ है।
  1. तप,
  2. सन्तोष,
  3. आस्तिकता,
  4. दान,
  5. ईश्वर की पूजा,
  6. लज्जा,
  7. जप,
  8. मति,
  9. व्रत और
  10. सिद्धान्तों का श्रवण करना।
  1. स्वास्तिक,
  2. गोमुख,
  3. पद्मासन,
  4. वीरासन,
  5. सिंहासन,
  6. मुक्तासन,
  7. भद्रासन,
  8. मयूरासन और
  9. सुखासन।

समाधि में पहुंचा हुआ पुरुष परमात्मा से एकत्व प्राप्त करके किसी भी जीव अथवा प्राणी को अपने से अलग नहीं देखता। वह सम्पूर्ण विश्व को माया का विलास मात्र मानता है और परमात्मा में लीन होकर परमानन्द को प्राप्त हो जाता है।


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