ठाकुर चूड़ामन सिंह

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जाट नायक ठाकुर चूड़ामन सिंह / Chudaman Singh

चूड़ामन के पिता ब्रजराज की दो पत्नियाँ थीं– इन्द्राकौर तथा अमृतकौर। दोनों ही मामूली जमींदार परिवार से थीं। चूड़ामन की माँ, अमृतकौर चिकसाना के चौधरी चन्द्रसिंह की पुत्री थी। उसके दो पुत्र और थे– अतिराम और भावसिंह। वे दोनों भी मामूली ज़मींदार (भूमिधारी) थे। सम्भवतः चूड़ामन सिनसिनी पर शत्रु का अधिकार होने के बाद डीग, बयाना और चम्बल के बीहड़ों के जंगली इलाक़ों में छिप गया होगा। वह 'मारो और भागो' की छापामार पद्धति से लूटपाट करता था। चूड़ामन को जनता का समर्थन प्राप्त था। चूड़ामन स्वंय अपने प्रति निष्ठावान था। जाट-लोग कठोर जीवन व्यतीत करते थे। वे न दया चाहते थे और न दया करते थे। चूड़ामन कर्मठ और व्यावहारिक व्यक्ति था। उसने जाटों को उन्नत एवं दृढ़ बनाया। उसके समय में पहली बार 'जाट शक्ति' शब्द प्रचलन में आया बदनसिंह तथा सूरजमल के नेतृत्व में जाट शक्ति अठारहवीं शती में हिन्दुस्तान में एक शक्तिशाली ताक़त बन गई थी। चूड़ामन सिंह ने सन 1721 में आत्महत्या की, तब उसके भाई का पौत्र सूरजमल चौदह बरस का था।

चूड़ामन की छापामार लड़ाकू सेना

चूड़ामन में नेतृत्व के गुण विद्यमान थे। उसने एक ज़बरदस्त छापामार लड़ाकू सेना तैयार की थीं। उसकी नीति थी–

औरंगज़ेब की मृत्यु

बहादुरशाह की मृत्यु

लाहौर में सम्राट बहादुरशाह की मृत्यु के समय उसके चारों पुत्र उसके पास ही थे। उत्तराधिकार के लिए युद्ध तो होना ही था। जहाँदारशाह ने अपने तीन भाईयों को मार डाला और स्वयं राजसिंहासन पर बैठ गया। उसे लालकुमारी या लालकँवर नाम की एक रखैल के प्रेमी के रूप में स्मरण किया जाता है। यह लालकँवर स्वयं को दूसरी नूरजहाँ समझती थी। ऐसे पतित एवं कपटपूर्ण वातावरण में चूड़ामन जैसे व्यक्ति को चैन कहाँ मिल सकता था। मौक़ा मिलते ही वह राज-दरबार को छोड़कर अपने लोगों और अपनी जागीर की देखभाल करने के लिए आ गया। जब फ़र्रूख़सियर जहाँदारशाह को चुनौती देने के लिए दिल्ली आ पहुँचा, तब जहाँदारशाह ने सिनसिनवारों से सहायता माँगी। इस समय तक चूड़ामन यमुना के पश्चिमी तट पर रहने वाले जाटों तथा अन्य हिन्दू लोगों का वास्तविक शासक बन चुका था। दिल्ली से लेकर चम्बल तक उसका क्षेत्र था और उसके रूख़ पर ही यह बात निर्भर करती थीं कि हिन्दु्स्तान के सिंहासन के किसी उम्मीदवार के प्रति इस क्षेत्र की ग्रामीण जनता का व्यवहार मित्रतापूर्ण हो या शत्रुतापूर्ण। जहाँदारशाह के अनुरोध पर चूड़ामन अपने अनुयायियों की एक बड़ी सेना लेकर आगरा तक बढ़ गया। जहाँदारशाह ने उसे एक पोशाक भेंट की और उसे उचित सम्मान दिया। राज-सिंहासन के दावेदार दो निकृष्ट पुरुषों की सेनाओं में 10 जनवरी, 1913 को युद्ध हुआ। चूड़ामन ने आनन-फ़ानन में, दोनों पक्षों को बारी-बारी से लूटकर दोनों का ही बोझ हल्का कर दिया और उसके बाद वह थून लौट गया। कुछ ही समय बाद गला घोंटकर जहाँदारशाह की हत्या कर दी गई और फ़र्रूख़सियर सम्राट बना।

शाही मुख्य मार्ग का कार्यकारी अफ़सर (शाहराह)

वास्तविक शक्ति दो सैयद-बन्धुओं के हाथों में रहीं। सैयद अब्दुल्ला बज़ीर बना और हुसैन अली प्रधान सेनापति। छबीलाराम को आगरा का सूबेदार नियुक्त किया गया। उसने चूड़ामन की हलचलों की रोकथाम करने के लिए कुछ चालें चलीं, परन्तु उसे सफलता न मिली। सूबेदार के ऊपर आगरा का राज्यपाल था– शम्सुद्दौला, जो 'ख़ान-ए-दौरां' की भव्य राजकीय उपाधि से विभूषित था। वह चतुर एवं दूरदर्शी था। अपने सूबेदार छबीलाराम के मार्ग का अनुसरण करने की उसकी ज़रा भी इच्छा नहीं थीं। शम्सुद्दौला इस दुर्जय जाट से विरोध पालकर अपनी प्रतिष्ठा गँवाना नहीं चाहता था; अतः उसने चूड़ामन से मैत्री की चर्चा चलाई। चूड़ामन ने फ़र्रूख़सियर की सेना और सामान को लूटा था, वह इतना समझदार तो था कि नए सम्राट को व्यर्थ ही न खिझाता रहे। 'ख़ान-ए-दौरां' ने सम्राट से चूड़ामन को क्षमा दिलवा दी और उसे दिल्ली आने का निमन्त्रण भिजवाया। एक बार फिर चूड़ामन ने अपने 4,000 घुड़सवारों को लेकर दिल्ली को कूच किया और बड़फूला (बारहपुला) से उसे राजोचित सम्मान के साथ दिल्ली ले जाया गया। स्वयं 'ख़ान-ए-दौरां' उसे दीवान-ए-ख़ास में ले गया और सम्राट ने उसे दिल्ली के निकट से लेकर चम्बल के घाट तक शाही मुख्य मार्ग का कार्यकारी अफ़सर (शाहराह) नियुक्त कर दिया।

सैयद-बन्धु, फ़र्रूख़सियर से तंग आ गए थे। उन्होंने उससे पिंड छुड़ाने का निश्चय कर लिया। उन्होंने उसकी हत्या करवा दी।

बदनसिंह और रूप सिंह

अपने भाई भावसिंह की मृत्यु के पश्चात चूड़ामन ने अपने दो भतीजों-बदनसिंह और रूप सिंह को पाला था। चूड़ामन थून में पदासीन था और बदनसिंह सिनसिनी में रहता था। बदनसिंह को अपने चाचा के तौर-तरीक़े और चालें बिलकुल नापसन्द थीं। उसका विचार था कि समय आ गया है अब जाटों को विद्रोहियों की भाँति नहीं, अपितु शासकों की भाँति रहना चाहिए। चूड़ामन के पास धन था, राज्य-क्षेत्र था और मुग़लों की दी हुई उपाधि भी थीं।

'यद्यपि जय सिंह जाटों की धृष्टता का दमन करने को बहुत ही लालायित था, फिर भी अपनी पहले की असफलता को ध्यान में रखते हुए उसने तब तक क़दम बढ़ाना स्वीकार नहीं किया, जब तक कि उसे आगरा का राज्यपाल न बना दिया गया। यह काम 1 सितंबर, 1772 का हो गया, और उसके बाद शीघ्र ही 14-15,000 सवारों की सेना लेकर जयसिंह ने दिल्ली से प्रस्थान किया। इस समय तक चूड़ामन की मृत्यु हो चुकी थी और उसका पुत्र मोखमसिंह जाटों का नेता बन गया था।* जयसिंह ने जाटों के गढ़ थून पर घेरा डाल दिया और बाक़ायदा जंगल को काटने और दुर्गरक्षक सेना को संख़्ती से घेरने का काम शुरू किया। दो सप्ताह इस प्रकार बीत गए। यह कह पाना कठिन है कि यह घेरा कितने दिन चलता, परन्तु जाटों में फूट पड़ गई। मोखमसिंह का चचेरा भाई बदनसिंह जयसिंह से आ मिला और उसने जाट रक्षा-पंक्तियों के दुर्बल स्थान उसे बता दिए। अब मोखमसिंह की स्थिति चिन्ताजनक हो गई। एक रात उसने मकानों को आग लगा दी, गोला-बारूद उड़ा दिया और जो भी कुछ नक़दी और आभूषण उसे मिल सके, उसे लेकर क़िले से भाग निकला और अजीतसिंह के पास चला गया। अजीतसिंह ने उसे शरण दी। अब विजेता बनकर जयसिंह ने गढ़ी में प्रवेश किया और उसे ढहवाकर भूमिसात कर दिया। घृणा के चिहृ के रूप में उसके वहाँ गधों से हल भी चलवाया।

राजा-ए-राजेश्वर

इस विजय के उपलक्ष्य में जयसिंह को 'राजा-ए-राजेश्वर' की उपाधि (ख़िताब) मिली। जाटों से क्या शर्ते तय हुई, इसका उल्लेख किसी समकालीन लेखक ने नहीं किया है। जाटों की सरदारी बदनसिंह ने सँभाली और चूड़ामन की ज़मींदारी उसे प्राप्त हुई। यह अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रमुख क़िले तो अवश्य नष्ट कर दिए गए, परन्तु चूड़ामन के परिवार को उस समूचे राज्य से वंचित नहीं किया गया, जिसे उन्होंने धीरे-धीरे जीतकर बनाया था। इसके बाद बदनसिंह विनयपूर्वक स्वयं को जयसिंह का अनुचर कहता रहा। परन्तु प्रकट है कि वह बढ़िया प्रशासक था और उसके सावधान नेतृत्व में भरतपुर का जाट-घराना अगली दो दशाब्दियों तक चुपचाप, निरन्तर शक्ति संचय करता गया। इस प्रकार जाट-शक्ति की वृद्धि पर यह व्याघात वास्तविक कम और आभासी अधिक था।'* थून और सिनिसिनी से सूरजमल एक विशाल एवं शक्तिशाली राज्य का सृजन करने वाला था।

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