तैत्तिरीय आरण्यक

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तैत्तिरीय आरण्यक

इन्हें भी देखें:- तैत्तिरीयोपनिषद

तैत्तिरायरण्यक में दस प्रपाठक हैं। इन्हें सामान्यतया 'अरण' संज्ञा प्राप्त है। प्रत्येक प्रपाठक का नामकरण इनके आद्य पद से किया जाता है, जो क्रमशः इस प्रकार हैं–

इनमें से प्रथम प्रपाठक को 'भद्र' नाम से अभिहित किया जाता है, क्योंकि उसका प्रारम्भ 'भद्रं कर्णोभिः क्षृणुयाम देवाः' मन्त्र से हुआ है। सप्तम, अष्टम और नवम प्रपाठकों को मिलाकर तैत्तिरीय उपनिषद् समाप्त हो जाती है। दशम प्रपाठक की प्रसिद्ध 'महानारायणीय उपनिषद्' के रूप में है। इस प्रकार व्यावहारिक दृष्टि से मूल आरण्यक छः प्रपाठकों में ही हैं। प्रपाठकों का अवान्तर विभाजन अनुवाकों में है। प्रथम छः प्रपाठकों की अनुवाक–संख्या इस प्रकार है–32+20+21+42+12+12=139।

ब्राह्मणग्रन्थों के समान इसमें कहीं–कहीं निर्वचन भी मिलते हैं। 'कश्यप' का अर्थ है 'सूर्य'। इसे वर्णव्यत्यय के आधार पर 'पश्यक' से निष्पन्न माना गया है।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 'कश्यपः पश्यको भवति। यत्सर्व परिपश्यति इति सौक्ष्यात्' (1.8.8)

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