दिङ्नाग आचार्य

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आचार्य दिङ्नाग / Acharya Dinang

विषय सूची

  1. आचार्य गुणप्रभ- विनय-शास्त्रों में,
  2. आचार्य स्थिरमति- अभिधर्म विषय में,
  3. आचार्य विमुक्तिसेन- प्रज्ञापारमिता शास्त्र में तथा
  4. आचार्य दिङ्नाग- प्रमाणशास्त्र में।

समय

युक्त्यनुयायी सौत्रान्तिक

प्रमाणसमुच्चय

यह ग्रन्थ आचार्य दिङ्नाग की कृति है। यह आचार्य की अनेक छिटपुट रचनाओं का समुच्चय है और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह महनीय भावी बौद्ध न्याय के विकास का आधार और बौद्ध विचारों में नई उत्क्रान्ति का वाहक रहा है। इस ग्रन्थ के प्रभाव से भारतीय दार्शनिक चिन्तनधारा में नए एवं विशिष्ट परिवर्तन का सूत्रपात हुआ। ज्ञान के सम्यक्त्व की परीक्षा, पूर्वाग्रहमुक्त तत्त्वचिन्तन, प्रमाण के प्रामाण्य आदि का निर्धारण आदि वे विशेषताएं हैं, जिनका विश्लेषण दिङ्नाग के बाद प्राय: सभी भारतीय दर्शनों में बहुलता से प्रारम्भ होता है। इस प्रकार हम विशुद्ध ज्ञानमीमांसा और निरपेक्ष प्रमाणमीमांसा का प्रादुर्भाव दिङ्नाग के बाद घटित होते हुए देखते हैं। इस ग्रन्थ में छह परिच्छेद हैं, यथा-

  1. प्रत्यक्ष परिच्छेद,
  2. स्वार्थनुमान परिच्छेद,
  3. परार्थनुमान परिच्छेद,
  4. दृष्टान्तपरीक्षा,
  5. अपोहपरीक्षा एवं
  6. जात्युत्तर परीक्षा।

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