द्वितीयाभद्रा व्रत

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भद्रे भद्राय भद्रं हि चरिष्ये व्रतमेव ते।
निर्विध्नं कुरू में देवि कार्यसिद्धं च भावय।।


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हेमाद्रि (व्रतखण्ड 2, 724-726); पुरुषार्थचिन्तामणि (52)।
  2. स्मृतिकौस्तुभ (565-566)।

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