धवला टीका

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धवला टीका

आचार्य गुणधर कृत 'कसाय-पाहुड' एवं आचार्य पुष्पदन्त एवं भूतबलि कृत 'षट्खण्डागम' –ये दो जैनधर्म के ऐसे विशाल एवं अमूल्य-सिद्धान्त ग्रन्थ हैं, जिनका सीधा सम्बन्ध तीर्थंकर महावीर स्वामी की द्वादशांग वाणी से माना जाता है। दिगम्बर जैन परम्परा के अनुसार शेष श्रुतज्ञान इससे पूर्व ही क्रमश: लुप्त व छिन्न-भिन्न हो गया था।* द्वादशांग के अंतिम अंग दृष्टिवाद के अन्तर्गत परिकर्म, सूत्र, प्रथमानुयोग, पूर्वगत और चूलिका ये 5 प्रभेद हैं। इनमें पूर्वगत नामक चतुर्थ प्रभेद के पुन: 14 भेद हैं। उनमें से द्वितीय भेद अग्रायणीय पूर्व* से षट्खण्डागम का उद्भव हुआ है। इस शौरसेनी प्राकृत-भाषाबद्ध कर्मग्रन्थ की टीका का नाम धवला है। यह धवला टीका संस्कृत मिश्रित शौरसेनी प्राकृत भाषाबद्ध है।

धवला टीका शक सं0 738 कार्तिक शुक्ला 13, ता0 8-10-816 ई॰ बुधवार को पूर्ण हुई थी। इसका प्रमाण 60,000 श्लोक है। यह 16 भागों में तदनुसार 7067 पृष्ठों में 20 वर्षों की दीर्घ अवधि (सन् 1938 से 1958) में प्रकाशित हुई हैं*

विषय-परिचय

षट्खण्डागम की यह धवला टीका 16 पुस्तकों में पूर्ण एवं प्रकाशित हुई है। छ: पुस्तकों में षट्खण्डागम के जीवस्थान नामक प्रथम खण्ड की टीका निबद्ध है।

1.- प्रथम पुस्तक में गुणस्थानों और मार्गणास्थानों का विवरण है।

2.- द्वितीय पुस्तक में गुणस्थान, जीवसमास, पर्याप्ति आदि 20 प्ररुपणाओं द्वारा जीव की परीक्षा की गई है।

3.- तीसरी पुस्तक द्रव्य प्रमाणानुगम है, जिसमें ब्रह्माण्ड में व्याप्त सकल जीवों और उनकी भिन्न-भिन्न अवस्थाओं तथा गतियों में भी उनकी संख्याएं सविस्तार गणित शैली से सप्रमाण बताई है।

4.- चौथी पुस्तक क्षेत्र-स्पर्शन-कालानुगम है। इसमें बताया है कि जीवों के निवास व विहार आदि संबंन्धी कितना क्षेत्र (ब्रह्माण्ड में) होता है, तथा अतीत काल में विभिन्न गुणस्थानी व मार्गणस्थ जीव कितना क्षेत्र स्पर्श कर पाते हैं। वे विभिन्न गुणस्थानादि में एवं गति आदि में कितने काल तक रहते हैं?

5.- पंचम पुस्तक अन्तर, भाव व अल्पबहुत्व विषयक है। विवक्षित गुणस्थान को छोड़कर अन्यत्र जाकर पुन: उसी गुणस्थान में कितने समय बाद आना सम्भव है? यह मध्य की विरह-अवधि अन्तर कहलाती है। कर्मों के उपशम, क्षयोपशम, क्षय, उदय आदि के निमित्त से जो परिणाम होते हैं उन्हें भाव कहते हैं।विभिन्न गुणस्थानादिक में जीवों की हीन अधिक संख्या की तुलना का कथन करना अल्पबहुत्व है।

6.- छठीं पुस्तक चूलिका स्वरूप है। इसमें

1-प्रकृति-समुत्कीर्तन,

2-स्थान-समुत्कीर्तन,

3-5- तीनदण्डक,

6- उत्कृष्ट स्थिति,

7- जघन्यस्थिति,

8- सम्यक्त्वोत्पत्ति तथा

9- गति-आगति नामक 9 चूलिकाएं हैं।

  1. एक द्रव्यकर्म,
  2. दूसरा भावकर्म। यह कर्म एक संस्कार मात्र नहीं है, किन्तु एक वस्तुभूत पदार्थ है। जो रागी, द्वेषी जीव की क्रिया का निमित्त पाकर उसकी ओर आकृष्ट होता है और दूध व पानी की तरह वह जीव के साथ घुल-मिल जाता है। यह (द्रव्य कर्म) है तो भौतिक पदार्थ, किन्तु उसका कर्म नाम इसलिए रूढ़ हो गया कि वह जीव की मानसिक, वाचनिक और कायिक क्रिया से आकृष्ट होकर जीव के साथ बँध जाता है। जहाँ अन्य दर्शन राग और द्वेष से आविष्ट जीव की क्रिया को कर्म ओर इस कर्म के क्षणिक होने से तज्जन्य संस्कार को स्थायी मानते हैं वहाँ जैन दर्शन का मत है कि रागद्वेष से आविष्ट जीव की प्रत्येक क्रिया के द्वारा एक प्रकार का द्रव्य आत्मा के साथ आकृष्ट होता है और उसके जो रागद्वेषरूप परिणामों का निमित्त पाकर वह आत्मा के साथ बँध को प्राप्त हो जाता है। तथा कालान्तर में वही द्रव्य आत्मा को अच्छा या बुरा फल मिलने में हेतु होता है*
  1. जो आत्मा के ज्ञान गुण का आवरण (प्रच्छादन) करता है वह ज्ञानावरणी कर्म है,
  2. जो दर्शन गुण को आवृत करता है वह दर्शनावरण कर्म है,
  3. जो वेदन अर्थात सुख या दु:ख का अनुभवन किया जाता है वह वेदनीय कर्म है,
  4. जो मोहित करता है वह मोहनीय कर्म है,
  5. जो भवधारण के प्रति जाता है वह आयु कर्म है,
  6. जो नाना प्रकार की रचना निष्पन्न करता है वह नाम कर्म है,
  7. जो उच्च व नीच कुल में ले जाता है वह गोत्र कर्म है,
  8. जो दान, लाभ, भोग, उपभोग व वीर्य में विघ्न करता है वह अन्तराय कर्म है*। इन आठ कर्मों के भी भेद क्रमश: 5, 9, 2, 28, 4, 93, 2, 5 हैं। इस तरह द्रव्यकर्म के कुल 148 उत्तर भेद हो जाते हैं।
  1. मतिज्ञानावरण,
  2. श्रुताज्ञावरण,
  3. अवधिज्ञानावरण,
  4. मन:पर्ययज्ञानावरण व
  5. केवलज्ञानावरण हैं। जो मतिज्ञान का आवरण करता है वह मतिज्ञानावरण कर्म है। इसी तरह श्रुतज्ञान आदि ज्ञानों के आवारक कर्म ज्ञातानावरण आदि नाम से अभिहित होते हैं।
  1. चक्षुर्दशनावरण,
  2. अचक्षुर्दर्शनावरण,
  3. अवधिदर्शना0
  4. केवलदर्शना0,
  5. निद्रा,
  6. निद्रानिद्रा,
  7. प्रचला,
  8. प्रचलाप्रचला,
  9. स्त्यानगृद्धि।
  1. गति 4,
  2. जाति 5,
  3. शरीर 5,
  4. शरीर-बंधन 5,
  5. शरीरसंघात 5,
  6. शरीर अंगोपांग 3,
  7. संहनन 6,
  8. संस्थान 6,
  9. वर्ण 5,
  10. गंध 2,
  11. रस 5,
  12. स्पर्श 8,
  13. आनुपूर्वी 4,
  14. अगुरुलघु 1,
  15. उपघात 1,
  16. उच्छ्वास 1,
  17. आतप 1, उ
  18. द्योत 1,
  19. विहायोगति 2,
  20. त्रस 1,
  21. स्थावर 1,
  22. बादर 1,
  23. सूक्ष्म 1,
  24. पर्याप्त 1,
  25. अपर्याप्त 1,
  26. प्रत्येक 1,
  27. साधारण 1,
  28. स्थिर 1,
  29. अस्थिर 1,
  30. शुभ 1,
  31. अशुभ 1,
  32. सुभग 1,
  33. दुर्भग 1,
  34. सुस्वर 1,
  35. दु:स्वर 1,
  36. आदेय 1,
  37. अनादेय 1,
  38. यश:कीर्ति 1,
  39. अयश:कीर्ति 1,
  40. निर्माण 1, व
  41. तीर्थंकर 1। यह नामकर्म अशरीरित्व (सूक्ष्मत्व) गुण का घात करता है*
  1. जो उच्चगोत्र का कारक है वह उच्च गोत्र कर्म है तथा
  2. जिस कर्म के उदय से जीवों के नीच गोत्र (गोत्र= कुल, वंश, संतान) होता है वह नीच गोत्र कर्म हैं*

7.- सातवीं पुस्तक में षट्खण्डागम के दूसरे खण्ड 'क्षुद्रबन्ध' की टीका है, जिसमें संक्षेपत: कर्मबन्ध का प्रतिपादन किया गया है।

8.- आठवीं पुस्तक में बन्धस्वामित्वविचय नामक तृतीय खण्ड की टीका पूरी हुई है। इस पुस्तक में बताया गया है कि कौन-सा कर्मबन्ध किस गुणस्थान व मार्गणास्थान में सम्भव है। इसी सन्दर्भ में निरन्तरबंधी, सान्तरबंधी, ध्रुवबंधी आदि प्रकृतियों का खुलासा किया गया है।

9.- नवम पुस्तक में वेदनाखण्ड सम्बन्धी कृतिअनुयोगद्वार की टीका है। आद्य 44 मंगल सूत्रों की टीका में विभिन्न ज्ञानों की विशद प्ररूपणा है। फिर सूत्र 45 से ग्रन्थान्त तक कृति अनेयागद्वार का विभिन्न अनुयोग द्वारों से प्ररूपण है।

10.-दसवीं पुस्तक में वेदनानिक्षेप, नयविभाषणता, नामविधान तथा वेदना-द्रव्य-विधान अनुयोगद्वारों का सविस्तार विवेचन है।

11.- ग्यारहवीं पुस्तक में वेदना क्षेत्रविधान तथा कालविधान का विभिन्न अनुयोगद्वारों (अधिकारों) द्वारा वर्णन करके फिर दो चूलिकाओं द्वारा अरुचित अर्थ का प्ररूपण तथा प्ररूपित अर्थ विशिष्ट खुलासा किया है।

12.-बारहवीं पुस्तक में वेदना भावविधान आदि 10 अनुयोगद्वारों द्वारा गुणश्रेणी निर्जरा, अनुभाग-विषयक सूक्ष्मतम, विस्तृत तथा अन्यत्र अलभ्य ऐसी प्ररूपणाएँ की गई हैं।

धवला में अन्यान्य वैशिष्ट्य

गणित के क्षेत्र में धवला का मौलिक अवदान

इसमें गणित संबन्धी करणसूत्र व गाथाएं 54 पायी जाती हैं, जो लेखक के गणित विषयक गम्भीर ज्ञान की परिचायक हैं।* उस जमाने (युग) में भी धवलाकार दाशमिक पद्धति से पूर्ण परिचित थे।* इसमें बड़ी संख्याओं का भी बहुतायत से उपयोग हुआ है। धवला में जोड़, बाकी, गुणा, भाग, वर्गमूल, घनमूल, संख्याओं का घात (वर्ग) आदि मौलिक प्रक्रियाओं का कथन उपलब्ध है। धवल का घातांक सिद्धान्त 500 ई॰ पूर्व का है। वर्ग, घन, उत्तरोत्तरवर्ग (द्विरूपवर्गधारा में), उत्तरोत्तरघन, किसी संख्या का संख्यातुल्यघात निकालना, उत्तरोत्तरवर्गमूल, घनमूल, लोगरिथम (लघुरिक्थ), अर्द्धच्छेद, वर्गशलाका, त्रिकच्छेद, चतुर्थच्छेद, भिन्न,त्रैराशिक, अनंतवर्गीकरण, असंख्यात, संख्यात तथा इनके सुव्यवस्थित भेदों का निरूपण पुस्तक 3, 4, 10 में बहुतायत से देखने को मिलता है।*

व्याकरण-शास्त्र

शब्दशास्त्र में लेखक की अबाध गति के धवला में अनेक उदाहरण हैं। शब्दों के निरुक्तार्थ प्रकट करते हुए उसे व्याकरणशास्त्र से सिद्ध किया गया है। उदाहरण के लिए धवला 1/9-10, 32-34, 42-44, 48, 51, 131 द्रष्टव्य है। समासों के प्रयोग हेतु धवला 3/ 4-7, 1/90-91, 1/133, धवल 12/290-91 आदि तथा प्रत्यय प्रयोग हेतु धवल 13/243-3 आदि देखने योग्य हैं।

न्यायशास्त्र

न्यायशास्त्रीय पद्धति होने से धवला में अनेक न्यायोक्तियाँ भी मिलती हैं। यथा-धवल 3/27-130, धवल पु0 1 पं॰ 28, 219, 218, 237, 270, धवल 1/200, 205, 140, 72, 196, धवल 3/18, 120, धवल 13, पृष्ठ 2, 302, 307, 317 आदि। अन्य दर्शन के मत-उदाहरण (धवल 6/490 आदि) तथा काव्य प्रतिभा एवं गद्य भाषालंकरण तो मूल ग्रन्थ देखने पर ही जान पड़ता है।

शास्त्रों के नामोल्लेख

प्रमाण देते समय लेखक ने धवला में कषायपाहुड, आचारांग आदि 27 ग्रन्थों के नाम निर्देशपूर्वक उद्धरण दिये हैं* तो वहीं पर पचासों ग्रन्थों की गाथाओं और गद्यांशों आदि को ग्रन्थनाम बिना भी उद्धृत किया है। कुल दोनों प्रकार के उद्धरण 775 हैं। द्वादशांग से नि:सृत होने से यह ग्रन्थ प्रमाण है। साथ ही इसमें आचार्य परम्परागत व गुरुपदेश को ही मह व दिया है।* तथा जहाँ उन्हें उपदेश अप्राप्त रहा वहाँ स्पष्ट कह दिया कि इस विषय में जानकर (यानि उपदेश प्राप्त कर) कहना चाहिए* इन सबसे* ग्रन्थ की प्रामाणिकता निर्बाध सिद्ध होती है।

प्राचीन दार्शनिकों के नामोल्लेख

धवल में 137 दार्शनिकों के नाम आए हैं। यथा-अष्टपुत्र, आनन्द, ऋषिदास, औपमन्यव, कपिल, कंसाचार्य, कार्तिकेय, गोवर्धन, गौतम, चिलातपुत्र, जयपाल, जैमिनि, पिप्पलाद, वादरायण, विष्णु, वसिष्ठ आदि।*

तीर्थस्थानों, नगरों के नामोल्लेख

इसी तरह 42 भौगोलिक स्थानों के नाम भी आए हैं। यथा आन्ध*, अंकुलेश्वर*, ऊर्जयन्त*, ऋजुकूला नदी*, चन्द्रगुफ़ा*, जृम्भिकाग्राम*, पाण्डुगिरि*, वैभार*सौराष्ट्र*आदि। इन उल्लेखों से तत्कालीन युग के स्थानों का अस्तित्व ज्ञात होता है।

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