नर्मदा नदी

ब्रज डिस्कवरी एक ज्ञानकोश
(नर्मदा से भेजा गया)
यहां जाएं: भ्रमण, खोज

नर्मदा नदी / Narmada River

नर्मदा नदी
Narmada River

नर्मदा मध्य भारत के मध्य प्रदेश और गुजरात राज्य में बहने वाली एक प्रमुख नदी है। महाकाल पर्वत के अमरकण्टक शिखर से नर्मदा नदी की उत्पत्ति हुई है। इसकी लम्बाई प्रायः 1310 किलो मीटर है। यह नदी पश्चिम की तरफ जाकर खम्बात की खाड़ी में गिरती है। इस नदी के किनारे बसा शहर जबलपुर उल्लेखनीय है। इस नदी के मुहाने पर डेल्टा नहीं है। जबलपुर के निकट भेड़ाघाट का नर्मदा जलप्रपात काफ़ी प्रसिद्ध है। वेदों में नर्मदा का कोई उल्लेख नहीं है। गंगा के उपरान्त भारत की अत्यन्त पुनीत नदियों में नर्मदा एवं गोदावरी के नाम आते हैं। रेवा नर्मदा का दूसरा नाम है और यह सम्भव है कि 'रेवा' से ही 'रेवोत्तरस' नाम पड़ा हो।

ग्रंथों में उल्लेख

विषय सूची

वैदिक साहित्य में नर्मदा के विषय में कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिलता।


जान पड़ता है कि कहीं-कहीं साहित्य में इस नदी के पूर्वी या पहाड़ी भाग को रेवा (शाब्दिक अर्थ—उछलने-कूदने वाली) और पश्चिमी या मैदानी भाग को नर्मदा (शाब्दिक अर्थ—नर्म या सुख देने वाली) कहा गया है। (किन्तु महाभारत के उपर्युक्त उद्धरण में उदगम के निकट ही नदी को नर्मदा नाम से अभिहित किया गया है)। नर्मदा के तटवर्ती प्रदेश को भी कभी-कभी नर्मदा नाम से ही निर्दिष्ट किया जाता था। विष्णुपुराण के अनुसार इस प्रदेश पर शायद गुप्तकाल से पूर्व आभीर आदि शूद्रजातियों का अधिकार था।* वैसे नर्मदा का नदी के रुप में उल्लेख है।[5] *

नर्मदा की महत्ता

महाभारत एवं कतिपय पुराणों में नर्मदा की चर्चा बहुधा हुई है। मत्स्य पुराण*, पद्म पुराण* कूर्म पुराण* ने नर्मदा की महत्ता एवं उसके तीर्थों का वर्णन किया है। मत्स्य पुराण* एवं पद्म पुराण आदि* में ऐसा आया है कि उस स्थान से जहाँ नर्मदा सागर में मिलती है, अमरकण्टक पर्वत तक, जहाँ से वह निकलती है, 10 करोड़ तीर्थ हैं। अग्नि पुराण* एवं कूर्म पुराण* के मत से क्रम से 60 करोड़ एवं 60 सहस्र तीर्थ हैं। नारदीय पुराण* का कथन है कि नर्मदा के दोनों तटों पर 400 मुख्य तीर्थ हैं*, किन्तु अमरकण्टक से लेकर साढ़े तीन करोड़ हैं।* [6] वन पर्व* ने नर्मदा का उल्लेख गोदावरी एवं दक्षिण की अन्य नदियों के साथ किया है। उसी पर्व* में यह भी आया हैं कि नर्मदा आनर्त देश में है, यह प्रियंगु एवं आम्र-कुञ्जों से परिपूर्ण है, इसमें वेत्र लता के वितान पाये जाते हैं, यह पश्चिम की ओर बहती है और तीनों लोकों के सभी तीर्थ यहाँ (नर्मदा में) स्नान करने को आते हैं।[7] मत्स्य पुराण एवं पद्म पुराण ने उद्घोष किया है कि गंगा कनखल में एवं सरस्वती कुरुक्षेत्र में पवित्र है, किन्तु नर्मदा सभी स्थानों में, चाहे ग्राम हो या वन। नर्मदा केवल दर्शन-मात्र से पापी को पवित्र कर देती है; सरस्वती (तीन दिनों में) तीन स्नानों से, यमुना सात दिनों के स्नानों से और गंगा केवल एक स्नान से।* विष्णुधर्मसूत्र* ने श्राद्ध के योग्य तीर्थों की सूची दी हैं, जिसमें नर्मदा के सभी स्थलों को श्राद्ध के योग्य ठहराया है। नर्मदा को रुद्र के शरीर से निकली हुई कहा गया है, जो इस बात का कवित्वमय प्रकटीकरण मात्र है कि यह अमरकण्टक से निकली है जो महेश्वर एवं उनकी पत्नी का निवास-स्थल कहा जाता है।* [8] वायु पुराण* में ऐसा उद्घोषित है कि नदियों में श्रेष्ठ पुनीत नर्मदा पितरों की पुत्री है और इस पर किया गया श्राद्ध अक्षय होता है।[9] मत्स्य पुराण एवं कूर्म पुराण का कथन है कि यह 100 योजन लम्बी एवं दो योजन चौड़ी है।[10] प्रो0के0वी0 रंगस्वामी आयंगर ने कहा है कि मत्स्य पुराण की बात ठीक है, क्योंकि नर्मदा वास्तव में लगभग 800 मील लम्बी है।* किन्तु दो योजन (अर्थात् उनके मतानुसार 16 मील) की चौड़ाई भ्रामक है। मत्स्य पुराण एवं कूर्म पुराण का कथन है कि नर्मदा अमरकण्टक से निकली हैं, जो कलिंग देश का पश्चिमी भाग है।[11]

मन्त्र का जप एवं उपवास

विष्णुपुराण ने व्यवस्था दी है कि यदि कोई रात एवं दिन में और जब अन्धकारपूर्ण स्थान में उसे जाना हो तब 'प्रात:काल नर्मदा को नमस्कार, रात्रि में नर्मदा को नमस्कार! हे नर्मदा, तुम्हें नमस्कार; मुझे विषधर साँपों से बचाओं' इस मन्त्र का जप करके चलता है तो उसे साँपों का भय नहीं होता।[12] कूर्म पुराण एवं मत्स्य पुराण में ऐसा कहा गया है कि जो अग्नि या जल में प्रवेश करके या उपवास करके (नर्मदा के किसी तीर्थ पर या अमरकण्टक पर) प्राण त्यागता है वह पुन: (इस संसार में) नहीं आता।[13]

प्राचीन लेख

टॉलेमी ने नर्मदा को 'नमडोज' कहा है।* नर्मदा की चर्चा करने वाले शिलालेखों में एक अति प्राचीन लेख है एरन प्रस्तरस्तम्भाभिले, जो बुधगुप्त के काल* का है।* नर्मदा में मिलने वाली कतिपय नदियों के नाम मिलते हैं, यथा-

उपतीर्थ

बहुत-से उपतीर्थों के नाम आते हैं जिनमें दो या तीन का यहाँ उल्लेख किया जायगा। जो है-


अमरकण्टक पर्वत एक तीर्थ है जो ब्रह्महत्या के साथ अन्य पापों का मोचन करता है और यह विस्तार में एक योजन है।* नर्मदा का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तीर्थ है माहिष्मती, जिसके स्थल के विषय में विद्वानों में मतभेद रहा है। अधिकांश लेखक यही कहते हैं कि यह ओंकार मान्धाता है जो इन्दौर से लगभग 40 मील दक्षिण नर्मदा में एक द्वीप है। इसका इतिहास पुराना है। बौद्ध ग्रन्थों में ऐसा आया है कि अशोक महान् के राज्यकाल* में मोग्गलिपुत्त तिस्स ने कई देशों में धार्मिक दूत-मण्डल भेजे थे, जिनमें एक दूतमण्डल महिषमण्डल को भी भेजा गया था। डा॰ फ्लीट ने महिषमण्डल को माहिष्मती कहा है।* महाभाष्यकार को माहिष्मती का ज्ञान था* कालिदास ने इसे रेवा से घिरी हुई कहा है।* उद्योगपर्व*, अनुशासन पर्व*, भागवत पुराण* एवं पद्म पुराण* में माहिष्मती को नर्मदा या रेवा पर स्थित माना गया है। एक अन्य प्राचीन नगर है भरुकच्छ या भृगुकच्छ (आधुनिक भड़ोच)।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 'स नर्मदारोधसि सीकराद्रैर्मरुद्भिरानर्तितनक्तमाले, निवेशयामास विलंघिताध्वा क्लांतं रजोधूसरकेतू सैन्यम्’, रघुवंश 5,42
  2. ’पश्यमानस्ततो विध्यं रावणोनर्मदां ययौ, चलोपलजलां पुण्यां पश्चिमोदधिगामिनीम्’, वाल्मीकि रामायण-उत्तरकाण्ड, 31,19
  3. ’चकवाकै: सकारण्डै: सहंसजलकुक्कुटै:, सारसैश्च सदामत्तै: कूजदिभ: सुसमावृताम्।
    फुल्लद्रु मकृत्तोत्तंसां चकवाकयुगस्तनीम्, विस्तीर्णपुलिनश्रोणीं हंसावलि सुमेखलाम्।
    पुष्परेण्वनुलिप्तांगींजलफेनामलांशुकाम् जलावगाहसुस्पर्शां फुल्लोत्पल शुभेक्षणाम् पुष्पकादवरुह् याशु नर्मदां सरितां वराम्, इष्टामिव वरां नारीमवगाह्य दशानन्:’, उत्तरकाण्ड 31,21-22-23-24
  4. रेवोत्तरसमुह पाटवं चाक्रं स्थपतिसृञ्जया अपरुरुधु:। शतपथब्राह्मण (12.9.3.1)।
  5. तैश्चोक्तं पुरुकुत्साय भूभुजे नर्मदा तटे, सारस्वताय तेनापि मह्यं सारस्वतेन च’; ‘नर्मदा सुरसाद्याश्च नद्यो विंध्याद्रिनिर्गता;’, विष्णु पुराण 1,2,9; 2,3,11
  6. यद्यपि रेवा एवं नर्मदा सामान्यत: समानार्थक कही जाती हैं, किन्तु भागवत पुराण, 5.19.18 ने इन्हें पृथक्-पृथक् (तापी-रेवा-सुरसा-नर्मदा) कहा है, और वामन पुराण, 13.25 एवं 29-30 का कथन है कि रेवा विन्ध्य से तथा नर्मदा ऋक्षपाद से निकली है। सार्धत्रिकोटितीर्थानि गदितानीह वायुना। दिवि भुव्यन्तरिक्षे च रेवायां तानि सन्ति च॥ नारदीय पुराण (उत्तर, 77.27-28)।
  7. ऐसा लगता है कि प्राचीन काल में गुजरात एवं काठियावाड़ को आनर्त कहा जाता था। उद्योग पर्व, 97-6 में द्वारका को आनर्त–नगरी कहा गया है। नर्मदा आनर्त में होकर बहती मानी गयी है अत: ऐसी कल्पना की जाती है कि महाभारत के काल में आनर्त के अन्तर्गत गुजरात का दक्षिणीभाग एवं काठियावाड़ दोनों सम्मिलित थे।
  8. नर्मदा सरितां श्रेंष्ठा रुद्रदेहाद्विनि:सृता। तारयेंत्सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च॥ मत्स्य पुराण (190.17= कूर्म पुराण 2.40.5= पद्म पुराण, आदिखण्ड 17.13)।
  9. पितृणां दुहिता पुण्या नर्मदा सरितां वरा। तत्र श्राद्धानि दत्तानि अक्षयाणि भवन्त्युत॥ वायुपुराण (77.32)।
  10. योजनानां शतं सग्रं श्रूयते सरिदुत्तमा। विस्तारेण तु राजेन्द्र योजनद्वयमायता॥ कूर्म पुराण (2.40.12=मत्स्य पुराण 186.24-25)। और देखिए अग्नि पुराण (113।2)।
  11. कलिंगदेशपश्चार्धे पर्वतेऽमरकण्टके। पुण्या च त्रिषु लोकेषु रमणीया मनोरमा॥ कूर्म पुराण (2.40.9) एवं मत्स्य पुराण (186.12)।
  12. नर्मदायै नम: प्रातर्नर्मदायै नमो निशि। नमोस्तु नर्मदे तुभ्यं त्राहि मां विषसर्पत:॥ विष्णुपुराण (4.3.12-13)।
  13. अनाशकं तु य: कुर्यात्तस्मिंस्तीर्थे नराधिप। गर्भवासे तु राजेन्द्र न पुनर्जायतें पुमान् ॥ मत्स्य0 (194.29-30); परित्यजति य: प्राणान् पर्वत्तेऽमरकण्टके। वर्षकोटिशतं साग्रं रुद्रलोके महीयतें॥ मत्स्य पुराण (186.53-54)।
  14. नर्मदा की उत्तरी शाखा जहाँ 'ओंकार' नामक द्वीप अवस्थित है 'कावेंरी' नाम से प्रसिद्ध है।

सम्बंधित लिंक

निजी टूल
नामस्थान
संस्करण
क्रियाएं
भ्रमण
टूलबॉक्स
सुस्वागतम्