पंचांग

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*हलार प्रान्त, जहाँ पर वर्ष का आरम्भ 'आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा' से होता है। [[bk:गुजरात|गुजरात]] एवं उत्तरी भारत, बंगाल को छोड़कर, में 'विक्रम संवत', दक्षिण भारत में '[[शक संवत]]' और [[कश्मीर]] में 'लौकिक संवत' का प्रयोग होता है।  
 
*हलार प्रान्त, जहाँ पर वर्ष का आरम्भ 'आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा' से होता है। [[bk:गुजरात|गुजरात]] एवं उत्तरी भारत, बंगाल को छोड़कर, में 'विक्रम संवत', दक्षिण भारत में '[[शक संवत]]' और [[कश्मीर]] में 'लौकिक संवत' का प्रयोग होता है।  
 
*उत्तरी भारत एवं तेलंगाना में मास 'पूर्णिमान्त' अर्थात [[पूर्णिमा]] से समाप्त होते हैं।  
 
*उत्तरी भारत एवं तेलंगाना में मास 'पूर्णिमान्त' अर्थात [[पूर्णिमा]] से समाप्त होते हैं।  
*[[bk:पश्चिम बंगाल|बंगाल]], [[bk:महाराष्ट्र|महाराष्ट्र]] एवं दक्षिण भारत में 'अमान्त' अर्थात अमावास्या से अन्त होने वाले होते हैं।
 
परिणामत: कुछ उपवास एवं उत्सव, जो भारत में सार्वभौम रूप में प्रचलित हैं, जैसे - [[एकादशी]] एवं [[शिवरात्रि]] के [[उपवास]] एवं श्री [[कृष्ण जन्माष्टमी|कृष्ण जन्म]] सम्बन्धी उत्सव विभिन्न भागों में विभिन्न सम्प्रदायों के द्वारा दो विभिन्न दिनों में होते हैं और कुछ उत्सवों के दिनों में तो एक [[मास]] तक का अन्तर पड़ जाता है। जैसे - 'पूर्णिमान्त' मान्यता से कोई उत्सव 'आश्विन कृष्ण पक्ष' में हो तो वही उत्सव 'भाद्रपद कृष्ण पक्ष' में 'अमान्त' गणना के अनुसार हो सकता है और वही उत्सव एक मास के उपरान्त मनाया जा सकता है। आजकल तो यह विभ्रमता बहुत बढ़ गयी है। कुछ पंचांग, जो नाविक पंचांग पर आधारित हैं, इस प्रकार व्यवस्थित है कि [[ग्रहण]] जैसी घटनाएँ उसी प्रकार घटें जैसा कि लोग अपनी आँखों से देख लेते हैं। दक्षिण भारत में बहुत-सी पंजिकाएँ हैं।
 
 
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परिणामत: कुछ उपवास एवं उत्सव, जो भारत में सार्वभौम रूप में प्रचलित हैं, जैसे - [[एकादशी]] एवं [[शिवरात्रि]] के [[उपवास]] एवं श्री [[कृष्ण जन्माष्टमी|कृष्ण जन्म]] सम्बन्धी उत्सव विभिन्न भागों में विभिन्न सम्प्रदायों के द्वारा दो विभिन्न दिनों में होते हैं और कुछ उत्सवों के दिनों में तो एक [[मास]] तक का अन्तर पड़ जाता है। जैसे - 'पूर्णिमान्त' मान्यता से कोई उत्सव 'आश्विन कृष्ण पक्ष' में हो तो वही उत्सव 'भाद्रपद कृष्ण पक्ष' में 'अमान्त' गणना के अनुसार हो सकता है और वही उत्सव एक मास के उपरान्त मनाया जा सकता है। आजकल तो यह विभ्रमता बहुत बढ़ गयी है। कुछ पंचांग, जो नाविक पंचांग पर आधारित हैं, इस प्रकार व्यवस्थित है कि [[ग्रहण]] जैसी घटनाएँ उसी प्रकार घटें जैसा कि लोग अपनी आँखों से देख लेते हैं। दक्षिण भारत में बहुत-सी पंजिकाएँ हैं।
  
 
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==
 
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==

10:32, 12 नवम्बर 2011 के समय का संस्करण

पंचांग

पंचांग काल, दिन को नामंकित करने की एक प्रणाली है। पंचांग के चक्र को खगोलीय तत्वों से जोड़ा जाता है। बारह मास का एक वर्ष और 7 दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से शुरू हुआ। महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति पर रखा जाता है। गणना के आधार पर हिन्दू पंचांग की तीन धाराएँ हैं- पहली चंद्र आधारित, दूसरी नक्षत्र आधारित और तीसरी सूर्य आधारित कैलेंडर पद्धति। भिन्न-भिन्न रूप में यह पूरे भारत में माना जाता है। एक साल में 12 महीने होते हैं। प्रत्येक महीने में 15 दिन के दो पक्ष होते हैं- शुक्ल और कृष्ण। प्रत्येक साल में दो अयन होते हैं। इन दो अयनों की राशियों में 27 नक्षत्र भ्रमण करते रहते हैं।

इन्हें भी देखें: विक्रम संवत, राष्ट्रीय शाके, एवं हिजरी संवत

अर्थ

पंचांग के प्रकार

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परिणामत: कुछ उपवास एवं उत्सव, जो भारत में सार्वभौम रूप में प्रचलित हैं, जैसे - एकादशी एवं शिवरात्रि के उपवास एवं श्री कृष्ण जन्म सम्बन्धी उत्सव विभिन्न भागों में विभिन्न सम्प्रदायों के द्वारा दो विभिन्न दिनों में होते हैं और कुछ उत्सवों के दिनों में तो एक मास तक का अन्तर पड़ जाता है। जैसे - 'पूर्णिमान्त' मान्यता से कोई उत्सव 'आश्विन कृष्ण पक्ष' में हो तो वही उत्सव 'भाद्रपद कृष्ण पक्ष' में 'अमान्त' गणना के अनुसार हो सकता है और वही उत्सव एक मास के उपरान्त मनाया जा सकता है। आजकल तो यह विभ्रमता बहुत बढ़ गयी है। कुछ पंचांग, जो नाविक पंचांग पर आधारित हैं, इस प्रकार व्यवस्थित है कि ग्रहण जैसी घटनाएँ उसी प्रकार घटें जैसा कि लोग अपनी आँखों से देख लेते हैं। दक्षिण भारत में बहुत-सी पंजिकाएँ हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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