माध्यमिक दर्शन

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माध्यमिक दर्शन

विषय सूची

(शून्यवाद)

परिभाषा

  1. स्वातन्त्रिक माध्यमिक एवं
  2. प्रासंगिक माध्यमिक।

स्वातन्त्रिक माध्यमिक

व्यवहारिक सत्ता की स्थापना में मतभेद के कारण इनके भी दो भेद होते हैं, यथा-

  1. सूत्राचार स्वातन्त्रिक माध्यमिक एवं
  2. योगाचार स्वातन्त्रिक माध्यमिक।

सूत्राचार स्वातन्त्रिक माध्यमिक
ये लोग व्यवहार की स्थापना प्राय: सौत्रान्तिक दर्शन की भाँति करते हैं। इसलिए इन्हें 'सौत्रान्तिक स्वातन्त्रिक माध्यमिक' भी कहते हैं अर्थात अठारह धातुओं में संगृहीत धर्मों की स्थापना व्यवहार में ये सौत्रान्तिकों की भाँति करते हैं। आचार्य भावविवेक या भव्य एवं ज्ञानगर्भ आदि इस मत के प्रमुख आचार्य हैं।

दृश्यं न विद्यते बाह्यं चित्तं चित्रं हि दृश्यते।
देहभोगप्रतिष्ठानं चित्तमात्रं वदाम्यहम्॥ -(लंकावतार, 3:33)*

  1. परमार्थत: पुद्गल और धर्मों की स्वभावसत्ता पर विचार,
  2. व्यवहारत: बाह्यार्थ की सत्ता पर विचार,
  3. आर्यसन्धिनिर्मोचनसूत्र का वास्तविक अर्थ तथा
  4. परमार्थत: सत्ता का खण्डन करनेवाली प्रधान युक्ति का प्रदर्शन।

परमार्थत: पुद्गल और धर्मों की स्वभावसत्ता पर विचार
आर्य सन्धिनिर्मोचनसूत्र में लक्षणनि:स्वभावता एवं उत्पत्तिनि:स्वभावता की चर्चा उपलब्ध होती है। उसकी जैसी व्याख्या आचार्य भावविवेक करते हें, उसी तरह का अर्थ मध्यमकालोक में भी वर्णित है, अत: ऐसा प्रतीत होता है कि आचार्य शान्तरक्षित भी व्यवहार में स्वलक्षणत: सत्ता स्वीकार करते हैं। ज्ञात है आचार्य शान्तरक्षित ही इस मत के पुर:स्थापक हैं। इनके मत में भी वे ही युक्तियाँ प्रयुक्त हैं, जिनका आचार्य धर्मकीर्ति के सप्त प्रमाणशास्त्रों में कार्य-कारण की स्थापना के सम्बन्ध में उल्लेख किया गया। इससे प्रतीत होता है कि ये व्यवहार में स्वभावसत्ता मानते हैं। फलत: इनके मतानुसार पुद्गल और धर्मों की परमार्थत: सत्ता नहीं होती, किन्तु उनकी व्यवहारत: सत्ता मान्य है।

व्यवहारत: बाह्यार्थ सत्ता पर विचार
आचार्य शान्तरक्षित ने अपने मध्यमकालङ्कार भाष्य में कार्य और कारण की सांवृतिक सत्ता के स्वरूप पर विचार किया है। उन्होंने वहाँ यह पूर्वपक्ष उपस्थित किया है कि संवृतिसत् धर्म मात्र चित्तचैत्तात्मक (विज्ञप्तिमात्रात्मक) हैं या उनकी बाह्यार्थत: सत्ता होती हैं? इसका समाधान करते हुए उन्होंने लिखा है कि उनकी बाह्यार्थत: सत्ता कथमपि नहीं होती अर्थात् उनकी बाह्यात: सत्ता मानना नितान्त युक्तिविरुद्ध है। इसके लिए उन्होंने सहोपलम्भ युक्ति का वहाँ प्रयोग किया है तथा स्वप्न, माया आदि दृष्टान्तों के द्वारा व्यवहारत: उनकी विज्ञप्तिमात्रात्मकता प्रतिपादित की है।

आर्यसन्धिनिर्मोचनसूत्र का वास्तविक अर्थ
'परिकल्पितलक्षण लक्षणनि:स्वभाव हैं तथा अवशिष्ट दोनों लक्षण अर्थात परतन्त्र और परिनिष्पन्न लक्षण वैसे नहीं हैं'- आर्यसन्धिनिर्मोचन के इस वचन का आचार्य शान्तरक्षित यह अर्थ ग्रहण करते हैं कि परतन्त्र लक्षण और परिनिष्पन्न लक्षण लक्षणनि:स्वभाव नहीं है, अपितु उनकी स्वलक्षण सत्ता है। किन्तु उनकी वह स्वलक्षण सत्ता पारमार्थिक नहीं, अपितु व्यावहारिक (सांवृतिक) है। परतन्त्र और परिनिष्पन्न की परमार्थत: सत्ता मानना नितान्त परिकल्पित है और उस परिकल्पित की परमार्थत: सत्ता शशश्रृङ्गवत् सर्वथा अलीक है। आशय यह है कि परतन्त्र और परिनिष्पन्न की परमार्थत: सत्ता परिकल्पित है और वह परिकल्पित लक्षणनि:स्वभाव (शशश्रृङ्गवत्) है। विज्ञान के गर्भ में उनकी व्यावहारिक (संवृतित:) स्वलक्षणसत्ता मानने में आपत्ति नहीं है। जो आकाश आदि परिकल्पितलक्षण हैं, वे शशश्रृङ्गवत् सर्वथा अलीक नहीं हैं, अपितु उनकी सांवृतिक सत्ता होती है। पारमार्थिक सत्ता की तो सांवृतिक सत्ता भी नहीं है।

परमार्थत: सत्ता का खण्डन करने वाली प्रधान युक्ति
ज्ञात है कि माध्यमिक शून्यतावादी हैं। शून्यता के द्वारा जिसका निषेध किया जाता है, उस निषेध्य का पहले निश्चय कर लेना चाहिए। तभी शून्यता का स्वरूप स्पष्ट होता है, क्येंकि निषेध्य का निषेध ही शून्यता है। निषेध्य में फ़र्क़ होने के कारण माध्यमिकों के आन्तरिक भेद होते हैं। अत: इस मत के अनुसार निषेध्य के स्वरूप का निर्धारण किया जा रहा है।

प्रासंगिक माध्यमिक

जो माध्यमिक केवल 'प्रसंग' का प्रयोग करते हैं, वे प्रासंगिक माध्यमिक कहलाते हैं। सभी भारतीय दर्शनों मे स्वपक्ष की स्थापना और परपक्ष के निराकरण की विधा दृष्टिगोचर होती हैं माध्यमिक सभी धर्मों को नि:स्वभाव (शून्य) मानते हैं। प्रासंगिक माध्यमिकों का कहना है कि जब हेतु, साध्य, पक्ष आदि सभी शून्य है तो ऐसी स्थिति में यह उचित नहीं है कि शून्यता को साध्य बनाकर उसे हेतु प्रयोग आदि के द्वारा सिद्ध किया जाए। इस स्थिति में एक ही उपाय अवशिष्ट रहता है कि जो दार्शनिक हेतुओं के द्वारा वस्तुसत्ता सिद्ध करते हैं, उनके प्रयोगों (अनुमानप्रयोगों) में दोष दिखाकर यह सिद्ध किया जाए कि उनके साधन उनके साध्य को सिद्ध करने में असमर्थ हैं। इस उपाय से जब स्वभाव सत्ता (वस्तुसत्ता) सिद्ध नहीं होगी तो यही नि:स्वभावता की सिद्धि होगी अर्थात स्वभावसत्ता का निषेध ही नि:स्वभावता की सिद्धि है। इसलिए परपक्ष का निराकरण मात्र माध्यमिक को करना चाहिए। स्वतन्त्र रूप से हेतुओं का प्रयोग करके स्वपक्ष की सिद्धि करना माध्यमिकों के विचारों के वातावरण के सर्वथा विपरीत है। अत: परपक्ष निराकरण मात्र पर बल देने के कारण ये लोग 'प्रासंगिक' माध्यमिक कहलाते हैं। जबकि भावविवेक, शान्तरक्षित आदि माध्यमिक आचार्य इन विचारों से सहमत नहीं हैं, उनका कहना है कि सभी धर्मों के परमार्थत: नि:स्वभाव (शून्य) होने पर भी व्यवहार में उनकी सत्ता होती है, अत: स्वतन्त्र रूप से हेतु, दृष्टान्त आदि का प्रयोग करके शून्यता की सिद्धि की जा सकती है। अत: ये लोग 'स्वातन्त्रिक' माध्यमिक कहलाते हैं। ज्ञात है कि प्रासंगिक व्यवहार में भी वस्तु की सत्ता नहीं मानते। इन्हीं उपर्युक्त बातों के आधार पर स्वातन्त्रिक और प्रासंगिक माध्यमिकों ने अपने-अपने ढंग से अपने-अपने दर्शनों का विकास किया है।

धर्मनैरात्म्य

पुद्गलनैरात्म्य

न स्वतो नापि परतो न द्वाभ्यां नाप्यहेतुत:।
उत्पन्ना जातु विद्यन्ते भावा: क्कचन केचन॥

इस कारिका को प्रस्तुत किया है। फलत: धर्मनैरात्म्य (शून्यता) को सिद्ध करने की प्रमुख युक्ति उनके अनुसार यही चतुष्कोटिकोत्पादानुपपत्ति युक्ति ही है।

टीका टिप्पणी

  1. यदि आत्मा और स्कन्ध एक है तो वे दोनों अत्यन्त अभिन्न हो जाएंगे। फलत: जैसे स्कन्ध अनेक हैं, वैसे आत्मा को भी अनेक मानना पड़ेगा अथवा जैसे आत्मा एक है, वैसे स्कन्धों को भी एक मानना पड़ेगा। स्कन्धों की भाँति आत्मा भी अनित्य हो जाएगा। अथवा आत्मा की भाँति स्कन्ध भी नित्य हो जाएंगे। यदि आत्मा और स्कन्ध भिन्न हैं तो युक्तियों द्वारा उन्हें सर्वथा भिन्न ही रहना चाहिए। ऐसी स्थिति में शरीर के रुग्ण या जीर्ण होने पर मैं 'रुग्ण हूँ जीर्ण हूँ' – इस प्रतीति से विरोध होगा अर्थात ऐसी प्रतीति नहीं होनी चाहिए। भेद के इस सिद्धान्त को वादी कल्पित नहीं मानता, अत: वह ऐसा नहीं कह सकता कि यह भिन्नता प्रातिभासिक दृष्टि से है। पुनश्च उसे आत्मा को पृथक् दिखलाना होगा।
  2. रूप आदि वस्तुएं, स्वभावत: अनुत्पन्न हैं, स्वत: परत: उभयत: एवं अहेतुक: उत्पन्न न होने से।
  3. रूप आदि वस्तुएं, स्वभावत: अनुत्पन्न हैं, हेतु के काल में सत् अथवा असत् होते हुए उत्पन्न न होने से।
  4. रूप आदि वस्तुएं, स्वभावत: अनुत्पन्न हैं, एक हेतु से अनेक फल, अनेक हेतुओं से एक फल, अनेक हेतुओं से अनेक फल तथा एक ही हेतु से एक फल उत्पन्न न होने से
  5. रूप आदि धर्म, नि:स्वभाव हैं, प्रतीत्यसमुत्पन्न होने से।
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