रक्षाबन्धन

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रक्षाबन्धन / Raksha Bandhan

भाई - बहन के प्रेम व रक्षा का त्योहार

होली, दीवाली और दशहरे की तरह यह भी हिंदुओं का प्रमुख त्यौहार है। यह भाई-बहन को स्नेह की डोर से बांधने वाला त्यौहार है। यह त्यौहार भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक है। रक्षाबंधन का अर्थ है (रक्षा+बंधन) अर्थात किसी को अपनी रक्षा के लिए बांध लेना। इसीलिए राखी बांधते समय बहन कहती है-'भैया! मैं तुम्हारी शरण में हूं, मेरी सब प्रकार से रक्षा करना।' आज के दिन बहन अपने भाई के हाथ में राखी बांधती है और उन्हें मिठाई खिलाती है। फलस्वरूप भाई भी अपनी बहन को रुपये या उपहार आदि देते हैं। रक्षाबंधन स्नेह का वह अमूल्य बंधन है जिसका बदला धन तो क्या सर्वस्व देकर भी नहीं चुकाया जा सकता।

रक्षासूत्र

विषय सूची

भारतीय परम्परा में विश्वास का बन्धन ही मूल है और रक्षाबन्धन इसी विश्वास का बन्धन है। यह पर्व मात्र रक्षा-सूत्र के रूप में राखी बाँधकर रक्षा का वचन ही नहीं देता वरन् प्रेम, समर्पण, निष्ठा व संकल्प के जरिए हृदयों को बाँधने का भी वचन देता है। पहले रक्षा बन्धन बहन-भाई तक ही सीमित नहीं था, अपितु आपत्ति आने पर अपनी रक्षा के लिए अथवा किसी की आयु और आरोग्य की वृद्धि के लिये किसी को भी रक्षा-सूत्र (राखी) बांधा या भेजा जाता था। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि- ‘मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव’- अर्थात ‘सूत्र’ अविच्छिन्नता का प्रतीक है, क्योंकि सूत्र (धागा) बिखरे हुए मोतियों को अपने में पिरोकर एक माला के रूप में एकाकार बनाता है। माला के सूत्र की तरह रक्षा-सूत्र (राखी) भी लोगों को जोड़ता है। गीता में ही लिखा गया है कि जब संसार में नैतिक मूल्यों में कमी आने लगती है, तब ज्योतिर्लिंगम भगवान शिव प्रजापति ब्रह्मा द्वारा धरती पर पवित्र धागे भेजते हैं, जिन्हें बहनें मंगलकामना करते हुए भाइयों को बाँधती हैं और भगवान शिव उन्हें नकारात्मक विचारों से दूर रखते हुए दुख और पीड़ा से निजात दिलाते हैं।[1]

भाई को राखी बांधती बहन

श्रावण शुक्ल की पूर्णिमा को भारतवर्ष में भाई - बहन के प्रेम व रक्षा का पवित्र त्योहार 'रक्षाबन्धन' मनाया जाता हैं। सावन में मनाए जाने के कारण इसे सावनी या सलूनो भी कहते हैं।भ्रातप्रेम को प्रगाढ़ बनाता रक्षाबंधन का पर्व भाई व बहन के अनकहे स्नेह - शपथ का परिचायक है। रक्षाबंधन श्रावण की पूर्णिमा के दिन प्रतिवर्ष अगस्त के महीने में मनाया जाता है। इसी दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी का कोमल धागा बाँधती हैं। यह धागा उनके बीच प्रेम व स्नेह का प्रतीक होता है। यही धागा भाई को प्रतिबद्ध करता है कि वह अपनी बहन की हर कठिनाई व कष्ट में रक्षा करेगा।[2]

इस दिन भाई बहनों के घर जाते हैं। बहनें अपने भाई के आने की खुशी में अपने घरों को सजाती हैं। घरों को लीप - पोत कर दरवाज़ों पर आम तथा केले के पत्तों के बन्दनवार लगाती हैं। स्नान - ध्यान करके अगरबत्ती व धूप जलाती हैं। तरह - तरह के स्वादिष्ट भोजन बनाती हैं। जब तक भाई नहीं आते हैं तब तक खाना नहीं खातीं और अपने भाई के आने की प्रतीज्ञा में बैठी रहती हैं। भाई के आने पर बहनें थालों में फल, फूल, मिठाइयाँ, रोली, चावल तथा राखियाँ रखकर भाई का स्वागत करती हैं। रोली - चावल से भाई का तिलक करती हैं और उसके दाएँ हाथ में राखी बाँधती हैं। राखी बहन के पवित्र प्रेम और रक्षा की डोरी है। राखी की डोरी में ऐसी शक्ति है जो हर मुसीबत से भाई की रक्षा करती है। बहनें भाइयों को राखी बाँधकर परमेश्वर से दुआ माँगती हैं कि उनके भाई सदा सुरक्षित रहें। इस मायावी संसार में अच्छे कर्म करते हुए नैतिक जीवन बिताएं। भाई भी राखी बँधवाकर बहन से यह प्रतिज्ञा करते हैं कि अगर बहन पर कोई संकट या मुसीबत आए, वह उस संकट का निवारण करने में बहन की सहायता करने के लिए अपनी जान की भी बाज़ी लगा देंगे। कई भाई जो बहुत दूर रहते हैं और वह बहन के घर नहीं जा पाते, वह मनीऑर्डर के द्वारा अपनी बहनों के पास रुपये भेज देते हैं और बहनें डाक के द्वारा अपने भाई के पास राखियाँ भेज देती हैं। कई जगह बहनें ही अपने भाई के घर जाकर उन्हें राखी बाँधती हैं। भाई बहनों को मिठाई, कपड़े, नक़द रुपये तथा बहुमूल्य उपहार देते हैं।

भाई-बहन का हार्दिक प्रेम और भावना ही इस त्यौहार का वास्तविक महत्व है। राखी का त्यौहार पूरे देश में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। आज के दिन बहनें स्नान करके अपने घर में दीवारों पर सोन रखती हैं और फिर सेवइयों, चावल की खीर और मिठाई से इनकी पूजा करती है। सोनों (श्रवण­) के ऊपर खीर या मिठाई की सहायता से राखी के धागे चिपकाए जाते हैं। जो स्त्रियां नागपंचमी को गेहूं आदि बोती हैं, वे इन छोटे-पौधों को पूजा में रखती हैं और भाइयों के हाथों में राखी बांधने के बाद इन पौधों को भाइयों क कानों मेंलगा देती हैं।

रक्षाबंधन के विभिन्न स्वरूप

राखी थाली
Rakhi Thali

उपाकर्म संस्कार

इसके अतिरिक्त इस दिन ऋषि - महर्षि उपाकर्म कराकर व्यक्तियों को विद्या - अध्ययन कराना आरम्भ करते हैं। दूध, दही, घी, गोबर और गऊ मूत्र मिलाकर पंचगव्य बनाते हैं और उसे पान करते हैं तथा हवन करते हैं। इसे उपाकर्म कहते हैं। उपाकर्म संस्कार कराकर जब व्यक्ति अपने घर लौटते हैं तब बहनें उनका स्वागत करती हैं और उनके दाएँ हाथ में राखी बाँधती हैं। इस विधान से भी श्रावणी शुक्ल पूर्णिमा को रक्षाबन्धन का त्यौहार मनाया जाता है।

उत्सर्ज क्रिया

श्रावणी शुक्ल पूर्णिमा को सूर्य को जल चढ़ाकर सूर्य की स्तुति करते हैं तथा अरुन्धती सहित सप्त ऋषियों की पूजा करते हैं और दही - सत्तू की आहुतियाँ देते हैं। इस क्रिया को उत्सर्ज कहते हैं। यह उत्सज क्रिया भी श्रावणी शुक्ल की पूर्णिमा को होती है।[3]

बहिनों की रक्षा का महोत्सव

रक्षाबंधन बहिन और भाई के स्नेह का त्योहार है। पूरा दिन उल्लास व हर्षपूर्ण होता है। घरों की सफाई होती है तथा बहनें सुबह स्नानादि के पश्चात अधीरता से अपने भाई की प्रतीक्षा करती हैं कि वे आएँ, ताकि उन्हें राखी का पवित्र धागा बाँधा जा सके। जब तक भाई को राखी न बाँधें तब तक बहनें व्रत रखती हैं। राखी बाँधने के बाद ही खाना खाती हैं। राखी बँधवा कर भाई अपनी बहनों को अनेक प्रकार की भेंट प्रदान करते हैं। विगत समय में यह त्यौहार पति - पत्नि के आपसी प्रेम और स्त्री की सौभाग्य रक्षा का प्रतीक था।

ब्राह्मण, पुरोहित और यजमान

रक्षा बंधन के दिन देश में कई स्थानों पर ब्राह्मण, पुरोहित भी अपने यजमान की समृद्धि हेतु उन्हें रक्षा बाँधते हैं, जिसकी उन्हें दक्षिणा भी मिलती है। रक्षा बाँधते समय ब्राह्मण यह मंत्र पढ़ता जाता है —

येन बद्धो बली राजा, दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वां प्रतिबध्नामि, रक्षे! मा चल! मां चल!!

अर्थ—जिस प्रकार के उद्देश्य पूर्ति हेतु दानव - सम्राट महाबली, रक्षा - सूत्र से बाँधा गया था (रक्षा सूत्र के प्रभाव से वह वामन भगवान को अपना सर्वस्व दान करते समय विचलित नहीं हुआ), उसी प्रकार हे रक्षा सूत्र! आज मैं तुम्हें बाँधता हूँ। तू भी अपने उद्देश्य से विचलित न हो, दृढ़ बना रहे।

राखी का धार्मिक महत्व

रक्षाबंधन का पर्व प्रत्येक भारतीय घर में उल्लासपूर्ण वातावरण से प्रारम्भ होता है। राखी, पर्व के दिन या एक दिन पूर्व ख़रीदी जाती है। पारम्परिक भोजन व व्यंजन प्रातः ही बनाए जाते हैं। प्रातः शीघ्र उठकर बहनें स्नान के पश्चात भाइयों को तिलक लगाती हैं तथा उसकी दाहिने कलाई पर राखी बाँधती हैं। इसके पश्चात भाइयों को कुछ मीठा खिलाया जाता है। भाई अपनी बहन को भेंट देता है। बहन अपने भाइयों को राखी बाँधते समय सौ - सौ मनौतियाँ मनाती हैं।[4]

महाराष्ट्र में नारियल पूजन

दुकान पर राखी
Rakhi On Shop

मुंबई में रक्षाबंधन पर्व को नारली (नारियल) पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। जल के देवता वरुण को प्रसन्न करने के लिए समुद्र को (नारियल) अर्पित किए जाते हैं। वरुणदेव ही पूजा के मुख्य देवता होते हैं। नारियल की 'तीन आँखें' होती हैं। इस बारे में ऐसा विश्वास किया जाता है कि ये भगवान शिव के त्रिनेत्रों की प्रतीक हैं। इसीलिए इस पर्व पर नारियल या गोले के पूजन की विशेष धार्मिक महत्ता है। घर में बहनें भाइयों को राखी बाँधती हैं और उसका पूजन करके, मिठाई खिलाकर उनसे उपहार भी प्राप्त करती हैं। इसी दिन महाराष्ट्रियों में कृष्ण यजुर्वेदी शाखा की श्रावणी का भी विधान है। पुरुष किसी बड़े घर में विभिन्न मंत्रोच्चार के साथ भगवान का पूजन हवन करते हैं। फिर नये यज्ञोपवीत को प्रतिष्ठित अभिमंत्रित करके पहनते हैं।

दक्षिण भारत में अवनि अवित्तम

इस त्यौहार को दक्षिण भारत में अवनि अवित्तम के रूप में मनाया जाता है। इस दिन ब्राह्मण नया पवित्र यज्ञोपवीत धारण करते हैं तथा प्राचीन ऋषियों को जल अर्पित करते हैं।[5]

रक्षाबंधन की अमर कथाएँ

इतिहास में इस पर्व से जुड़ी अनेक कथाएँ मिलती हैं।

शास्त्रों के अनुसार रक्षाबंधन

कलाई पर राखी

श्रावण की पूर्णिमा को अपरान्ह में एक कृत्य होता है, जिसे रक्षाबन्धन कहते हैं। श्रावण की पूर्णिमा को सूर्योदय के पूर्व उठकर देवों, ब्राह्मणों एवं पितरों का तर्पण करने के उपरान्त अक्षत, तिल, धागों से युक्त रक्षा बनाकर धारण करना चाहिए। राजा के लिए महल के एक वर्गाकार भूमि-स्थल पर जल-पात्र रखा जाना चाहिए, राजा को मन्त्रियों के साथ आसन ग्रहण करना चाहिए, वेश्याओं से घिरे रहने पर गानों एवं आर्शीवचनों का ताँता लगा रहना चाहिए; देवों ब्राह्मणों एवं अस्त्र-वस्त्र का सम्मान किया जाना चाहिए, तत्पश्चात राजपुरोहित को चाहिए कि वह मन्त्र के साथ 'रक्षा' बाँधे'–'आपको वह रक्षा बाँधता हूँ, जिससे दानवों के राजा बलि बाँधे गये थे, हे रक्षा, तुम (यहाँ) से न हटो, न हटो।'[6] सभी लोगों को यहाँ तक शूद्रों को भी, यथाशक्ति पुरोहितों को प्रसन्न करके रक्षा-बन्धन बँधवाना चाहिए। जब ऐसा कर दिया जाता है तो व्यक्ति वर्ष भर प्रसन्नता के साथ रहता है।

पौराणिक कथा

भविष्य पुराण में कथा के अनुसार प्राचीनकाल में एक बार बारह वर्षों तक देवासुर - संग्राम होता रहा, जिसमें देवताओं की हार हो रही थी। दुःखी और पराजित इन्द्र, गुरु बृहस्पति के पास गए। वहाँ इन्द्र पत्नी शचि भी थीं। इन्द्र की व्यथा जानकर इन्द्राणी ने कहा - 'कल ब्राह्मण शुक्ल पूर्णिमा है। मैं विधानपूर्वक रक्षासूत्र तैयार करूँगी। उसे आप स्वस्तिवाचन पूर्वक ब्राह्मणों से बंधवा लीजिएगा। आप अवश्य ही विजयी होंगे।' दूसरे दिन इन्द्र ने इन्द्राणी द्वारा बनाए रक्षाविधान का स्वस्तिवाचन पूर्वक बृहस्पति से रक्षाबंधन कराया, जिसके प्रभाव से इन्द्र सहित देवताओं की विजय हुई। तभी से यह 'रक्षाबंधन' पर्व ब्राह्मणों के माध्यम से मनाया जाने लगा। इस दिन बहनें भी भाइयों की कलाई में रक्षासूत्र बाँधती हैं और उनके सुखद जीवन की कामना करती हैं।

ग्रीक नरेश सिकन्दर की कथा

ऐसा कहा जाता है कि ग्रीक नरेश सिकन्दर की पत्नी ने अपने पति की रक्षा के लिए उसके शत्रु पुरुराज को राखी बाँधी थी। कथानुसार युद्ध के समय पुरु ने जैसे ही सिकन्दर पर प्राण घातक आक्रमण किया, उसे उसकी कलाई पर बंधी रक्षा दिखाई दी, जिसके कारण उसने सिकन्दर को अभय प्रदान किया और युद्ध में अनेक बार सिकन्दर को प्राणदान दिया।[8]

राजकुमारी कर्मवती की कथा

मध्यकालीन इतिहास में भी ऐसी ही एक घटना मिलती है। चित्तौड़ की हिन्दू रानी कर्मावती ने दिल्ली के मुग़ल बादशाह हुमायूं को अपना भाई मानकर उसके पास राखी भेजी थी। हुमायूं ने उसकी राखी स्वीकार कर ली और उसके सम्मान की रक्षा के लिए गुजरात के बादशाह बहादुरशाह से युद्ध किया। महारानी कर्मवती की कथा इसके लिए अत्यन्त प्रसिद्ध है, जिसने हुमायूँ को राखी भेजकर रक्षा के लिए आमंत्रित किया था। रानी कर्मवती ने सम्राट हुमायूँ के पास राखी भेजकर उसे अपना भाई बनाया था। सम्राट हुमायूँ ने रानी कर्मवती को अपनी बहन बनाकर उसकी दिलो - जान से मदद की थी। राखी के पवित्र बन्धन ने दोनों को बहन - भाई के पवित्र रिश्ते में बाँध दिया था। मर्मस्पर्शी कथानुसार, राजपूत राजकुमारी कर्मवती ने मुग़ल सम्राट हुमायूँ को गुजरात के सुल्तान द्वारा हो रहे आक्रमण से रक्षा के लिए राखी भेजी थी। यद्यपि हुमायूँ किसी अन्य कार्य में व्यस्त था, वह शीघ्र से बहन की रक्षा के लिए चल पड़ा। परन्तु जब वह पहुँचा, तो उसे यह जानकर बहुत दुख हुआ कि राजकुमारी के राज्य को हड़प लिया गया था तथा अपने सम्मान की रक्षा हेतु रानी कर्मवती ने 'जौहर' कर लिया था।

महाभारत की कथा

इस त्योहार का इतिहास हिन्दू पुराण कथाओं में मिलता है। महाभारत में कृष्ण ने शिशुपाल का वध अपने चक्र से किया था। शिशुपाल का सिर काटने के बाद जब चक्र वापस कृष्ण के पास आया तो उस समय कृष्ण की उंगली कट गई भगवान कृष्ण के उंगली से खून निकलने लगा। यह देखकर द्रौपदी ने अपनी साडी़ का किनारा फाड़ कर कृष्ण की उंगली में बांधा था, जिसको लेकर कृष्ण ने उसकी रक्षा करने का वचन दिया था। इसी ऋण को चुकाने के लिए दु:शासन द्वारा चीरहरण करते समय कृष्ण ने द्रौपदी की लाज रखी। तब से 'रक्षाबंधन' का पर्व मनाने का चलन चला आ रहा है।

महाभारत से अन्य कथा

एक बार युधिष्ठिर ने कृष्ण भगवान से पूछा-'हे अच्युत! मुझे रक्षाबन्धन की वह कथा सुनाइए जिससे मनुष्यों की प्रेतबाधा और दुख दूर होता है। इस पर भगवान बोले- 'हे पाण्डव श्रेष्ठ! प्राचीन समय में एक बार देवों तथा असुरों में बारह वर्षों तक युद्ध हुआ। संग्राम में देवराज इंद्र की पराजय हुई। देवता कान्तिविहीन हो गए। इंद्र रणभूमि छोड़कर विजय की आशा को तिलांजलि देकर देवताओं सहित अमरावती चला गया। विजेता दैत्यराज ने तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया और राजपद में घोषित कर दिया कि इंद्रदेव सभा में न आएं तथा देवता एवं मनुष्य यज्ञ कर्म न करें। सब लोग मेरी पूजा करें, जिसको इसमें आपत्ति हो वह राज्य छोड़कर चला जाए।

दैत्यराज की इस आज्ञा से यज्ञ, वेद, पठन, पाठन तथा उत्सव समाप्त कर दिए गए। धर्म का नाश होने से देवों का बल घटने लगा। इधर इंद्र दानवों से भयभीत होकर देवगुरु बृहस्पति को बुलाकर कहने लगा- 'हे गुरु! मैं शत्रुओं से घिरा हुआ प्राणान्त संग्राम करना चाहता हूं। होनी बलवान होती है, जो होना है होकर रहेगा। पहले तो बृहस्पति ने समझाया कि क्रोध करना व्यर्थ है। परंतु इंद्र की हठधर्मिता तथा उत्साह देखकर रक्षा विधान करने को कहा। श्रावण पूर्णिमा को प्रात:काल ही रक्षा का विधान सम्पन्न किया गया।

'येनवद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वाममिवध्नामि रक्षे माचल माचल।।'

उक्त मन्त्रोच्चारण से देवगुरु ने श्रावणी के ही दिन रक्षा विधान किया। सहधर्मिणी इंद्राणी के साथ वृत्त संहारक इंद्र ने बृहस्पति की उस वाणी का अक्षरश: पालन किया और दानवों पर विजय प्राप्त की।

राजा बलि की कथा

भाई को राखी बांधती बहन

एक अन्य कथानुसार राजा बलि को दिये गये वचनानुसार भगवान विष्णु बैकुण्ठ छोड़कर बलि के राज्य की रक्षा के लिये चले गय। तब देवी लक्ष्मी ने ब्राह्मणी का रूप धर श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बलि की कलाई पर पवित्र धागा बाँधा और उसके लिए मंगलकामना की। इससे प्रभावित हो बलि ने देवी को अपनी बहन मानते हुए उसकी रक्षा की कसम खायी। तत्पश्चात देवी लक्ष्मी अपने असली रूप में प्रकट हो गयीं और उनके कहने से बलि ने भगवान विष्णु से बैकुण्ठ वापस लौटने की विनती की।

रामायण में

त्रेता युग में रावण की बहन शूर्पणखा लक्ष्मण द्वारा नाक कटने के पश्चात रावण के पास पहुँची और रक्त से सनी साड़ी का एक छोर फाड़कर रावण की कलाई में बाँध दिया और कहा कि- भैया! जब-जब तुम अपनी कलाई को देखोगे, तुम्हें अपनी बहन का अपमान याद आएगा और मेरी नाक काटनेवालों से तुम बदला ले सकोगे।'

साहित्यिक संदर्भ

फिल्मों में रक्षाबंधन

विशेष

एक रोचक घटनाक्रम में हरियाणा राज्य में अवस्थित कैथल जनपद के फतेहपुर गाँव में सन 1857 में एक युवक गिरधर लाल को रक्षाबन्धन के दिन अंग्रेजों ने तोप से बाँधकर उड़ा दिया, इसके बाद से गाँव के लोगों ने गिरधर लाल को शहीद का दर्जा देते हुए रक्षाबन्धन पर्व मनाना ही बंद कर दिया। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 150 वर्ष पूरे होने पर सन 2006 में जाकर इस गाँव के लोगों ने इस पर्व को पुन: मनाने का संकल्प लिया।

डाक विभाग की तैयारी

भारत सरकार के डाक-तार विभाग द्वारा इस अवसर पर दस रूपए वाले आकर्षण लिफाफों की बिक्री की जाती हैं। लिफाफे की कीमत 5 रूपए और 5 रूपए डाक का शुल्क। इसमें राखी पर बहनें, भाई को मात्र पांच रूपए में एक साथ तीन-चार राखियाँ भेज सकती हैं। डाक विभाग की ओर से बहनों को दिए इस तोहफे के तहत 50 ग्राम वजन तक राखी का लिफाफा पांच रूपए में भेजा जा सकता है जबकि सामान्य 20 ग्राम के लिफाफे में एक राखी ही भेजी जा सकती है। यह सुविधा रक्षाबंधन तक ही उपलब्ध रहती हैं। रक्षाबंधन के अवसर पर बरसात के मौसम का ध्यान रखते हुए डाक-तार विभाग ने बारिश से खराब न होने वाले वाटरप्रूफ लिफाफे उपलब्ध कराए हैं। ये लिफाफे अन्य लिफाफों से भिन्‍न हैं। इसका आकार और डिजाइन भी अलग है और इसके अलग डिजाइन के कारण राखी इसमें ज्यादा सुरक्षित रहती है। डाक-तार विभाग पर रक्षाबंधन के अवसर पर 20 प्रतिशत अधिक काम का बोझ पड़ता है। अतः राखी को सुरक्षित और तेजी से पहुँचाने के लिए विशेष उपाय किए जाते हैं और काम के हिसाब से इसमें सेवानिवृत डाककर्मियों की भी सेवा ली जाती है। कुछ बड़े शहरों के बड़े डाकघरों में राखी के लिए अलग से बॉक्स भी लगाए जाते हैं। इसके साथ ही चुनिन्दा डाकघरों में सम्पर्क करने वाले लोगों को राखी बेचने की भी इजाजत दी जाती है, ताकि लोग वहीं से राखी ख़रीद कर निर्धारित स्थान को भेज सकें।[10]

आधुनिक तकनीक और राखी

आज के आधुनिक तकनीकी युग एवं सूचना संप्रेषण युग का प्रभाव राखी जैसे त्यौहार पर भी पड़ा है। कई सारे भारतीय आजकल विदेश में रहते हैं एव उनके परिवार वाले (भाई एवं बहन) अभी भी भारत या अन्य देशों में हैं। इंटरनेट के आने के बाद कई सारी ई-कॉमर्स साइट खुल गई हैं जो ऑनलाइन आर्डर मंजूर करती हैं एवं राखी दिये गये पते पर पहुँचा दी जाती है। इसके अतिरिक्‍त भारत में राखी के अवसर पर इस पर्व से संबंधित एनीमेटेड सीडी भी आई है, जिसमें एक बहन द्वारा भाई को टीका करने व राखी बाँधने का चलचित्र है। यह सीडी राखी के अवसर पर अनेक बहनों ने दूर रहने वाले अपने भाइयों को भेजी।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. मानवीय रिश्तों को एक धागे में बाँधता रक्षाबन्धन पर्व (हिंदी) (एच टी एम एल)। अभिगमन तिथि: 14 अगस्त, 2010।
  2. जयपुर के प्रमुख त्यौहार (हिंदी) (एच टी एम एल)। अभिगमन तिथि: 14 अगस्त, 2010।
  3. कुमाऊँ के पर्वोत्सव व त्यौहार (हिंदी) (एच टी एम एल)। अभिगमन तिथि: 14 अगस्त, 2010।
  4. रक्षा बंधन (हिंदी) (एच टी एम)। अभिगमन तिथि: 14 अगस्त, 2010।
  5. Raksha Bandhan in History (English) (एच टी एम एल)। raksha-bandhan.com। अभिगमन तिथि: 14 अगस्त, 2010।
  6. देवद्विजातिशस्ता सुस्त्रीरर्घ्येः समर्चयेत् प्रथमम्। तदनु पुरोघा नृपतेः रक्षां वघ्नीत मन्त्रेण।। येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामभिबध्नामि रक्षा मा चल मा चल।। भिविष्योत्तर पुराण (137|19-20)।
  7. पुस्तक "धर्मकोश का इतिहास-भाग 4" से) पृष्ठ संख्या 52 पर
  8. Raksha Bandhan in History (English) (एच टी एम एल)। raksha-bandhan.com। अभिगमन तिथि: 14 अगस्त, 2010।
  9. रक्षाबंधन से जुड़ी 5 रोचक बातें (हिंदी) (एच टी एम एल)। तरकश। अभिगमन तिथि: 14 अगस्त, 2010।
  10. रक्षाबंधन : स्वरूप एवं संदर्भ (हिंदी) (एच टी एम एल)। समयदर्पण। अभिगमन तिथि: 14 अगस्त, 2010।

बाहरी कड़ियाँ

राखी (हिंदी) (एच टी एम एल)। अभिगमन तिथि: 14 अगस्त, 2010।

राखी (हिंदी) (एच टी एम एल)। दादीमाँ वर्डप्रेस। अभिगमन तिथि: 14 अगस्त, 2010।

रक्षा बंधन मुहूर्त 24 अगस्त 2010 (हिंदी) (एच टी एम एल)। अभिगमन तिथि: 14 अगस्त, 2010।

भाई-बहन का पवित्र त्यौहार रक्षा बंधन (हिंदी) (एच टी एम एल)। विवेक अंजन। अभिगमन तिथि: 14 अगस्त, 2010।

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