रसखान का दर्शन

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रसखान का दर्शन

विषय सूची

साहित्य, दर्शन और जीवन तीनों एक दूसरे के पूरक हैं। साहित्य जीवन को हृदय द्वारा समझने का प्रयास है, और दर्शन उसे मस्तिष्क के द्वारा समझता है। मस्तिष्क जीवन को जिस रूप में समझता है साहित्य उसी को सरस बनाकर जन-जन के मन में उतारने का प्रयास करता है। दर्शन जीवन की गहराइयों का ठीक-ठीक पता बताता है। साहित्य उसे जन-जन के लिए सुलभ करता है। जैसे ईश्वर-प्राप्ति के लिए ज्ञान और भक्ति दो अलग-अलग मार्ग हैं, वैसे ही साहित्य और दर्शन में दोनों की पहुंच एक ही तथ्य तक है। दोनों का प्रतिपाद्य विषय भी एक ही है। साक्षात ज्ञान के समान दर्शन को श्रेय और साहित्य को प्रेम तक कहने की उदारता करते हैं।

उपर्युक्त मतों में अधिकांश इस विषय पर एकमत हैं कि ये प्रेम के दीवाने थे। इनकी भक्ति में प्रेम की प्रधानता है।

आनन्द-अनुभव होत नहिं बिना प्रेम जग जान।
कै वह विषयानन्द कै ब्रह्मानंद बखान ॥*

इसीलिए वे कृष्ण भक्ति की ओर आकृष्ट और लीन हुए। इसी कारण से उन्हें शुद्ध भक्त न मानकर प्रमोमंग का कवि माना जाता है। वे बिहारी, घनानंद, रहीम, रसखान, आलम, शेख को भक्ति के पद रचने पर भी उनको शुद्ध भक्त कहने में हिचक प्रकट करते हैं। रसखान ने कृष्ण भक्ति दर्शन में वल्लभाचार्य जी का शुद्धाद्वैतवाद, निंबार्क का द्वैताद्वैतवाद, मध्वाचार्य का द्वैतवाद अथवा चैतन्य महाप्रभु के अचिंत्य भेदाभेद किसी का भी अनुसरण नहीं किया। वल्लभाचार्य जी ने हृदय के संस्कार और विकास की दृष्टि से ईश्वर भक्ति अर्थात अलौकिक प्रेम को ही साध्य माना है किन्तु रसखान लौकिक प्रेम को साध्य मानते हुए कहते हैं—

अकथ कहानी प्रेम की, जानत लैली ख़ूब।
दो तनहूँ जहँ एक भे, मन मिलाइ महबूब॥*

इस प्रकार यह शुद्ध अद्वैतवादी पुष्टि मार्ग से भी अलग हो जाते हैं। मिश्र जी के अनुसार रसखान ने भक्तों की गीति और रीति दोनों का ही त्याग कर दिया। इसी से उन्हें स्वच्छंद मार्गी प्रेमोन्मत्त गायक ही कहा जा सकता है भक्त नहीं। यद्यपि मिश्र जी का विवेचन अत्यन्त तर्कपूर्ण है किन्तु फिर भी कुछ विचारणीय विषय रह जाता है। ग्रंथावली की भूमिका में स्थान-स्थान पर यह कहा गया है यदि कोई इन्हें भक्ति विषयक रचना के कारण भक्त कहता है तो कहे, स्वच्छंद प्रेममार्गी भक्त कहा जाय तो कोई बाधा नहीं।* इन बातों से यह स्पष्ट हो गया कि मिश्र जी इनकी कविता को भक्ति का विषय मानते हैं और अगर कोई इन्हें भक्त कवि कहे तो उसमें कोई आपत्ति भी नहीं मानते। यहाँ तक कि जब उन्हें भक्तों की श्रेणी से खारिज करने की बात आती है तो जोरदार शब्दों में यह भी कहते हैं कि इन्हें भक्तों की श्रेणी से खारिज करने की आवश्यकता नहीं। इससे सिद्ध होता है कि मिश्र जी भी इस बात को मानते हैं कि वे शक्त थे। इनकी रचना भक्ति प्रधान है। इन दो तथ्यों को प्राय: सभी ने पूर्णरूपेण स्वीकार भी किया है।

अब प्रश्न यह उठता है कि जब वे भक्त थे और उनकी रचना भक्ति प्रधान है तो उसका कोई दर्शन भी अवश्य होगा। जहां आलोचक की जानकारी के लिए नियमों की श्रृंखला में कोई वस्तु नहीं बंधती, वहां उसे स्वच्छंद कह दिया जाता है। पर वास्तव में ऐसी बात नहीं। प्रत्येक कार्य का मूल कारण अवश्य रहता है। मिश्र जी ने एक बात बार-बार कही है कि रसखान में विदेशीपन की झलक अवश्य दिखाइर पड़ती है।* यह प्रेममार्गी भक्त थे।* लौकिक पक्ष में इनका विरह फारसी काव्य की वंदना से प्रभावित है, अलौकिक पक्ष में सूफियों की प्रेमपीर से। आगे कहते हैं स्वच्छंद कवियों ने प्रेम की पीर सूफी कवियों से ही ली है इसमें कोई संदेह नहीं।* रसखान जैसे पिछले कांटे के कृष्णभक्त कवि सूफी संतों और फारसी साहित्य की प्रवृत्ति से प्रभावित हुए हैं, यह असंदिग्ध है।*

आनन्द अनुभव होत नहिं बिना प्रेम जग जान।
कै वह बिषयानन्द कै ब्रह्मानन्द बखान॥*

ज्ञान कर्म रु उपासना, सब अहमिति को मूल।
दृढ़ निस्चय नहिं होत, बिन किये प्रेम अनुकूल॥*

रसखान शास्त्रों और वेदों के पाठ को भी व्यर्थ बताते हुए कहते हैं कि वेद और क़ुरान के पढ़ने से कुछ नहीं होता जब तक साधक को प्रेम का पूर्ण ज्ञान नहीं होता अर्थात खुदा को इश्क के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है—

ज्ञान ध्यान बिद्यामती, मत बिस्वास बिबेक।
बिना प्रेम सब धूरि हैं अगजग एक अनेक॥*

इश्कत रसद बफरयाद गर खुद बसान हाफिज।
क़ुरान जबर बखवानी बाचार दह रिवायत॥*

सास्त्रन पढ़ि पंडित भए, कै मौलवी क़ुरान।
जु पै प्रेम जान्यौ नहीं, कहा कियौ रसखान॥*

किताबे हफते मिल्लतगर बेखवांद आदमी आमी अस्त।
न खुवांद ताजे जुज आशनाई दास्तानीए रा॥*

अर्थात अगर इंसान सातों धर्मों की किताबें पढ़ ले तो भी जाहिल रहता है जब तक कि मुहब्बत की किताब से कोई दास्तां न पढ़े। रसखान ने इश्क को पूर्णतया निर्लिप्त माना है जहां काम, क्रोध, मद, मोह, भय, लोभ आदि होता है सूफी साधना के अनुसार वहां प्रेम नहीं होता। रसखान ने भी कहा है—

काम क्रोध मद मोह भय लोभ द्रोह मात्सर्य।
इन सब ही तें प्रेम है परे, कहत मुनिवर्य॥*

हर करा जामा ज इश्के चाक शुद।
ऊ जे हिरसो जुमलए ऐबो पाक शुद॥*

अर्थात जिसने अपना लिबास इश्क में चाक किया, वह लालच और समस्त दुर्गुणों से पाक हो गया। इश्के हकीकी लौकिक स्वरूपों से ऊंचा उठकर खुदा से प्रेम करना है। रसखान के अनुसार इश्क शुद्ध, कामना रहित रूप, गुण, यौवन, धन आदि से परे होना चाहिए:

बिन गुन जोबन रूप धन, बिन स्वारथ हित जानि।
सुद्ध कामना तें रहित प्रेम सकल रसखानि ॥*

प्रेम अगम अनुपम अमित, सागर सरिस बखान।
जो आवत यहि ढिग बहुरि जात नाहिं रसखान॥*

  • फारसी के प्रसिद्ध कवि हाफिज का वर्णन भी इससे मिलता-जुलता है:

बहरीस्त बहरे इश्क कि हीचश किनारा नीस्त।
आँजा जजा नीके जाम बेसिपारंद चारा नीस्त॥*

  • प्रेम मार्ग में साधक को किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है कितने कष्ट सहने पड़ते हैं। कैसे उसके प्राण तड़पते हैं। रसखान के अनुसार केवल उसांसें ही चलती रहती हैं—

प्रेम प्रेम सब कोउ कहै, कठिन प्रेम की फाँस।
प्रान तरफि निकरै नहीं, केवल चलत उसाँस॥*

  • सच्चे प्रेम के स्वरूप का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि यह अत्यन्त सूक्ष्म, कोमल, क्षीण और अगम्य सदैव एक-सा रहने वाला रस से परिपूर्ण होते हुए भी कठिन होता है—

अति सूछम कोमल अतिहि अति पतरो अति दूर।
प्रेम कठिन सब ते सदा, नित इक रस भरपूर॥*

  • प्रेम मार्ग की अद्भुतता, दुर्गमता एवं दुर्लभता का उल्लेख करते हुए रसखान कहते हैं कि प्राणों को निछावर करके ही प्रिय की प्राप्ति होती है—

पै ऐतोहू हम सुन्यौं, प्रेम अजूबो खेल।
जाँबाजी बाजी जहाँ दिल का दिल से मेल॥*

रसखान के अनुसार संसार में समस्त चीजें देखी एव जानी जा सकती हैं किन्तु खुदा एवं प्रेम ऐसे हैं कि न उनको देखा जा सकता है न जाना।* सूफियों के प्रेम को केवल अनुभव किया जा सकता है। दाम्पत्य सुख सांसारिक पदार्थों से प्राप्त आनन्द, पूजा, धार्मिक विश्वास इन सबसे इश्के हकीकी उच्च एवं परे हैं—

दम्पति सुख अरु बिषय रस पूजा निष्ठा ध्यान।
इन तें परे बखानियै शुद्ध द्रेम रसखानि ॥*

इक अंगी बिनु कारणहि, इकरस सदा समान।
गनै प्रियहि सर्वस्व जो सोइ प्रेम प्रमान ॥*

संकर से सुर जाहि जपैं चतुरानन ध्यानन धर्म बढ़ावै।
नेकु हियें जिहि आनत ही जड़ मूढ़ महा रसखानि कहावै।
जा पर देव अदेव भू अंगना वारत प्रानन प्रानन पावै।
ताहि अहीर की छोहरिया छछिया भर छाछ पै नाच नचावै।*

हरि के सब आधीन, पै हरी प्रेम-आधीन।
याही तें हरि आपुहीं, याहि बड़प्पन दीन॥*

प्रेम हरी को रूप है त्यौ हरि प्रेम-सरूप।
एक होइ है यौं लसै ज्यों सूरज औ धूप।*
सिर काटौ, छेदौ हियो, टूक टूक करि देहु।
पै याके बदले बिहँसि वाह वाह ही लेहु।*

कारज कारन रूप यह, प्रेम अहै रसखान।
कर्ता कर्म क्रिया करन, आपहि प्रेम बखान॥*
जातें उपजत प्रेम सोई, बीज कहावत प्रेम।
जामैं उपजत प्रेम सोइ क्षेत्र कहावत प्रेम॥*
जाते पनपत बढ़त अरु फूलत फलत महान।
सो सब प्रेमहिं प्रेम यह कहत रसिक रसखान॥*
वही बीज अंकुर वही, सेक वही आधार।
डाल पात फल फूल सब वही प्रेम सुखसार॥*
जो जातें जामैं बहुरि जा हित कहियत बेष।
सो सब प्रेमहिं प्रेम है जग रसखानि असेष॥*

प्रेम प्रेम सब कोउ कहत, प्रेम न जानत कोइ।
जौ जन जानै प्रेम तौ, मरै जगत क्यौं रोइ॥*
इसी भाव का फारसी के प्रसिद्ध कवि हाफिज ने इस प्रकार वर्णन किया है—
हरगिज नमीरद आकि दिलश जेंदाशुद्ध बइश्क।
सिबत् अस्त कर जुरीदाए आलमे दवामे मा॥*
प्रेम में आत्मसर्पण कर प्राण देकर जीव सदा जीवित रहता है। रसखान ने प्रेम के इस स्वरूप का निरूपण करते हुए कहा है—
प्रेम-फाँस मैं फँसि मरै, सोइ जियै सदाहि।
प्रेम-मरम जाने बिना, मरि कोउ जीवत नाहिं॥*
पै तिठास या मार के, रोम रोम भरपूर।
मरत जियै, झुकतौ थिरै बने सु चकनाचूर॥*

कमलतंतु सो हीन अरु कठिन खड्ग की धार।
अति सूघो टेढ़ो बहुरि प्रेम पंथ अनिवार॥*

अत: कहा जा सकता है रसखान द्वारा निरूपित प्रेम सूफी साधना से पूर्णतया रंजित है।

तवक्कुल

तवक्कुल का सम्बन्ध अपने निजत्व से तनिक भी सम्बन्ध रखने वाली प्रत्येक वस्तु के प्रतिपूर्ण उदासीलता से होता है। यह उस स्थिति का नाम है जब मनुष्य अपने समस्त सम्बन्धों को खुदा को सौंपकर यकीन कर ले कि जो कुछ करेगा खुदा ही करेगा।* तवक्कुल में इस बात पर पूर्ण विश्वास हो जाता है कि जो कुछ है खुदा है उसके सिवा कोई भी नहीं न दूसरा कुछ करना है। तवक्कुल में साधक पूरी तल्लीनता से साधना करता हे, उसका ध्यान किसी तरफ नहीं भटकता वह खुदा पर पूरा भरोसा रखता है। रसखान के काव्य में भी तवक्कुल की सफल अभिव्यंजना हुई है वे कहते हैं कि मनुष्य अनेक देवी-देवताओं को भेजकर अनेक साधनों से धन एकत्रित करते हैं तथा अपने मन की आशाएं पूर्ण करते हैं, किन्तु रसखान कहते हैं कि मेरा साधन तो केवल यही (परम सत्ता) है। मैं उस पर तवक्कुल करता हूं—

सेष सुरेस दिनेस गनेस प्रजेस धनेस महेस मनावौ।
कोऊ भवानी भजौ, मन की सब आस सभी विधि पुरावौ।
कोऊ रमा भजि लेहु महा धन, कोऊ कहूँ मनवांछित पावौ।
पै रसखानि वही मेरो साधन, और त्रिलोक रहौ कि नवासौ॥*

  • तवक्कुल पर अटल विश्वास रखते हुए रसखान अपने मन को सांत्वना देते हुए कहते हैं—

द्रौपदी औ गनिका गज गीध अजामिल सों कियौं सो न निहारो।
गौतम-गेहनो कैसी तरी, प्रहलाद कों कैसे हरयौ दुख भारो।
काहे को सोच करै रसखानि कहा करि है रविनंद बिचारो।
ताखन जाखन राखियै माखन चाखन हारो सो राखन हारो॥*

  • तवक्कुल की भावना पर अटल विश्वास रखते हुए अपने आप को पूर्णतया निश्चिंत रखते हुए रसखान कहते हैं—

कहा करै रसखानि को कोऊ चुगुल लबार।
जौ पै राखन हार है माखन चाखन हार॥*

फ़कीर और फुकर

तसव्वुफ की शब्दावली में फ़कीर उसे कहते हैं जो यह विश्वास रखता हो कि लोक-परलोक में मैं किसी वस्तु का स्वामी नहीं हूं। न मुझे किसी चीज पर अधिकार है यहाँ तक कि वह साधना को भी अपनी संपत्ति नहीं समझता। लोक-परलोक की समस्त चीजों को हेच निस्सार समझता है। न उसे धन सम्पत्ति की इच्छा होती है न नरक-स्वर्ग का ध्यान। उसे केवल खुदा का ध्यान रहता है।* यह स्थिति दैन्य की स्थिति से मिलती-जुलती है। सच्चा दैन्य केवल संपति का अभाव नहीं बल्कि संपयि की इच्छा का भी अभाव है। वर्तमान जीवन एवं भविष्य जीवन दोनों से पूर्णरूप से पृथक् हो जाना तथा वर्तमान जीवन और भविष्य जीवन के स्वामी के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु की इच्छा न रखना ही सच्चा दैन्य है। ऐसा फ़कीर व्यक्तिगत अस्तित्व से निर्लिप्त होता है, यहाँ तक कि वह किसी क्रिया, भावना या गुण का आरोप अपने में नहीं करता।* रसखान के काव्य के अवलोकन से ज्ञात होता है कि रसखान के काव्य में इस प्रकार के भाव पूर्णतया विद्यमान हैं। 'कलधौत के धाम' , 'कंचन मंदिर' , 'मानक मोति' किसी के भी प्रति उनके मन में तनिक मोह नहीं। सिद्धियों और निधियों को जो कठिन साधना से प्राप्त होती हैं रसखान तनिक महत्त्व न देते हुए कहते हैं—

वा लकुटी अरु कामरिया पर राज तहूँ पुर को तजि डारौ।
आठहु सिद्धि नवौ निधि को सुख नंद की गाइ चराइ बिसारौ।
एक रसखानि जबै इन नैनन तैं ब्रज के बन-बाग निहारौ।
कोटक ये कलधौत के धाम करील की कुंजन ऊपर वारौं॥*
रसखान ने निर्लिप्त सूफी फ़कीर की विशेषताएं विद्यमान हैं उन्हें तनिक भी मोह नहीं।
कंचन मंदिर ऊंचे बनाइ कै मानिक लाई सदा झलकैयत।
प्रात ही तें सगरी नगरी नग मोतिन ही की तुलानि तुलैयत।
जद्यपि दीन प्रजान प्रजापति की प्रभुता मघवा ललचैयत।
ऐसे भए तो कहा रसखानि जो साँवरे उचार सों नेह न लैयत॥*
रसखान सुखसंपत्ति को भी सारहीन समझते हैं। योग आदि में विश्वास न रखते हुए कहते हैं—
कहा रसखानि सुख संपत्ति सुमार कहा,
कहा तन जोगी ह्व लगाए अंग छार को
कहा साधे पंचानल, कहा सौए बीच नल
कहा जीति लाए राज सिंधु-आर-पार को
जप बार बार, तप संजम बयार व्रत,
तीरथ हज़ार अरे बूझत लबार को।
कीन्हौ नहीं प्यार, नहीं से यौ दरबार, चित
चाहयौ न निहारयौ जौ पै नंद के कुमार को।*

  • सूफी फ़कीर को केवल खुदा का ध्यान रहता है, उसके लिए सोना मिट्टी के बराबर है। दूसरों के माल पर नजर डालना पाप है—

डरै सदा चाहै न कछु, सहै सबै जो होइ।
रहै एकरस चाहि कै, प्रेम बखानौ सोइ॥*

ज़िक्रफ़िक्र

सूफी अनुशासन के विधायक तत्त्वों में ज़िक्र को सभी रहस्यवादी सूफी एक मत से स्वीकार करते हैं। क़ुरान में धर्म पर ईमान लाने वालों को उपदेश दिया गया है कि ईश्वर का स्मरण प्राय करते रहो।* खुदा के नाम के अनेक पर्याय हैं जिनके जप पर महत्त्व दिया गया है, 'ज़िक्र ही पहली सीढ़ी निजत्व को भूलना है और अन्तिम सीढ़ी उपासक का उपासना-कार्य में इस प्रकार लुप्त हो जाना कि उसे उपासना की चेतना न रहे और वह उपास्य में ऐसा लवलीन हो जाय कि उसका स्वयं तक लौटना प्रतिबंधित हो जाय।* रसखान के काव्य में हमें ज़िक्र का निरूपण पद: पद: मिलता है। यह दूसरी बात है कि उन्होंने ज़िक्र का आधार कृष्ण और कृष्ण लीलाओं को बनाया। उस युग में कृष्णलीला को अलौकिक रहस्य प्राप्ति का मार्ग मानना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं मानी गई होगी। कृष्ण काव्य के इस स्वरूप को देखकर ही सम्भवत: मीर अब्दुलवाहिद विलग्रामी ने अपने ग्रंथ हकाएके हिन्दी को तीन भागों में बांटा है। प्रथम भाग में ध्रुव-पद में प्रयुक्त हिन्दी-शब्दों के सूफियाना अर्थ दिये गए हैं। दूसरे भाग में उन हिन्दी शब्दों की व्याख्या है जो विष्णु-पद में प्रयुक्त होते थे। तीसरे भाग में अन्य प्रकार के गीतों और काव्यों आदि में आय शब्दों की व्याख्या की गयी है।* उदाहरणार्थ यदि हिन्दी काव्यों में कृष्ण अथवा अन्य नामों का उल्लेख हो तो उससे मुहम्मद साहब की ओर संकेत होता है, कभी केवल मनुष्य से तात्पर्य, कभी मनुष्य की वास्तविकता समझी जाती है जो परमेश्वर के जात (सत्ता) की वहदत (एक होना) से संबंधित होती है।* कहीं-कहीं कन्हैया मारग रोकी से इबलीस के नाना प्रकार से मार्ग-भ्रष्ट करने की ओर संकेत होता है।* होली खेलने की चर्चा लगभग समस्त कृष्ण-भक्त कवियों ने किया है। उसका संकेत अग्नि की ओर किया जाता है जो आशिकों के हृदय को सजाए हुए है और इस अग्नि ने उनके अस्तित्व को सिर से पैर तक घेर रखा है।* रसखान ने होली के पदों के माध्यम से इस आग का ज़िक्र किया है।* रसखान उस अलौकिक रहस्य की चर्चा कृष्ण के ज़िक्र के माध्यम से करते हैं। यदि उनकी जिह्वा किसी शब्द का उच्चारण करे तो केवल उनके नाम का हो— जो रसना रसना विलसै तेहि देहु सदा निज नाम उचारन।*

स्त्रवन कीरतन दरसनहिं जो उपजत सोइ प्रेम।*

तर्क (त्याग)

सूफियों ने तर्क को बहुत महत्ता प्रदान की है। जब तक संसार में लिप्त रहने की इच्छा मन में रहती है। साधक अपनी मंजिल से दूर रहता है। 'सूफी के लिए तर्केदुनिया इतना ही ज़रूरी है जितना कि जहाज के लिए पानी या नमाज के लिए वजू। जब तक दुनिया की ख्वाहिश दिल से दूर नहीं मंज़िले मकसूद कोसों दूर रहती है।* रसखान के काव्य में भी तर्क के दर्शन होते हैं—

जग में सब ते अधिक अति, ममता तनहिं लखाइ।
पै या तनहूँ ते अधिक, प्यारों प्रेम कहाई॥*

जेहि पाए बैकुंठ अरु, हरि हूँ की नहिं चाहि।
सोइ अलौकिक सुद्ध सुभ, सरस सुप्रेम कहाहि॥*

याही तें सब मुक्ति तें, लही बढ़ाई प्रेम।
प्रेम भए नसि जाहिं सब, बंधे जगत के नाम॥*

फना

तसव्वुफ में फना को अंतिम सोपान माना गया है। साधक इस स्थिति में अपने व्यक्तित्व को पूर्णतया ईश्वर को समर्पित कर अपनी इच्छाओं एवं अहम् भावनाओं को समाप्त कर दे।* उसकी स्मृति में इतना तल्लीन हो जाय कि उसे अपनी सुधि न रहे। आत्म विस्तृति की यह अवस्था ही फना कहलाती है। रसखान के काव्य में इस आत्म विस्तृति और समर्पण का विवेचन मिलता है—

बैन वही उनको गुन गाइ औ कान वही उन बैन सों सानी।
हाथ वही उन गात सरै अरु पाइ वही जु वही अनुजानी।
जान वही उन आन के संग औ मान वही जु करै मनमानी।
त्यौं रसखानि वही रसखानि जु है रसखानि सों रसखानि॥*

प्रान वही जु रहैं रिझि वा पर रूप वही जिहि वाहि रिझायौ।
सीस वही जिन वे परसे पद अंक वही जिन वा परसायौ।
दूध वही जु दुहायौ री वाही दही सु सही जु वही ढरकायौ।
और कहाँलौं कहौं रसखानि री भाव वही जु वही मन भायौं॥*

अकथ कहानी प्रेम की जानत लैली ख़ूब।
दो तनहूँ जहँ एक भे, मन मिलाइ महबूब।*
दो मन एक होते सुन्यौ, पै वह प्रेम न आहि।
होइ जबै द्वै तनहूँ इक, सोई प्रेम कहाहि॥*

पै मिठास वा मार के, रोम-रोम भरपूर।
मरत जियै झुकतो थिरै बनै सु चकनाचूर॥*

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