रसखान व्यक्तित्व और कृतित्व

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रसखान व्यक्तित्व और कृतित्व

रसखान की समाधि महावन, मथुरा
Raskhan's Grave, Mahavan, Mathura

हिंन्दी साहित्य के मध्यकालीन कृष्ण-भक्त कवियों में रसखान की कृष्ण-भक्ति निश्चय ही सराहनीय, लोकप्रिय और निर्विवाद है। कृष्ण-भक्ति और काव्य-सौंदर्य की दृष्टि से 'सुजान रसखान' और 'प्रेमवाटिका' के रचयिता रसखान हिन्दी साहित्य जगत के एक जाज्वल्यमान नक्षत्र के रूप में भारत के जन-जन के हृदय को आज भी भावनात्मक एकता के अग्रदूत के रूप में प्रकाश प्रदान करते हैं।
दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता के अनुसार
वार्ता साहित्य में सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक 'दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता' है। इस वार्ता के अनुसार रसखान दिल्ली में रहते थे। एक बनिए के पुत्र के प्रति आसक्त थे।[1] इस आसक्ति की चर्चा होने लगी। कुछ वैष्णवों ने रसखान से कहा कि यदि इतना प्रेम तुम भगवान से करो तो उद्धार हो जाए। रसखान ने पूछा कि भगवान कहां है? वैष्णवों ने उनको कृष्ण भगवान का एक चित्र दे दिया।[2] रसखान चित्र को लेकर भगवान की तलाश में ब्रज पहुंचे। अनेक मंदिरों में दर्शन करने के उपरांत अपने आराध्य की खोज में ये गोविन्द कुण्ड पर जा बैठे और श्रीनाथ जी के मंदिर को टकटकी लगाकर देखने लगे। आरती के पश्चात श्रीनाथ जी इनका ध्यान करके द्रवीभूत हो गए[3]और चित्र वाला स्वरूप बनाकर दर्शन देने आये।[4] रसखान उन्हें अपना महबूब जानकर पकड़ने दौड़े।[5] श्रीनाथ जी अंतर्धान होकर गोकुल पधारे और श्री गोसाईं जी को संपूर्ण घटना सुनाई। उसके बाद श्री गोसाईं जी ने रसखान को दर्शन दिए और अपने मंदिर में बुलवा लिया।[6]रसखान दर्शन करके बहुत प्रसन्न हुए। वहीं रहकर लीला गान करने लगे। इस वार्ता के अनुसार उन्हें गोपी भाव की सिद्धि हुई। इस वार्ता से यह पता चलता है कि रसखान का संबंध स्वामी विट्ठलनाथ जी से रहा। वार्ता में वर्णित कुछ घटनाओं के संकेत रसखान के काव्य में भी मिलते हैं। रसखान ने भी प्रेमवाटिका में छवि दर्शन* की चर्चा की है। 'सुजान रसखान' में लीला वर्णन भी मिलता है। वार्ता के अनुसार ये लीला के दर्शन[7]करके ही कवित्त, सवैयों और दोहों की रचना करते थे और इन्हें गोपी भाव भी सिद्ध हुआ था।

विषय सूची

नव भक्तमाल के अनुसार
इसके रचयिता श्रीराधाचरण गोस्वामी ने रसखान के संबंध में लिखा है। इस वर्णन में तथा 'दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता' में मुख्य अंतर यही है कि 'नव भक्त-माल' के कर्ता के अनुसार दर्शन न पाने पर व्यंग्य रचना कर रसखान ने भगवान से कुछ उपालंभपूर्ण वचन कहे। 'भक्तमाल' की टीका के अनुसार रहीम ने ऐसी ही परिस्थिति में व्यंग्यपूर्ण दोहे रचे थे। अनुमानत: गोस्वामी जी ने यही बात रसखान के संबंध में भी कह डाली।
मूलगोसाईंचरित के अनुसार
संवत् 1687 में रचित बाबा वेणीमाधव दास कृत 'मूलगुसाईंचरित' में भी रसखान का उल्लेख मिलता है। उसमें लिखा है कि 'रामचरितमानस' की रचना दो वर्ष, सात मास और छब्बीस दिवस में संवत 1633 में समाप्त हुई। सबसे पहले मिथिला के रूपारण्य स्वामी ने अयोध्या में इसका श्रवण किया। फिर संडीले के हरदोई ज़िला के स्वामी जंदलाल के शिष्य 'दयाल दास' अथवा दलालदास ने उसकी एक प्रति लिखी और अपने स्थान पर लौटकर तीन वर्ष तक यमुना तट पर मानस को अपने गुरु और रसखान को सुनाया। मूल ग्रंथ का यह अंश इस प्रकार है:
मिथिला के सुसन्त सुजाने हते। मिथिलाधिप भाव पगे रहते॥
सुचि नाम रूपासन स्वामि जुतो। तिहि औसर* औध में आयौ हुतौ॥
प्रथमै यह मानस तेई सुने। तिहि के अधिकारी गुसाईं गुने॥
स्वामीनन्द (सु) लाल* को सिशय पुनी। तिस नाम दलाल सुदास गुनी॥
लिखि के सोइर पोथि स्वठाम गयो। गुरु के ढिंग जाय सुनाय दयो॥
जमना तट पर त्रय वत्सा लो। रसखान जाई सुनवत भौ॥* इस उल्लेख के अनुसार संवत 1634 से 1636 पर्यंत तीन वर्ष तक रसखान ने 'रामचरितमानस' की कथा सुनी। रसखान ने राम संबंधी किसी पद की रचना न करते हुए भी मानस अवश्य सुना होगा; क्योंकि उनका दृष्टिकोण उदार था। वे सबको समान भाव से देखते थे। श्रीकृष्ण के अतिरिक्त उन्होंने शिव, गंगा आदि पर छंद लिखे। यदि उन्होंने राम के संबंध में काव्य रचना नहीं की तो उनके संबंध में यह धारणा बना लेना तर्क संगत नहीं है कि वे राम काव्य को सुनना भी पंसद नहीं करेंगे अर्थात उन्होंने रामचरितमानस की कथा चाव से सुनी होगी। मूल गोसाईं चरित के अनुसार रसखान तीन वर्ष तक यमुना तट पर रामचरितमानस की कथा सुनते रहे।

रसखान के दोहे महावन, मथुरा
Raskhan Couplets, Mahavan, Mathura

शिवसिंह सरोज के अनुसार
शिवसिंह सरोज ने अपने इतिहास-ग्रंथ में लिखा है कि 'रसखान कवि' सैयद इब्राहीम पिहानी वाले संवत 1630 में हुए। ये मुसलमान कवि थे। श्री वृन्दावन में जाकर कृष्णचंद्र की भक्ति में ऐसे डूबे कि फिर मुसलमानी धर्म त्याग कर माला कंठी धारण किए हुए वृन्दावन की रज में मिल गए। उनकी कविता निपट ललित माधुरी से भरी हुई है। इनकी कथा 'भक्तमाल' में पढ़ने योग्य है।*
मिश्रबंधु विनोद के अनुसार
'रसखान समय 1645। इनको बहुत लोग सैयद इब्राहीम पिहानी वाले समझते हैं। परंतु वह महाशय वास्तव में दिल्ली के पठान थे। जैसा कि 'दो सौ बावन वैष्णवन' की वार्ता में लिखा है। रसखान ने अपना समय अनुचित व्यवहारों में भी व्यतीत किया था, अत: उनकी कविता का आदिकाल भी 25 वर्ष की अवस्था से प्रारंभ होना अनुमान-सिद्ध नहीं है। विठलेश जी का मरण काल सं0 1643 है, सो सं0 1640 के लगभग उनका शिष्य होना जान पड़ता है। अत: जन्मकाल हम 1615 के लगभग समझते हैं। उनकी अवस्था 70 वर्ष की मानने से उनका मरण काल सं0 1685 मानना पड़ेगा।'*
हिन्दी-साहित्य का प्रथम इतिहास
अब्राहम जार्ज ग्रियर्सन ने लिखा है सैयद इब्राहीम उपनाम रसखान कवि, हरदोई ज़िले के अंतर्गत पिहानी के रहने वाले, जन्म काल 1573 ई॰। यह पहले मुसलमान थे। बाद में वैष्णव होकर ब्रज में रहने लगे थे। इनका वर्णन 'भक्तमाल' में है। इनके एक शिष्य कादिर बख्श हुए।*
हिन्दी-साहिय का इतिहास
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिन्दी-साहित्य के इतिहास में रसखान के संबंध में लिखा है- दिल्ली के एक पठान सरदार थे। इन्होंने 'प्रेमवाटिका' में अपने को शाही वंश का कहा है। संभव है पठान बादशाहों की कुल परंपरा से इनका संबंध रहा हो। ये बड़े भारी कृष्ण भक्त और गोस्वामी विट्ठलनाथ जी के बड़े कृपापात्र शिष्य थे। इनका रचना काल सं0 1640 के उपरांत ही माना जा सकता है क्योंकि गोसाईं विट्ठलनाथ जी का गोलोकवास सं0 1643 में हुआ था। 'प्रेमवाटिका' का रचनाकाल सं0 1671 है।*
हिन्दी-साहित्य
आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी ने अपने इतिहास में दो रसखान बताये हैं। सबमें प्रमुख है बादशाह वंश की ठसक छोड़ने वाले सुजान रसखानि। इस नाम के दो मुसलमान भक्त कवि बताए जाते हैं।

  1. एक तो सैयद इब्राहीम पिहानी वाले और
  2. दूसरे गोसाई विट्ठलनाथ जी के कृपापात्र शिष्य सुजान रसखान। दूसरे अधिक प्रसिद्ध हैं। संभवत: यह पठान थे इसीलिए अपने को बादशाह वंश का लिखा है।*

हिन्दी के मुसलमान कवियों का प्रेम-काव्य
गुरुदेव प्रसाद वर्मा ने 'हिन्दी के मुसलमान कवियों का प्रेम काव्य' नामक पुस्तक में लिखा है कि आपके जन्म संवत के बारे में मतभेद है। यह प्रसिद्ध है कि रसखान ने श्री वल्लभाचार्य के पुत्र श्री विट्ठलनाथ जी से दीक्षा ली। विट्ठलनाथ की मृत्यु संवत 1642 विक्रमी में हुई, अत: दीक्षा इसके पूर्व ही ली होगी। यदि दीक्षा ग्रहण का समय संवत 1640 माना जाय और उस समय उनकी अवस्था 25 वर्ष मानी जाय तो अनुचित न होगा। इस प्रकार जन्म संवत 1615 विक्रमी के आस-पास माना जा सकता है। जनश्रुति है कि रसखान के हृदय में भगवद्-विषयक रति का आविर्भाव 'भागवत' के फारसी कर उन्हें ध्यान हुआ कि उसी से क्यों न मन लगाया जाय, जिस पर इतनी गोपियां अपने प्राण अर्पण करती हैं। यह विचार कर ये वृन्दावन चले गये।* इस पुस्तक में भी अन्य पुस्तकों से मिलते-जुलते तथ्यों का निरूपण किया गया है।
ए हिस्ट्री आफ हिन्दी लिटरेचर
एफ0 ई॰ के0 ने अपनी इस पुस्तक में रसखान के विषय में कहा है कि यह पहले मुसलमान थे और इनका नाम सैयद इब्राहीम था। ये कृष्ण के भक्त हुए हैं। इन्होंने कृष्ण की प्रशंसा में काव्य-रचना की जो अति सुन्दर एवं मधुर है। उनके एक शिष्य कादिर बख़्त थे। उन्होंने भी हिन्दी में काव्य-रचना की।*
नया दौर (उर्दू)
अगस्त 1960 में 'सरस्वती शरण कैफ' के लेख 'हिन्दी के मुसलमान शाइर' में उन्होंने रसखान के संबंध में लिखा है कि रसखान का असली नाम मालूम नहीं। ये दिल्ली के एक पठान सरदार के लड़के थे। जवानी में यह एक बनिये के लड़के पर आशिक हो गये और इसके पीछे दीवानावार घूमने लगे। एक रोज उन्होंने बाज़ार में किसी को कहते सुना कि भगवान कृष्ण से ऐसी ही मुहब्बत करनी चाहिए जैसी रसखान को बनिये के लड़के से है। इस जुमले (वाक्य) ने रसखान के रूहानी शऊर (आत्मा को) जगा दिया और ये वृन्दावन को चल खड़े हुए। वहां जाकर गोसाईं विट्ठलनाथ के चेले हो गए और रूहानियत के इस दर्जे पर पहुंच गए कि उनका ज़िक्र (चर्चा) मशहूर मजहबी किताब 'दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता' में आ गया।*

रसखान: जीवन और कृतित्व

देखि गदर हित साहिबी, दिल्ली नगर मसान।
छिनहिं बादशाह बंश की, ठसक छौरि रसखान॥
रसखान के इस दोहे से पता चलता है कि यह बादशाह वंश के थे।*

देस बिदेस के देखे नरेसन रीझ की कोऊ न बूझ करैगौ।
तातें तिन्हें तजि जानि गिरयो गुन सौ गुन औगुन गांठि परैगौ॥
बांसुरीवारो बड़ौ रिझवार है स्याम जु नैसुक ढार ढरैगौ।
लाड़लो छैल वही तो अहीर को पीर हमारे हिये की हरैगौ॥* इस पद से पता चलता है कि रसखान ने कई राजाओं से संबंध स्थापित करना चाहा किंतु किसी ने उनसे रीझकर बात नहीं की अर्थात उन पर किसी की अनुकम्पा नहीं हुई। रसखान ने प्रजा, प्रजापति, दरबार* आदि शब्दों का प्रयोग भी किया है। राजदरबार का वैभव विलास रसखान के अचेतन मन में अवश्य रहा होगा जो बाद में कविता के माध्यम से नि:सृत हुआ। अन्त में उन्होंने कह डाला कि यह सब होने पर यदि कृष्ण से स्नेह न हो तो व्यर्थ है-
कंचन-मंदिर ऊंचे बनाइ कै मानिक लाइ सदा झलकैयत।
प्रात ही तें सगरी नगरी नग मोतिन की तुलानि तुलैयत।
जद्यपि दीन प्रजान प्रजापति की प्रभुता मधवा ललचैयत।
ऐसे भए तौ कहा रसखानि जो सांवरे ग्वार सों नेह न लैयत॥* कलधौत के धाम भी रसखान की स्मृति में आते हैं। उन्हें वे कुरील कुंजों पर वार* कर संतोष कर लेते हैं। रसखान ने किस सुन्दर ढंग से शाही शान के दर्शन कराये है-
लाल लसै पगिया सब के, सब के पट कोटि सुगंधनि भीने।
अंगनि अंग सजे सब हीं रसखानि अनेक जराउ नवीने॥* लाल पगिया, जरतारी पगिया, सगंधित वस्त्र, अंग जराऊ आभूषणों, मोतियों की मालाएं, इन सबका संबंध सरदार अमीरों से होता है। यह उपकरण रसखान के जीवन के इस तथ्य का उद्घाटन करते हैं कि उनका दरबार से संबंध अवश्य रहा। किसी संकटकाल में रसखान ने यह विचार कर संतोष किया—
काहे को सोच करै रसखानि कहा करिहै रबिनंद बिचारो।
ता खन जा खन राखियै माखन-चाखन हारो सो राखनहारो।* ऐसा भी प्रतीत होता है कि किसी ने इनकी चुगली शाहे वक़्त से की। उससे खीज कर निर्भीकतापूर्वक रसखान ने यह दोहा कहा— कहा करै रसखानि को कोऊ चुगुल लबार,
जौ पै राखनहार है माखन-चाखन हार॥*

जन्म संवत

रसखान के जन्म-संवत के विषय में विद्वानों में मतभेद पाया जाता है। अनेक विद्वानों में इनका जन्म संवत 1615 माना है।

जन्म स्थान

रसखान के जन्म-स्थान के विषय में भी अनेक मत हैं।

नाम तथा उपनाम

रसखान के नाम के सम्बन्ध में भी अनेक मत हैं। प्रामाणिक सामग्री के अभाव में रसखान के नाम के सम्बन्ध में विद्वानों ने अनेक कल्पनाएं कीं जो सर्वथा निराधार प्रतीत होती है।

प्रेम देव की छविहि लखि भये मियां रसखान। उन्होंने भये मियां रसखान का अर्थ किया है'- मियां (मुसलमान) सैयद इब्राहीम खान रसखान (हिन्दू भक्त) हो गए। किन्तु इस प्रकार के अर्थ निरूपण के पक्ष में कोई अकाट्य प्रमाण नहीं दिया जा सकता। 'मियां' से मुसलमान और 'रसखान' से हिन्दू का तात्पर्य निकालना स्वमनीषा से की गई उद्भावना भी कही जा सकती है। उपरोक्त पंक्ति का उचित अर्थ यह है कि प्रेमदेव की छवि देखकर भये मियां रसखान- अर्थात रसखान मियां हो गए। मियां शब्द का अर्थ पति के अतिरिक्त नेक, भला सज्जन भी है।* मियां कहकर प्रेम-भाव से छोटों और बड़ों को सम्बोधित किया जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि रसखान में जो सांसरिक बुराइयां (बनिए के लड़के की संगति, स्त्रीमोह) थीं वे प्रेमदेव की छवि देखकर दूर हो गईं और वे सज्जन हो गए। दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि मियां सैयद इब्राहीम रसान हो गए, तो भी रसखान शब्द का अर्थ रसखानि अर्थात रस की ख़ान नहीं है। इस पंक्ति में रसखान ने 'रसखानि नहीं 'रसखान' शब्द का प्रयोग किया है।

नैन दलालनि चौहटें मन-मानिक पिय हाथ।
'रसखां' ढोल बजाइकै बेच्यौ हिय जिय साथ।* यह कुछ कहना कि उनमें मुस्लिम नाम की बू तक न रह गई*, धांधलेबाजी तथा भावुकता के सिवा और कुछ नहीं है। इस सुगंध (मुस्मिम बू) के दर्शन केवल उनके नामों में ही नहीं उनके काव्य में भी मिलते हैं। रसखानि का प्रयोग रसखान ने अधिकांश स्थलों पर पाद पूर्ति के लिए किया है। उनका नाम सैयद इब्राहीम तथा उपनाम रसखान था।

बाल्यकाल और शिक्षा

रसखान एक जागीरदार पिता के पुत्र थे। इसलिए इनका लालन-पालन बड़े लाड़-प्यार के साथ हुआ। यदि ऐसा न होता तो उनके काव्य में एक विशेष प्रकार की कटुता पाई जाती। सम्पन्न परिवार में उत्पन्न होने के कारण उन्हें उच्च शिक्षा दी गई होगी। उनकी विद्वत्ता के दर्शन उनके काव्य की साधिकार अभिव्यक्ति में होते हैं।ये फारसी, हिन्दी एवं संस्कृत के ज्ञाता थे। 'श्रीमद्भागवत' के फारसी अनुवाद सुनने की घटना से उनके फारसी ज्ञान का पता चलता है।[11] संस्कृत और हिन्दी भाषा के ज्ञान का साक्षी उनका काव्य है। रसखान के मकतब आदि में जाकर पढ़ने की चर्चा नहीं मिलती। समृद्धिशाली होने के कारण इनके पिता ने इनकी शिक्षा के लिए मुल्ला और पंडित आदि नियुक्त किए होंगे और वे उनसे घर पर ही पढ़ते होंगे। रसखान को बाल्यकाल से कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ा। उन्होंने अपना बचपन सुखपूर्वक बिताया।

मथुरा आगमन

मृत्यु

इस महान साहित्यकार की मृत्यु सं0 1671 के बाद हुई। इनका मृत्यु-स्थान मथुरा-वृन्दावन को मानना पड़ेगा। उन्होंने स्वयं भी कहा है- प्रेम निकेतन श्रीबनहिं आई गोबर्धन धाम।
लहयौ सरन चित चाहि कै, जुगल-सरूप ललाम॥[25]इस दोहे के अनुसार रसखान गोवर्धन धाम के निकट रहने लगे। वहां उनकी मृत्यु हो गई। उनके मरने के बाद महावन में उनकी समाधि बनाई गई जो रसखान की छत्री के नाम से आज भी प्रसिद्ध है। रसखान का जन्म सं0 1590 में पिहानी में हुआ। बाल्यावस्था में इन्होंने वहां से दिल्ली प्रस्थान किया। वहां सं0 1613-1614 में हुए भीषण अकाल और गदर को देखकर ये ब्रज चले गए। सं0 1634 से 1637 तक रामचरितमानस का पाठ सुना। संभवत: वहीं से उन्हें काव्य की प्रेरणा मिली। उन्होंने कृष्ण को आधार बना ब्रज में निवास कर काव्यमंदाकिनी को प्रवाहित किया। वहीं की धरती ने उन्हें अपनी आगोश में ले लिया। सं0 1671 के बाद उनकी मृत्यु हो गई।


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. सो वह रसखान दिल्ली में रहत हतो। सो वह एक साहूकार के बेटा के ऊपर बोहोत आसक्त भयो। सौ वाको अहर्निस देखे। औ वह छोहरा कछू खातो तो वाकी जूठनि लेई और पानी पीवतो तोहू बा को झूठो पीवे। -दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता, वार्ता 219
  2. तब वा वैष्णवन की पाग में श्रीनाथ जी को चित्र हतौ।... सा काढ़ि के रसखान को दिखायों तक चित्र देखत ही रसखान को मन फिरि गयौ। -दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता, वार्ता 21
  3. तब श्रीनाथ जी मन में विचारे, जो रसखान कों तो कछु देहानुसंधान है नाहीं। यह दसा देखि के श्रीनाथ जी के मन में दया आई।-दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता, वार्ता 219
  4. जैसो सिंगार वा चित्र में हतो तैसोई वस्त्र आभूषण अपने श्री हस्त में धारण किए। गाय ग्वाल सखा सब साथ लै कै आप पधारे। -दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता, वार्ता 219
  5. सो ऐसो निरधार करि के श्रीनाथ जी को पकरन दोरयो। -दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता, वार्ता 219
  6. तब श्री गुसाईं जी ने कृपा करिके वाको नाम सुनायो पाछे खवास सो कही, जो इनको मंदिर में ले आयो। तब रसखान ने श्रीनाथ जी के दरसन किये, सो बहुत प्रसन्न भयो।- दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता, वार्ता 219
  7. सो जहां जा लीला के दरसन करते तहां करते तहां ता लीला के कवित्त, दोहा, चौपाई सवैया करते। सो इनको गोपी भाव सिद्ध हुआ।-दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता, वार्ता 219
  8. देखि गदर हित-साहबी, दिल्ली नगर मसान।
    छिनहिं बादसा-बंस की, ठसक छोरि रसखान॥
    प्रेम-निकेतन श्रीबनहिं, आइ गोवर्धन धाम।
    लहयौ सरन चित चाहिके, जुगल-सरूप ललाम॥
    तोरि मानिनी तैं हियो, फोरि मोहनी मान।
    प्रेम देव की छबिहि लखि भए मियां रसखान॥
    2 7 6 1 विधु सागर रस इन्दु, सुभ बरस सरस रसखानि।
    प्रेम वाटिका रचि रुचिर चिर हिय हरष बखानि॥
    अरपी श्रीहरि-चरन जुग-पदुम-पराग निहार।
    विचरहिं या में रसिकबर, मधुर-निकर अपार॥ - प्रेमवाटिका 48, 49, 50, 51, 52
  9. देखि ग़दर हित साहबी दिल्ली नगर मसान।
    छिनहि बादसा बस की ठसक छोड़ि रसखान॥– प्रेम वाटिका 48
  10. One of the most important problems about old manuscripts is that the authorship of a work cannot be easily identified because the author himself does not mention his name any where. This is particularly so in poetical works- Sanskrit. Apbhransa and even old Hindu. Indian tradition enjoined self abnegation in such deeds called Yajnas. Khusro and Soofi poets have used their names very often and Kabir used his name almost in every Pada and Saloka. This became a regular fathion in course of time. In the early stages a poet would give his short name as Muhammed (For Malik Muhammed Jaysee) Kabir (for Kabir Dass), Rahim (for Abdul Rahim Khan Khana) -Persian Influence on Hindi p. 78
  11. हिन्दी के मुसलमान कवियों का प्रेमकाव्य, पृ0 79
  12. प्रेम वाटिका 48, 49
  13. रसखान और उनका काव्य, पृ0 11
  14. रसखान ग्रन्थावली की भूमिका, पृ0 27
  15. मध्यकालीन प्रेमसाधना, पृ0 148
  16. नूरूललुगाता (उर्दू-शब्द-कोष), पृ0 578
  17. हिन्दी-कवि-चर्चा, पृ0 271
  18. रसखान: जीवन और कृतित्व, पृ0 45
  19. पोद्दार अभिनंदन-ग्रंथ, पृ0 313
  20. वाकयाते दारूल-हुकूमत देहली, पृ0 308
  21. पोद्दार-अभिनंदन-ग्रंथ, पृ0 314 से उद्धृत
  22. वाक्याते दारूल-हुकूमत, हेहली, पृ0 319
  23. वाक्याते दारूल-हुकूमत, हेहली, पृ0 319
  24. वाक्याते दारूल-हुकूमत, हेहली, पृ0 311
  25. प्रेम वाटिका, पद 42; 6. प्र0 वा0, पद 49

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