रूद्रहृदयोपनिषद

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रुद्रहृदयोपनिषद

विषय सूची

कृष्ण यजुर्वेदीय इस उपनिषद में 'शिव' और 'विष्णु' की अभिन्नता दर्शाई गयी है। शुकदेव जी और व्यास जी के मध्य हुए प्रश्नोत्तर के रूप में इस उपनिषद का प्रारम्भ किया गया है।

सर्वेश्रेष्ठ देवता कौन?

'हे शुकदेव! भगवान 'रुद्र' में सभी देवता समाहित हैं। वे सभी रुद्र-रूप हैं। उनके दक्षिण में सूर्य, ब्रह्मा तथा तीन प्रकार की अग्नियाँ- गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि और आह्वनीय-विद्यमान हैं। वाम पार्श्व में भगवती उमा, भगवान विष्णु और सोम ये तीन देव शक्तियां विद्यमान हैं। उमा ही भगवान विष्णु और चन्द्रमा हैं जो भक्ति-भाव से भगवान शंकर का नमन करते हैं, वे विष्णु की ही अर्चना करते हैं और जो विष्णु को नमन करते हैं, वे भगवान रुद्रदेव (शिव) की ही प्रार्थना करते हैं।'

ब्रह्मा, विष्णु और शिव की एकरूपता

इस उपनिषद में यह मन्त्र दिया गया है, जो तीनों की एकता को प्रकट करता है-
रुद्रात्प्रवर्तते बीचं बीजयोनिर्जनार्दन:।
यो रुद्र: स स्वयं ब्रह्मा यो ब्रह्मा स हुताशन:॥7॥ अर्थात रुद्र ही प्राणियों की उत्पत्ति के बीजरूप हैं तथा उस बीजरूप की योनि उमा, अर्थात भगवान विष्णु हैं। जो रुद्रदेव हैं, वे स्वयं ब्रह्मा हैं और जो ब्रह्मा हैं, वे ही अग्निदेव हैं। अग्नि और सोम से युक्त यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्मा, विष्णु और शिव-स्वरूप रुद्रमय ही है। सभी जड़-चेतन-स्वरूप रुद्र और उमा के संयोग से ही जन्म लेते हैं। उमा और शिव का मिलन ही विष्णु कहलाता है। 'अन्तरात्मा' ब्रह्मा है, 'परमात्मा' महेश्वर शिव है और सभी प्राणियों की सनातन 'आत्मा' भगवान विष्णु हैं। अन्तरात्मा भवेद्ब्रह्मा परमात्मा महेश्वर:।
सर्वेषामेव भूतानां विष्णुरात्मा सनातन:॥14॥

'रुद्रो नर उमा नारी तस्मै तस्यै नमो नम:। रुद्रो ब्रह्मा उमा वाणी तस्मै तस्मै नमो नम:॥
रुद्रो विष्णुरूमा लक्ष्मीस्तस्मै तस्यै नमो नम:। रुद्र: सूर्या उमा छाया तस्मै तस्यै नमो नम:॥
रुद्रो सोम उमा तारा तस्मै तस्यै नमो नम:। रुद्रो दिवा उमा रात्रिस्तस्मै तस्यै नमो नम:॥
रुद्रो यज्ञ उमा वेदिस्तस्मै तस्यै नमो नम:। रुद्रो वह्निरूमा स्वाहा तस्मै तस्यै नमो नम:॥
रुद्रो वेद उमा शास्त्रं तस्मै तस्यै नमो नम:। रुद्रो वृक्ष उमा वल्ली तस्मै तस्यै नमो नम:॥
रुद्रो गन्ध उमा पुष्पं तस्मै तस्यै नमो नम:। रुद्रोऽर्थ अक्षर: सोमा तस्मै तस्यै नमो नम:॥
रुद्रो लिंगयुमा पींठ तस्मै तस्यै नमो नम:। सवदेवात्मकं रुद्रं नमस्कुर्यात्पृथम्पृथक्॥' (17 से 23 तक— रुद्रहृदयोपनिषद)

परा-अपरा विद्या

य: सर्वज्ञ: सर्वविद्यो यस्य ज्ञानमयं तप:।
तस्मादत्रान्नरूपेण जायते जगदावलि:॥33॥

शिव कौन है?


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