वैभाषिक दर्शन

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वैभाषिक दर्शन / Vaibhashik Philosophy

विषय सूची

(सर्वास्तिवाद)

  1. ज्ञानप्रस्थान,
  2. प्रकरणपाद,
  3. विज्ञानकाय,
  4. धर्मस्कन्ध,
  5. प्रज्ञप्तिशास्त्र,
  6. धातुकाय एवं
  7. संगीतिपर्याय।

परिभाषा

हेतु-फलवाद

  1. कारणहेतु,
  2. सहभूहेतु,
  3. सभागहेतु,
  4. सम्प्रयुक्तकहेतु,
  5. सर्वत्रगहेतु एवं
  6. विपाकहेतु।
  1. हेतु-प्रत्यय,
  2. समनन्तर-प्रत्यय,
  3. आलम्बन-प्रत्यय एवं
  4. अधिपति-प्रत्यय।
  1. विपाकफल,,
  2. अधिपतिफल,
  3. निष्यन्दफल एवं
  4. पुरुषकारफल।

वैशिष्टय

वैभाषिकों को छोड़कर अन्य सभी बौद्ध कार्य और कारण को एककालिक नहीं मानते। किन्तु वैभाषिकों की यह विशेषता है वे कि हेतु और फल को एककालिक भी मानते हैं, यथा-सहजात (सहभू) हेतु।

सत्यद्वय व्यवस्था

  1. संवृतिसत्य एवं
  2. परमार्थसत्य।

दु:खसत्य, समुदयसत्य, निरोधसत्य एवं मार्गसत्य-इस तरह चार सत्य होते हैं। ऊपर जो दो सत्य कहे गये हैं, उनसे इनका कोई विरोध नहीं है। चार आर्यसत्य दो में या दो सत्य चार में परस्पर संगृहीत किये जा सकते हैं। जैसे निरोध सत्य परमार्थ सत्य है तथा शेष तीन संवृतिसत्य।

परमाणु विचार

वैभाषिक मत में परमाणु निरवयव माने जाते हैं। संघात होने पर भी उनका परस्पर स्पर्श नहीं होता। परमाणु द्विविध हैं, यथा-

  1. द्रव्यपरमाणु एवं
  2. संघातपरमाणु।

ज्ञानमीमांसा

वैभाषिक भी दो ही प्रमाण मानते हैं, यथा-

  1. प्रत्यक्ष और
  2. अनुमान।
  1. इन्द्रियप्रत्यक्ष,
  2. मानसप्रत्यक्ष एवं
  3. योगिप्रत्यक्ष।
  1. श्रोत्रविज्ञान,
  2. घ्राणविज्ञान,
  3. विह्रविज्ञान एवं
  4. कायविज्ञान।

बुद्ध

वैभाषिक मतानुसार बोधिसत्त्व जब बुद्धत्व प्राप्त कर लेता है, तब भी उसका शरीर सास्रव ही होता है तथा वह दु:खसत्य और समुदयसत्य होता है, किन्तु उसकी सन्तान में क्लेश सर्वथा नहीं होते। क्लेशावरण के अलावा ज्ञेयावरण का अस्तित्व ये लोग बिल्कुल नहीं मानते। बुद्ध के 12 चरित्र होते हैं। उनमें से

  1. तुषित क्षेत्र से च्युति,
  2. मातृकृक्षिप्रवेश,
  3. लुम्बिनी उद्यान में अवतरण,
  4. शिल्प विषय में नैपुण्य एवं कौमार्योचित ललित क्रीड़ा तथा
  5. रानियों के परिवार के साथ राज्यग्रहण-ये पाँच गृहस्थपाक्षिक चरित्र हैं तथा
  6. रोगी, वृद्ध आदि चार निमित्तों को देखकर ससंवेग प्रव्रज्या,
  7. नेरंजना के तट पर 6 वर्षों तक कठिन तपश्चरण,
  8. बोधिवृक्ष के मूल में उपस्थिति,
  9. मार का सेना के साथ दमन,
  10. वैशाख पूर्णिमा की रात्रि में बुद्धत्वप्राप्त,
  11. धर्मचक्र प्रवर्तन तथा
  12. कुशीनगर में महापरिनिर्वाण-ये सात चरित्र प्रव्रज्यापाक्षिक हैं।

श्रावक

अर्हत्, प्रत्येकबुद्ध अर्हत् एवं बुद्ध इन तीनों को जब अनुपधिशेषनिर्वाण की प्राप्ति हो जाती है, तब इनकी जड़ सन्तति एवं चेतन-सन्तति दोनों धाराएं सर्वथा समाप्त हो जाती हैं। इन दोनों धाराओं का अभाव ही अनुपधिशेषनिर्वाण है और इसकी भी द्रव्यसत्ता वैभाषिक स्वीकार करते हैं। इनके मत में सभी धर्म द्रव्यसत् और अर्थक्रियाकारी माने जाते हैं। आकाश, निर्वाण आदि सभी धर्म इसी प्रकार के होते हैं। जो सर्वथा नहीं होते, जैसे शशविषाण, वन्ध्यापुत्र आदि असत् होते हैं। कुछ ऐसे भी वैभाषिक थे, जो निरुधिशेषनिर्वाण के अनन्तर भी चेतनधारा का अस्तित्व मानते थे। वैभाषिकों के मत में सम्भोगकाय एवं धर्मकाय नहीं होता। केवल निर्माणकाय ही होता है।

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