शक कुषाण काल

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शक-कुषाण काल / Shak / Saka / Kushan

इतिहास तो एक सिलसिले वार मुकम्मिल चीज़ है, और जब तक तुम्हे यह मालूम न हो कि दुनियाँ के दूसरे हिस्सों में क्या हुआ - तुम किसी एक देश का इतिहास समझ ही नहीं सकते।
- जवाहर लाल नेहरु (विश्व-इतिहास की झलक)

कुषाण

शक राज पुरुष
Saka King (Mastan)
राजकीय संग्रहालय, मथुरा

कुषाण भी शकों की ही तरह मध्य एशिया से निकाले जाने पर काबुल-कंधार की ओर यहाँ आ गये थे । उस काल में यहाँ के हिन्दी यूनानियों की शक्ति कम हो गई थी, उन्हें कुषाणों ने सरलता से पराजित कर दिया । उसके बाद उन्होंने काबुल-कंधार पर अपना राज्याधिकार कायम किया । उनके प्रथम राजा का नाम कुजुल कडफाइसिस था । उसने काबुल – कंधार के यवनों (हिन्दी यूनानियों) को हरा कर भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर बसे हुए पह्लवों को भी पराजित कर दिया । कुषाणों का शासन पश्चिमी पंजाब तक हो गया था । कुजुल के पश्चात उसके पुत्र विम तक्षम ने कुषाण राज्य का और भी अधिक विस्तार किया । भारत की तत्कालीन राजनैतिक परिस्थिति का लाभ उठा कर ये लोग आगे बढ़े और उन्होंने हिंद यूनानी शासकों की शक्ति को कमज़ोर कर शुंग साम्राज्य के पश्चिमी भाग को अपने अधिकार में कर लिया । विजित प्रदेश का केन्द्र उन्होंने मथुरा को बनाया, जो उस समय उत्तर भारत के धर्म, कला तथा व्यापारिक यातायात का एक प्रमुख नगर था ।*



विषय सूची

शकों ने उत्तर-पश्चिमी राज्य की राजधानी तक्षशिला बनाई । धीरे-धीरे तक्षशिला और मथुरा पर शकों की दो अलग -अलग शाखाओं का अधिकार हो गया । मथुरा नगर का महत्व इतना बढ़ गया कि शूरसेन जनपद को ही “मथुरा राज्य” कहा जाने लगा । मथुरा में जिन शक राजाओं का आधिपत्य रहा उनकी उपाधि 'क्षत्रप' मिलती है । तक्षशिला के शक शासकों की भी यही उपाधि थी । उसके बाद अधिक प्रतापी शासकों को 'महा-क्षत्रप' की उपाधि देना प्रारम्भ कर दिया । ये 'क्षत्रप' स्वयं को भारतीय महाराजाओं या सम्राटों के समकक्ष मानने लगे । शासन की ओर से विभिन्न प्रदेशों के शासनार्थ जो उपशासक नियुक्त होते थे उनकी संज्ञा 'क्षत्रप' प्रसिद्ध हो गई थी ।

शक

शक सम्भवतः उत्तरी चीन तथा यूरोप के मध्य स्थित विदेश झींगझियांग प्रदेश के निवासी थे । कुषाणों एवं शकों का क़बीला एक ही माना गया था । किन्तु इन दोनों के क़बीले अलग अलग थे । लगभग ई. पू. 100 में विदेशी शासकों की शक्ति बढ़ने लगी । मथुरा में इनका केन्द्र बना । यहाँ के राजा 'शक क्षत्रप' के नाम से जाने जाते हैं । मथुरा के नागरिक शक-क्षत्रपों के समय सबसे पहले विदेशी सम्पर्क में आये पर जनता पर कुषाण शासन का प्रभाव स्थाई रुप से पड़ा । शक संवत पुराना भारतीय संवत है जो ई. 78 से शुरू होता है । भारत में मौर्य और सातवाहन काल में शासन-वर्षों का ही प्रयोग होता था । संवतों का प्रयोग तिथि-निर्धारण के लिए कुषाण और शक काल से होने लगा है । शक, मालव, गुप्त, हर्ष आदि संवतों का संबंध ऐतिहासिक घटनाओं से है। महाभारत में भी शकों का उल्लेख है।


शकों के पहले प्रतापी राजा का नाम 'मोअस' ज्ञान में आता है । इसके सिक्के काफ़ी अधिक संख्या में मिले हैं । तक्षशिला में मिले एक ताम्रपत्र से इस राजा का नाम 'मोग' संज्ञान में आता है । इसका समय ई. पूर्व 100 के लगभग है । 'मोअस' ने पूर्वी तथा पश्चिमी गांधार प्रदेश के यूनानी राज्य को समाप्त कर दिया । मोअस का उत्तराधिकारी ऐजेज प्रथम हुआ । उसके बाद ऐजेज द्वितीय गोन्डोफ़रस आदि अनेक शासक हुए । इन के बाद शकों(शक) के कुसुलक वंश का अधिकार हो गया । मथुरा पर जिन शासकों ने राज्य किया उनके नाम सिक्कों तथा अभिलेखों द्वारा ज्ञात हुए है । शुरु के 'क्षत्रप' शासकों के नाम 'हगान' और 'हगामष' मिलते है । इनके सिक्कों से ऐसा ज्ञात होता है कि दोनों ने सम्मिलित रूप से शासन किया । संभवत: ये दोनो भाई रहे होंगे । कुछ सिक्के केवल 'हगामष' के मिले हैं । दो अन्य शासकों के नाम से साथ भी क्षत्रप शब्द मिलता है । ये शासक हैं- 'शिवघोष' तथा 'शिवदत्त' । इनके सिक्के कम मिले है, पर वे महत्वपूर्ण हैं ।* इनके तथा हगान और हगामष के सिक्कों पर एक ओर लक्ष्मी और दूसरी ओर घोड़ा बना हुआ है ।

राजुबुल

सिंह शीर्ष

सिंह शीर्ष

हगान-हगामष के पश्चात राजुबुल मथुरा का शासक हुआ । इसके सिक्कों पर खरोष्ठी में लेख मिलते हैं - राजुबुल के ये सिक्के बड़ी संख्या में मिले हैं और ये सिक्के कई भाँति के है । कुछ सिक्कों पर 'छत्रपस' के स्थान पर 'महाछत्रपस' लिखा हुआ मिलता है । उसकी 'अप्रतिहतचक्र' उपाधि से शासक के स्वतन्त्र शासन तथा शक्ति को सूचित करती है । इसके सिक्के सिंधु-घाटी से लेकर पूर्व में गंगा यमुना दोआब तक मिले है, जिनसे राजुबुल की विशाल सत्ता का ज्ञान होता है । इसके समय में मथुरा राज्य की सीमाएं भी बढ़ गई । [1] मोरा (ज़िला मथुरा) से ब्राह्मी लिपि में लिखा हुआ एक महत्वपूर्ण शिलालेख प्राप्त हुआ है, जिसमें राजुबुल के लिए 'महाक्षत्रपस' शब्द का प्रयोग किया गया है । इस लेख में राजुबुल के एक पुत्र का भी विवरण मिलता है, पर उसका नाम खण्ड़ित हो गया है । 1869 ई॰ में मथुरा से पत्थर का एक 'सिंह-शीर्ष' मिला जो लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय में रखा हुआ है । उस पर खरोष्ठी लिपि और प्राकृत भाषा में कई लेख हैं । इनमें क्षत्रप शासकों के नाम मिलते है । एक शिलालेख में महाक्षत्रप राजुबुल की पटरानी कमुइअ (कंबोजिका) के द्वारा बुद्ध के अवशेषों पर एक स्तूप तथा एक 'गुहा विहार' नामक मठ बनवाने का उल्लेख मिलता है । संभवत: यह मठ मथुरा में यमुना-तट पर वर्तमान सप्तर्षि टीला पर रहा होगा । [2] यहीं से ऊपर उल्लेखित 'सिंह-शीर्ष'मिला था ।

शोडास

राजुबुल के बाद उसका पुत्र शोडास (लगभग ई॰ पूर्व 80-57) शासनाधिकारी हुआ । इस सिंह-शीर्ष के शिलालेख पर शोडास की उपाधि 'क्षत्रप' अंकित है, किन्तु मथुरा में ही मिले अन्य शिलालेखों में उसे 'महाक्षपत्र' कहा गया है । कंकाली टीला (मथुरा) से प्राप्त एक शिलापट्ट पर सं0 (?) 72 का ब्रह्मी लेख है, जिसके अनुसार 'स्वामी महाक्षत्रप' शोडास के शासनकाल में जैन भिक्षु की शिष्या अमोहिनी ने एक जैन विहार की स्थापना की ।* राजुबुल की पत्नी कंबोजिका ने मथुरा में यमुना नदी के तट पर एक बौद्ध-बिहार निर्मित कराया था, जिसके लिए शोडास ने कुछ भूमि दान में दी थी । मथुरा के हीनयान मत वाले बौद्धों की 'सर्वास्तिवादिन्' नामक शाखा के भिक्षुओं के निर्वाह के लिए यह दान दिया गया था । सिंह-शीर्ष के इन खरोष्ठी लेखों से ज्ञात होता है कि शोडास के काल में मथुरा के बौद्धों में हीनयान तथा महायान (महासंधिक)-- मुख्यतः इन दोनों शाखाओं के अनुयायी थे और इनमें परस्पर वाद-विवाद भी होते थे ।


शोडास के सिक्के दो प्रकार के है, पहले वे है जिन पर सामने की तरफ खड़ी हुई लक्ष्मी की मूर्ति तथा दूसरी तरफ लक्ष्मी का अभिषेक चित्रित है् । इन सिक्कों पर हिन्दी में 'राजुबुल पुतस खतपस शोडासस' लिखा हुआ है ।* दूसरे प्रकार के सिक्कों पर लेख में केवल 'महाक्षत्रप शोडासस' चित्रित है । इससे अनुमान होता है कि शोडास के पहले वाले सिक्के उस समय के होगें जब उसका पिता जीवित रहा होगा और दूसरे राजुबुल की मृत्यु के बाद, जब शोडास को राजा के पूरे अधिकार मिल चुके होगें । [3] शोडास तथा राजुबुल के सिक्के हिंद -यूनानी शासक स्ट्रैटो तथा मथुरा के मित्र-शासकों के सिक्कों से बहुत मिलते-जुलते हैं । शोडास के अभिलेखों में सबसे महत्वपूर्ण वो लेख है जो एक सिरदल (धन्नी) पर उत्कीर्ण है । यह सिरदल मथुरा छावनी के एक कुएँ पर मिली थी, जो कटरा केशवदेव से लाई गई प्रतीत होती है ।

महाक्षत्रप शोडास का शासन

महाक्षत्रप शोडास का शासन-काल ई॰ पूर्व 80 से ई॰ पूर्व 57 के बीच माना जाता है । यह सबसे पहला अभिलेख है जिसमें मथुरा में कृष्ण-मंदिर के निर्माण का उल्लेख मिलता है । शोडास का समकालीन तक्षशिला का शासक पतिक था । मथुरा के उक्त सिंह- शीर्ष पर खुदे हुए एक लेख में पतिक की उपाधि 'महाक्षत्रप' दी हुई है । तक्षशिला से प्राप्त सं078 में एक दूसरे शिलालेख में 'महादानपति' पतिक का नाम आया है । सम्भवतः ये दोनो पतिक एक ही है और जब शोडास मथुरा का क्षत्रप था उसी समय पतिक तक्षशिला में महाक्षत्रप था । मथुरा-लेख में पतिक के साथ मेवकि का नाम भी आता है । गणेशरा गाँव (जि0 मथुरा) से मिले एक लेख में क्षत्रप घटाक का नाम भी है।* शोडास के साथ इन क्षत्रपों का क्या संबंध था, यह विवरण कहीं नहीं मिलता है । ई॰ पूर्व पहली शती का पूर्वार्द्ध पश्चिमोत्तर भारत के शकों के शासन का समय था । इस समय में तक्षशिला से लेकर उत्तरी महाराष्ट्र् तक शकों का ही एकछ्त्र राज्य हो गया था । [4]


तक्षशिला के कुसुलुक वंशी लिश्रक और पतिक शक्तिशाली राजा थे । मथुरा प्रदेश में राजुबुल तथा शोडास प्रभुता थी । सौरष्ट्र् और महाराष्ट्र् में भूमक औरनहपान आदि शासक थे । नहपान के दामाद उषवदात (ऋशभदत्त) के समय में शकों का प्रभुत्व पूना से उत्तर में अजमेर तक फैला हुआ था । नासिक तथा जुन्नर की गुफ़ाओं में इनके बहु-संख्यक लेख मिले हैं जिनसे ज्ञात होता है कि नहपान और उशवदात के समय में अनेक गुफ़ा-मंदिरो का निर्माण किया गया और विभिन्न धार्मिक कार्य किये गये । इन शकों के समय में उज्जयिनी प्रधान केन्द्र था । ई॰ पूर्व 57 के लगभग उज्जयिनी के उत्तर में मालवगण अपनी शक्ति संगठित करते रहे और भारत से शकों को भगा कर विदेशी शासन से छुटकारा पाने का प्रयास करने लगे । उन्होंने महाराष्ट्र के सातवाहन शासकों से इस कार्य में मदद ली और उज्जयिनी के शकों को पराजित कर दिया । यह पराजय शकों की शक्ति पर भारी सिद्ध हुई और वे भारत के राजनैतिक रंगमंच से ओझल हो गये । इसी वर्ष विक्रम संवत की स्थापना हुई, जो प्रारंभ में 'कृत' और 'मालवा' नामों से तथा बाद में 'विक्रम' नाम से देश के एक बड़े भाग में प्रचलित हुआ ।

कुषाण वंश

कुषाण वंश (लगभग 1 ई॰ से 225 तक) ई॰ सन् के आरंभ से शकों की कुषाण नामक एक शाखा का प्रारम्भ हुआ । विद्वानों ने इन्हें युइशि, तुरूश्क (तुखार) नाम दिया है । युइशि जाति प्रारम्भ में मध्य एशिया में थी । वहाँ से निकाले जाने पर ये लोग कम्बोज-बाह्यीक में आकर बस गये और वहाँ की सभ्यता से प्रभावित रहे । हिंदुकुश को पार कर वे चितराल देश के पश्चिम से उत्तरी स्वात और हज़ारा के रास्ते आगे बढ़ते रहे । तुखार प्रदेश की उनकी पाँच रियासतों पर उनका अधिकार हो गया । ई॰ पूर्व प्रथम शती में कुषाणों ने यहाँ की सभ्यता को अपनाया ।

कुजुल कडफाइसिस

कुषाणों के एक सरदार का नाम कुजुल कडफाइसिस था । उसने काबुल और कन्दहार पर अधिकार कर लिया । पूर्व में यूनानी शासकों की शक्ति कमज़ोर हो गई थी, कुजुल ने इस का लाभ उठा कर अपना प्रभाव यहाँ बढ़ाना शुरू कर दिया । पह्लवों को पराजित कर उसने अपने शासन का विस्तार पंजाब के पश्चिम तक स्थापित कर लिया। मथुरा में इस शासक के तांबे के कुछ सिक्के प्राप्त हुए है ।

विम तक्षम

विम तक्षम लगभग 60 ई॰ से 105 ई॰ के समय में शासक हुआ होगा। विम बड़ा शक्तिशाली शासक था । अपने पिता कुजुल के द्वारा विजित राज्य के अतिरिक्त विम ने पूर्वी उत्तर प्रदेश तक अपने राज्य की सीमा स्थापित कर ली । विम ने राज्य की पूर्वी सीमा बनारस तक बढा ली । इस विस्तृत राज्य का प्रमुख केन्द्र मथुरा नगर बना । विम के बनाये सिक्के बनारस से लेकर पंजाब तक बहुत बड़ी मात्रा में मिले है । प्राप्त सिक्कों पर एक तरफ राजा की मूर्ति अंकित है तथा सिक्के के दूसरी तरफ एक नंदी बैल के साथ खड़े हुए शिव अंकित हैं सिंहली ओर खरोष्ठी लिपि में लेख भी मिलते है । [5] सिक्कों पर नंदी के साथ शिव की मूर्ति के बने होने और 'महिवरस' (माहेश्वरस्य) उपाधि होने से ज्ञात होता है कि यह राजा शिव का भक्त था । मथुरा ज़िले में मांट गाँव के पास ही इटोकरी नामक टीले से विम की विशालकाय मूर्ति भी प्राप्त हुई है । इस मूर्ति का सिर खंडित है । सिंहासन पर बैठे हुए राजा ने लम्बा चोगा तथा सलवार की तरह का पायजामा पहना हुआ है । उसके हाथ में तलवार थी, जिसकी केवल मूंठ ही बची है, बाक़ी तलवार खंड़ित है । पैरो में फीते से कसे हुए जूते पहिने हुए है । उन के नीचे ब्राह्मी लिपी में लेख ख़ुदा हुआ है, यहाँ पर राजा का नाम तथा उसकी उपाधियों के विषय में इस प्रकार का विवरण है-'महाराज राजाधिराज देवपुत्र कुषाणपुत्र शाहि विम तक्षम [6] इस शिलालेख से पता चलता है कि विम ने अपने शासन के समय में एक मन्दिर [7] उद्यान, पुष्करिणी तथा कूप को भी निर्मित किया गया ।

मथुरा में कुषाण मथुरा में कुषाणों के देवकुल होने तथा विम की मूर्ति प्राप्त होने से यह अनुमान किया जा सकता है कि मथुरा में विम का निवास कुछ समय तक अवश्य रहा होगा और यह नगर कुषाण साम्राज्य के मुख्य केन्द्रों में से एक रहा होगा । विम ने राज्य की पूर्वी सीमा बनारस तक बढा ली । इस विस्तृत राज्य का प्रमुख केन्द्र मथुरा नगर बना । चीनी की पौराणिक मान्यता के अनुसार विम के उत्तरी साम्राज्य की प्रमुख राजधानी हिंदुकुश‎ के उत्तर तुखार देश में थी । भारतीय राज्यों का शासन 'क्षत्रपों' से कराया जाता था । विम का विशाल साम्राज्य एक तरफ चीन के साम्राज्य को लगभग छूता था तो दूसरी तरफ उसकी सीमाएं दक्षिण के सातवाहन राज्य को छूती हुई थी । इतने विशाल एवं विस्तृत राज्य के लिए प्रादेशिक शासकों का होना भी आवश्यक था ।

व्यापार और सिक्के

विम के शासन-काल में विदेशों से भी व्यापारिक संबंध रहे । इसके शासन में रोम साम्राज्य के साथ भारत का व्यापार बहुत बढ़ा । राज्य वासी, कपड़े, बहुमुल्य रत्न, मसाले, लकड़ी की वस्तुएं तथा रंग रोम राज्य को भेजते थे और रोम के शासक, बदले में स्वर्ण सिक्के बडी़ संख्या में यहाँ भेजते थे । उत्तर तथा दक्षिण भारत के विभिन्न स्थानों से रोमन शासकों के सिक्कों बड़ी मात्रा में प्राप्त हुए हैं, जिनसे इस कथन का प्रमाण मिलता है । विम के ताँबे के सिक्के भी बड़ी संख्या में मिले थे । विदेशों से व्यापार को बढ़ाने के लिए विम ने अपने सोने के भी सिक्के भी बनवा कर चलवाये । ये सिक्के नाप तोल में रोमन सिक्कों के बराबर ही थे । इन सोने के सिक्कों पर भी एक तरफ शिव की ही मूर्ति अंकित है, इन सब प्रमाणों से विम का शैव होना सिद्ध हो जाता है [8]

कनिष्क(115-147 ई॰ लगभग)

कनिष्क (115-147 ई॰ लगभग)- कनिष्क विम के पश्चात सिंहासन पर आसीन हुआ । कनिष्क, विम के परिवार से सम्बध्द न होकर कुषाणों के किसी दूसरे घराने का सदस्य था या नहीं इसके संबन्ध में विद्वानों का मत भिन्न है । राबाटक लेख के अनुसार वह विम का उत्तराधिकारी और सर्वाधिक प्रसिद्ध कुषाण राजा था । उसका राज्य मध्य एशिया से लेकर भारत के पूर्वी भाग तक था । इस प्रकार वह एक विशाल साम्राज्य का शक्तिशाली सम्राट था् । कनिष्क ने अपने राज्यारोहण के समय से एक नया संवत प्रारम्भ किया, जो शक-संवत के नाम से जाना जाता है । कनिष्क कुषाण वंश का सबसे वीर, प्रतापी, प्रसिद्ध शासक हुआ । अफ़ग़ानिस्तान और कश्मीर से लेकर पूर्व में बनारस तक उसके अधिकार में था । चीन के अन्तर्गत तुर्किस्तान(तुर्की) पर भी कनिष्क ने आक्रमण किया, जहाँ उसकी जीत हुई । इस जीत के बाद कनिष्क का राज्य उत्तर में काशगर, यारकंद तथा खोतन तक स्थापित हो गया था । खोतनी साहित्य तथा चीनी साहित्य में कनिष्क की अनेक विजय यात्राओं का उल्लेख मिलता है ।

कनिष्क का राज्य

बौद्ध साहित्य के अनुसार कनिष्क के अधिकार में पाटलिपुत्र तक का प्रदेश था । धर्मपिटक-निदान सूत्र के चीनी अनुवाद से पता चलता है कि कनिष्क ने पाटलिपुत्र को भी जीत कर अपने साम्राज्य में मिला लिया था । वहाँ से उसने भगवान् बुद्ध के कमंडल को प्राप्त किया था । बौद्ध भिक्षु अश्वघोष और बुद्ध का कमंडल वह उधर से वह अपने साथ लेकर आया था । कनिष्क ने विदेशी होते हुए भी भारतीय धर्म और संस्कृति के प्रति अपनी आस्था प्रकट की और बौद्ध धर्म की दीक्षा ली , किन्तु वह अन्य भारतीय धर्मों के प्रति भी बहुत उदार था और अन्य सभी धर्मों का आदर करता था । उसके समय में बनाये गए सिक्कों पर बुद्ध के साथ साथ हिन्दू देवताओं की मूर्तियाँ तथा उनके नाम अंकित हैं । वह कलाओं का संरक्षक और विद्धानों का आश्रयदाता था ।

कनिष्क का दरबार

उसके दरबार में वसुमित्र, अश्वघोष, नागार्जुन, पार्श्व, चरक, संघरक्ष, और माठर जैसे विख्यात विद्धानों के अतिरिक्त अनेक कवि और कलाकार भी थे । उसने बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार किया । साम्राज्य के प्रमुख स्थानों में बौद्ध स्तूप, संघाराम एवं मूर्तियों का निर्माण कराया था । उसने अपने शासन काल में काश्मीर में बौद्ध धर्म परिषद् का विशाल आयोजन किया था, जिसमें लगभग 500 बौद्ध भिक्षु सम्मिलित हुए थे । उसका सभापति आचार्य वसुमित्र तथा उप सभापति विख्यात कवि और विद्धान अश्वघोष था । उस परिषद् में बौद्ध धर्म ग्रंथों पर विचार-विमर्श हुआ । तत्पश्चात प्रमुख बौद्ध ग्रंथों को ताम्रपत्रों पर खुदवाया गया तथा उन्हें एक स्तूप में सुरक्षित रख दिया गया । उसके शासन-काल में बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय की विशेष उन्नति हुई थी । महायान के प्रसिद्ध विद्धान वसुमित्र और अश्वघोष का कनिष्क पर बहुत प्रभाव था ।

कनिष्क का निर्माणकार्य

पेशावर और तक्षशिला की तरह कनिष्क ने मथुरा में भी अनेक बौद्ध स्तूपों और मठों का निर्माण करवाया । उसके समय में धार्मिक सहिष्णुता बहुत थी, जिसके कारण बौद्ध धर्म के साथ-साथ जैन तथा हिंदू धर्म की भी उन्नति हुई । जैनियों के अनेक स्तूपों, तीर्थंकरों की प्रतिमाओं और अन्य विविध कला-कृतियों की रचना हुई । इन सब के साथ साथ इस काल में विष्णु, शिव, सूर्य, दुर्गा, कार्तिकेय आदि हिंदू देवी एवं देवताओं की भी प्रतिमाएं निर्मित हुई । इतने विशाल साम्राज्य को स्थापित करने के पश्चात कनिष्क ने उसकी शासन व्यवस्था की ओर अपना ध्यान केन्द्रित किया । उत्तर में पेशावर (पुरुषपुर) को इसने अपने राज्य का मुख्य केन्द्र बनाया ( सम्भवतः कनिष्क की राजधानी भी पुरुषपुर ही थी ) और मध्य में मथुरा तथा पूर्व में सारनाथ राज्य के मुख्य केन्द्र बनाये गये । कनिष्क के समय के एक लेख से पता चलता है ( जो सारनाथ में प्राप्त हुआ था ) कि कनिष्क की ओर से पूर्वी भाग के प्रतिनीधि शासक 'महाक्षत्रप खरपल्लान' तथा 'क्षत्रप वनप्पर' थे । इस प्रकार कनिष्क की ओर से विभिन्न भागों के शासन के लिए विभिन्न अधिकारी नियुक्त रहे होगें ।

कनिष्क का शासनकाल

कनिष्क के शासन काल में मथुरा नगर में चारों ओर उन्नति हुई । मथुरा नगर राज्य का राजनैतिक केन्द्र होने के साथ-साथ धर्म, कला, साहित्य एवं व्यापार का भी मुख्य केन्द्र बना हुआ था । कनिष्क बौद्ध धर्म का अनुयायी था । उसके सम्राज्य के प्रमुख स्थानों के साथ साथ मथुरा में भी बौद्ध धर्म की बड़ी उन्नति हुई तथा विभिन्न बौद्ध स्तूपों तथा संघारामों का निर्माण हुआ । मनुष्य के रूप में बुद्ध की प्रतिमा की रचना मथुरा में इसी काल से प्रारम्भ हुई । महायान धर्म के विस्तार के फलस्वरूप पूजा के निमित्त विभिन्न प्रकार के धार्मिक कर्म क्रियाओं एवं प्रतिमाओं का निर्माण बहुत बड़ी मात्रा में होना प्रारम्भ हो गया । मथुरा और उसके आसपास के क्षेत्र से कनिष्क के काल की बौद्ध प्रतिमाएँ भारी संख्या में प्राप्त हो चुकी हैं । महायान शाखा के आचार्य वसुमित्र और 'बुद्ध चरित' एवं 'सौंदरानंद' ग्रंथों के प्रसिद्ध रचयिता अश्वघोष कनिष्क की सभा के राजरत्न थे । इनके अलावा चरक, नागार्जुन, संघरक्ष,पार्श्र्व, माठर आदि अन्य कितने ही महान विद्वान, कवि और कलाकार कनिष्क की राजसभा में रहते थे । कुषाण के समय में मथुरा का महत्व बढ़ा । विविध धर्मों का विकास होने के साथ यहाँ स्थापत्य और मूर्तिकला की अभूतपूर्व प्रगति हुई । मथुरा में निर्मित मूर्तियों की माँग पूरे देश में होने लगी । श्रावस्ती, सारनाथ, साँची, कौशाम्बी, राजगृह आदि सुदूर स्थानों तक से मथुरा की बनी मूर्तियाँ मँगवाई जाती थी ।

मथुरा की व्यावसायिक उन्नति

उत्तर भारत के प्रमुख राजमार्ग पर स्थित होने के कारण मथुरा नगर की व्यावसायिक उन्नति हुई । । उस समय के शिलालेखों तथा साहित्यिक वर्णनों से ज्ञात होता है कि शिल्पियों और व्यापारियों ने अपने निकाय बनाये, जो बहुत समृद्ध होने के साथ-साथ अत्यधिक शक्तिशाली भी थे । ये निकाय बैंकों की देखरेख करते थे और उनका उपयोग जनता के लिए उपलब्ध था । इस काल का एक लेख नासिक से प्राप्त हुआ है जिसमें जुलाहों से दो निकायों का विवरण है, जिनमें क्रमश: 1 प्रतिशत 3/4प्रतिशत मासिक व्याज की दर पर 2,000 और 1,000 चाँदी के सिक्के जमा किये गये, इस प्रकार का विवरण उदधृत है नासिक, जुन्नर आदि से प्राप्त शिलालेखों में कुम्हारों, अन्न का व्यवसाय करने वालों, बाँस का काम करने वालों, तेलियों, पनचक्की चलाने वालों आदि के निकायों का विवरण मिलता है । सार्वजनिक हित के कार्यो में ये निकाय दान भी देते थे । धार्मिक एवं अन्य प्रयोजनों के लिए इन निकायों में अपना रुपया जमा करना नागरिक सुविधाजनक समझते थी ।

कुषाण साम्राज्य

कनिष्क के समय के कुषाण साम्राज्य बहुत विस्तृत था । उसके शासन में रोम, मध्य एशिया तथा चीन के साथ राज्य के व्यापारिक संबंधों में बहुत वृद्धि हुई । भारत से पशु-पक्षी, वनस्पति-पदार्थ, वस्त्र, फल, अन्न तथा बहुमूल्य रत्न का निर्यात किया जाता था और बदले में सोना, चाँदी, दास-दासियों, घोड़े, चमकीले रंग, फल-फूलों से निर्मित वस्तुएँ और धातुओं का आयात किया जाता था । कनिष्क के समय में चीन का रेशम बहुतायत में भारत आने लगा था । राजा और नगर के प्रतिठित व्यक्ति चीनी रेशमी वस्त्र धारण करना बहुत पसन्द करते थे मथुरा, कौशांबी, अमरावती आदि स्थानों से प्राप्त बहुत सी मूर्तियों पर रेशमी वस्त्र दिखाई पड़ते है । भगवान बुद्ध के चीवर प्राय: रेशमी वस्त्र के दिखाये गये है । कलाकारों ने सौंदर्य के अनिंद्य साधन के रूप में नारी की अंकित करने के उद्देश्य से सन्नतांगी सुन्दरियों को झीने चीनदेशीय दुकूलों से इन महीन वस्त्रों से स्त्रियों का सुकुमार यौवन तथा सौंदर्य दिखाई पड़ता था । मथुरा के व्यापारी भारत के अनेक नगरों में व्यापार के लिए जाते थे । तत्कालीनभारत के अन्य प्रमुख नगरों के साथ भी मथुरा के व्यापारिक एवं सांस्कृतिक संबंध रहे होगें

वासिष्क (102 -106 ई॰)

कनिष्क के पश्चात वासिष्क (102 -106 ई॰) कुषाण साम्राज्य के सिंहासन पर बैठा । वासिष्क के काल में बने हुए दो लेख मिले हैं जो क्रमशःचौबीस तथा अट्ठाईसवें शक सवंत के है, जिनसे अनुमान होता है कि ई॰ 102 ई॰ से 106 ई॰ तक वासिष्क ने राज्य किया । प्रथम लेख मथुरा नगर में यमुना पार ईसापुर नामक गाँव में मिला है, इस शिलालेख में मथुरा के ब्राह्मणों द्वारा 'द्वादशरात्र' नाम का वैदिक यज्ञ करने का विवरण है । दूसरे लेख में कनिष्क के पिता बाझेष्क का नाम आया है शायद यह वासिष्क का ही नाम है, यह सम्भवतः कनिष्क द्वितीय का पिता रहा होगा । कल्हण की 'राजतरंगिणी' में भी राजा जुष्क का नाम है, जिसने सम्भवतः जुष्कपुर नामक नगर [9]बसाया होगा तथा जो संभवत: राजा वासिष्क के लिए ही लिखा गया है ।

हुविष्क(सं.163.-सं.195)

हुविष्क (सं. 163. सं. 195) कनिष्क का पौत्र था । वासिष्क के बाद कुषाण साम्राज्य का शासक हुविष्क हुआ । इसके राज्य-काल में लेख 28वें वर्ष से लेकर 60 वर्ष तक के मिले है, जिनसे पता चलता है कि हुविष्क ने 106 ई॰ से लेकर 138 ई॰ तक शासन किया इसके सिक्कों तथा लेखों के प्राप्ति-स्थानों से पता चलता है कि काबुल से लेकर मथुरा के कुछ पूर्व तक हुविष्क का अधिकार फैला हुआ था ।

हुविष्क और बौद्धधर्म

हुविष्क बौद्ध धर्म का प्रेमी था । कनिष्क की समान यह राजा भी बौद्ध धर्म का संरक्षक था । मथुरा में इसके द्वारा एक विशाल बौद्ध विहार की स्थापना की गई, जिसका नाम 'हुविष्क विहार' था । इसके अतिरिक्त अन्य कई स्तूप और विहार इसके राज्य-काल में मथुरा में बनाये गये । बौद्ध मूर्तियों का निर्माण बहुत बड़ी संख्या में हुआ । मथुरा से प्राप्त एक लेख से पता चलता है कि हुविष्क के पितामह के समय में निर्मित देवकुल की दशा ख़राब होने पर उसकी मरम्मत हुविष्क के शासन-काल में की गई । [10] कुषाण काल में 'त्रिपिटकाचार्य बल' मथुरामंडल में बौद्ध धर्म के प्रसिद्ध आचार्य हुए थे । हुविष्क ने सोने और तांबे के सिक्के बड़ी संख्या में बनवाये । इन सिक्कों पर एक तरफ राजा की मूर्ति तथा दूसरी तरफ राजा कनिष्क के सिक्कों की तरह हिंदु,सुमेरी, ईरानी, यूनानी,आदि देवताओं की मूर्तियों का अंकन मिलता है । हुविष्क के सिक्के अपेक्षाकृत अधिक संख्या व भाँति- भाँति के मिले है । कनिष्क के सिक्के सीमित हैं । परन्तु इन दोनों राजाओं के सिक्कों पर राजा की उपाधि, उनका नाम और देवताओं के नाम यूनानी लिपि में अंकित मिले है । [11]

कल्हण-कृत राजतंरगिणी

कल्हण-कृत राजतरंगिणी में विवरण मिलता है कि कनिष्क द्वितीय हुविष्क का समकालीन था । विद्वानों के अनुसार वह कनिष्क प्रथम का पौत्र तथा वासिष्क का पुत्र था । उसकी उपाधियाँ महाराज, राजातिराज, देवपुत्र केसर (?)मिलती है । संभवत: हुविष्क के समय में कनिष्क द्वितीय काश्मीर और उसके आस-पास के प्रदेश का शासक था । राजतरंगिणी के अनुसार काश्मीर में कनिष्कपुर नामक नगर की स्थापना करने वाला सम्भवतः यही राजा था ।* कनिष्क द्वितीय के सिक्के भी प्राप्त हुए है, जिन पर एक ओर वेदी के पास खड़े हुए राजा की और दूसरी ओर नंदी सहित बैल की मूर्ति अंकित है । यूनानी लेख के साथ इन सिक्कों पर ब्राह्मी लिपी के अक्षर भी अंकित मिलते है । हुविष्क के बाद मथुरा पर वासुदेव का शासन रहा । प्राय: मथुरा और उसके निकट से इसके समय के लेख प्राप्त हुए है, जिससे ज्ञात होता है कि वासुदेव के शासन के समय में कुषाण वंश का अधिकार कम हो गया था ।


वासुदेव के सिक्कों पर नंदी बैल सहित शिव की मूर्ति मिलती है ।* इस का झुकाव शैव धर्म की ओर पता चलता है । अपने पूर्ववर्ती शासक विम तथा कनिष्क द्वितीय की भाँति वासुदेव भी बौद्ध धर्म का नहीं वरन शैव मत का अनुयायी ज्ञात होता है । वासुदेव को साहित्य से भी रूचि थी । विद्वान राजशेखर ने अपने ग्रंन्थ 'काव्यमीमांसा' में वासुदेव नामक राजा का उल्लेख किया है और लिखा है कि सातवाहन, शूद्रक, साहसांक आदि राजाओं की तरह वह कवियों का आश्रयदाता तथा सभापति का वर्णन किया है ।* वासुदेव के शासन-काल में हिंदू देवी-देवताओं की प्रतिमाओं का निर्माण बड़ी संख्या में हुआ ।

परवर्तीं शासक

वासुदेव के शासन-काल का अंतिम लेख 38वें वर्ष का मिला है जिससे ज्ञात होता है कि 176 ई॰ के लगभग इसका देहांत हो गया होगा । वासुदेव, अंतिम प्रसिद्ध कुषाण- शासक था । वासुदेव के बाद कनिष्क (तृतीय) तथा वसु (वासुदेव द्वितीय) आदि कई कुषाण राजाओं के सिक्कों तथा लेख मिले है । संभवत: चौथी शती में भी काश्मीर और गांधार में कनिष्क-वंशी कुषाण शासक का राज्य रहा । परवर्ती कुषाणों को हूणों से तथा उनके पश्चात मुसलमानों से लड़ना पड़ा । संभवत: नवीं शती में हिंदू राजाओं द्वारा उत्तर पश्चिचम में कुषाण के शासन की इतिश्री कर दी गई ।

वीथिका कुषाण कालीन मूर्ति कला

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. कनिंघम का अनुमान है कि मथुरा के क्षत्रपों के समय मथुरा-राज्य का विस्तार उत्तर में दिल्ली तक, दक्षिण में ग्वालियर तक तथा पश्चिम में अजमेर तक था - कनिंघम-क्वांयस आफ़ ऎंश्यट इंडिया (लंदन 1891) पृ.85 ; एलन - वही , भूमिका,पृ. 112-15 ।
  2. इस टीले से सिलेटी पत्थर की एक अत्यन्त कलापूर्ण स्त्री-मूर्ति मिली है, जिसकी बनावट और वेशभूषा से प्रकट है कि वह किसी विदेशी महिला की प्रतिमा है । यह अनुमान युक्तिसंगत प्रतीत होता है कि यह प्रतिमा स्वयं कंबोजिका की होगी, जिसने मथुरा में बौद्ध मठ आदि का निर्माण कराया ।
  3. मथुरा के सिंह-शीर्ष लेख में शोडास के नाम के साथ 'क्षत्रप' ही मिलता है । संभवतःइस लेख के लगने के समय राजुबुल उस समय जीवित था और शोडस उस समय राजकुमार था । मथुरा प्रदेश पर राजुबुल का अधिकार उसकी वृध्दावस्था में हुआ प्रतीत होता है । शोडास के समय में उत्तर-पश्चिम का एक बडा़ भाग उसके हाथ से निकल गया , पर मथुरा उसके अधिकार में बना रहा । एलन ने सर रिचर्ड बर्न के संग्रह के एक सिक्के का उल्लेख किया है , जिस पर 'महास्वतपसपुतस तोरणदासस' लेख मिलता है । यह सिक्का शोडस के सिक्कों जैसा ही है । एलन का अनुमान है कि तोरणदास(?) संभवतः राजुबुल के दूसरे पुत्र का नाम होगा । मोरा के लेख में राजुबुल के दूसरे पुत्र का उल्लेख मिलता है ।(एलन वही, पृष्ठ 112 )
  4. कुछ विद्वानों का अनुमान है कि ये शासक पार्थियन (पह्ल्व) वशं के थे ठीक नहीं । राजुबुल, नहपान तथा उनके वंश के शासकों के जो चेहरे सिक्कों पर मिलते हैं उन्हें देखने से यह स्पष्ट पता चलता है कि पह्ल्वओं से उनकी नितान्त भिन्नता है ।
  5. 'महरजस रजदिरजस सर्वलोग इशवरस महिश वरस विमकटफिशस ब्रदर'
    'महरज रजदिरज हिमकपिशस
    महरजस रजदिरजस सर्वलोग इश् वर महिश् वर विमकठफिसस ब्रदर
  6. इसमें प्रथम तीनों शब्द भारतीय उपाधियों के सूचक हैं ।'कुषाणपुत्र' वंश का परिचायक है, कुछ लोग इस शब्द से विम को 'कुषाण' नामक राजा (कुजुल) का पुत्र मानते हैं । 'शाहि' और 'तक्षम' शब्द ईरानी हैं, प्रथम का अर्थ 'शासक' तथा दूसरे का 'बलवान 'है।
  7. 'देवकुल' से मन्दिर का अभिप्राय लिया जाता है ।पर यहाँ इसका अर्थ 'राजाओं का प्रतिमा कक्ष' है । कुषाणों में मृत राजा की मूर्ति बनवाकर 'देवकुल 'में रखने की प्रथा थी । इस प्रकार का एक देवकुल मांट के उक्त टीले में तथा दूसरा मथुरा नगर के उत्तर में गोकर्णेश्वरमन्दिर के पास विद्यमान था ।दूसरी शती में सम्राट हुविष्क के शासनकाल में मांट वाले देवकुल की मरम्मत कराई गई ।
  8. पाणिनी ने 'शैव' शब्द का प्रयोग अपनी अष्टाध्यायी( 4, 1, 112)में किया है । पतंजलि के महाभाष्य (5,2,76) में 'शिव-भागवतों' का उल्लेख मिलता है । मथुरा से प्राप्त एक कुषाणकालीन मूर्ति में शक लोगों को शिव लिंग की पूजा करते हुए दिखाया है । विम के अतिरिक्त अन्य अनेक कुषाण शासकों के सिक्कों पर शिव-मूर्ति मिलती है । इन सब बातों से पता चलता है कि कुषाणकाल में शिव-पूजा का अच्छा प्रचार हो रहा था ।
  9. आजकल इसे 'जुकूर' कहते हैं, जो श्रीनगर के उत्तर में है । देखिये- अर्ली हिस्ट्री आफ इंडिया(चतुर्थ संस्करण) पृ.272 ।
  10. मांट के देवकुल विम, कनिष्क तथा चष्टन की पाषाण प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं, हुविष्क की नहीं । मथुरा नगर के उत्तर में यमुना तट पर प्रसिद्ध गोकर्णेश्वर कि मूर्ति वास्तव में शिव की नहीं है । इस विशाल मूर्ति की बनावट तथा उसकी वेशभूषा से स्पष्ट है कि वह किसी शक राजा की मूर्ति है । इसका सिर भी सुरक्षित है, जिसके ऊपर नोंकदार टोपी है । बहुत संभव है कि यह हुविष्क की ही प्रतिमा हो
  11. आरबी. व्हाइटहेड्. - कैटलाग आफ क्वाइंस इन दि पंजाब म्यूजियम,लाहोर (आक्सफोर्ड,1914)पृ.189-207। कनिष्क के सिक्कों पर लगभग बीस विभिन्न देवताओं की तथा हुविष्क के सिक्कों पर 25 से ऊपर की आकृतियाँ मिलती हैं ।

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