शांखायन ब्राह्मण

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शांखायन ब्राह्मण / Shankhayan Brahman

प्रवचनकर्ता

यह ॠग्वेद का द्वितीय उपलब्ध ब्राह्मण ग्रन्थ है। शांखायन का सांख्यायन रूप में भी कहीं-कहीं उल्लेख मिलता है। इसी का दूसरा नाम कौषीतकि-ब्राह्मण भी है। ॠग्वेद की बाष्कल-शाखा से इसका सम्बन्ध बतलाया गया है। इस पर कोई भी प्राचैइन भाष्य प्रकाशित नहीं हुआ है।[1] सम्पूर्ण ग्रन्थ 30 अध्यायों में विभक्त है। प्रत्येक अध्याय में खण्डों का अवान्तर विभाजन प्राप्त होता है। कुल 227 खण्ड हैं। परम्परा इसके प्रवचन का श्रेय शांखायन अथवा कौषीतकि (या कौषीतक) को देती है। शांखायन ब्राह्मण में अनेक स्थानों पर उनके मतों का नाम्ना उल्लेख है ताण्ड्यमहा ब्राह्मण में कौषीतकों का उल्लेख व्रात्यभावापन्न रूप में है-
एतेन वै शमनीचामेढ्रा अयजन्त तेषां कुषीतक: सामश्रवसो गृहपतिरासीत्तान् लुशाकपि: खार्गलिरनुव्याहरदवाकीर्षत् कनीयांसौ स्तोमावुपागुरिति तस्मात् कौषीतकानां न कश्चनातीव जिहीतेयज्ञावकीर्णा हि।
उपर्युक्त पंक्तियों के अनुसार अयाज्य-याजन के कारण कौषीतक वंशियों को समाज में कोई श्रेय या प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं हुई। शाखायन आरण्यक में इनकी वंश-परम्परा का उल्लेख इस प्रकार है-
अथ वंश:। नमो ब्रह्मणे। नम आचार्येभ्यो गुणाख्याच्छाङ्खायनादस्माभिरधीतं गुणाख्य: शाङ्खायन: कहोलात् कौषीतके: कहोल: कौषीतकिरुद्दालकादाररुणेरुद्दाल आरुणि:।*
इसके अनुसार उद्दालक आरुणि से कहोल कौषीतकि ने, उनसे गुणाख्य शाङ्खायन ने और उनसे वंश-परम्परा के लेखक तक यह अध्ययन-परम्परा पहुँची। वास्तव में यह वंश-परम्परा विद्याक्रम से हैं, जन्म-क्रम से नहीं। कौषीतकि और शांखायन, इस परम्परा से, परस्पर गुरु-शिष्य सिद्ध होते हैं। अत: शांखायन को ही अन्तिम रूप से शांखायनशाखीय ब्राह्मण ग्रन्थ का प्रवक्ता माना जाना चाहिए। आचार्य शांखायन ने ही अपने गुरु कौषीतकि के नाम पर इसका नामकरण कर दिया होगा, लेकिन परम्परा में शांखायन का नाम भी सुअक्षित रह गया। चरणव्यूह की महिदास-कृत टीका में उद्धत ‘महावर्ण’ के नाम श्लोक से भी इसकी पुष्टि होती है, जिसमें ब्राह्मण का नाम तो कौषीतकि ही है, किन्तु शाखा शांखायनी कही गई है-
उत्तरे गुर्जरे देशे वेदो बह्वृच ईरित:। कौषीतकि ब्राह्मणं च शाखा शांखायनी स्थिता॥*
शंकराचार्य ने भी ब्रह्मसूत्र* के भाष्य में कौषीतकि-ब्राह्मण नाम को स्वीकार किया है। 30 अध्यायात्मक इस ब्राह्मण का उल्लेख अष्टाध्यायी में भी है।*

विषय सूची

विषय-निरूपण-शैली

ऐतरेय की अपेक्षा शांखायन-ब्राह्मण का वैशिष्ट्य यह है कि उसमें सोमयागों के अतिरिक्त इष्टियों और पशुयागों का प्रतिपादन भी हुआ है। शांखायन-ब्राह्मण के आरम्भिक छह अध्यायों में दर्शपूर्णमासादि की ही विवेचना है। ऐतरेय-ब्राह्मण की विषय-वस्तु के साथ उसकी समानता सप्तम अध्याय से आरम्भ होती है। ऐतरेय के अन्तिम 10 अध्यायों में निरूपित विषय-वस्तु शांखायन में स्वरूपत: नहीं है। ऐतरेय की अपेक्षा शांखायन-ब्राह्मण अधिक प्राचीन प्रतीत होता है। वास्तब में ऐतरेय-ब्राह्मण का सम्पादन शांखायन-प्रदत्त सामग्री से ही हुआ है, इसलिए शांखायन की अपेक्षा ऐतरेय-ब्राह्मण में अधिक स्पष्टत, सुबोधता तथा व्यवस्था है। शांखायन-ब्राह्मण में प्राप्त विशद विचार-विमर्श को छोड़कर, ऐतरेय-ब्राह्मण मे। अनेक तथ्यों की परिनिष्ठित रूप में प्रस्तुति दिखलाई देती है। उदाहरण के लिए शांखायन के आरम्भ में अग्नि की स्थिति पर विस्तृत चर्चा की गई है, जबकि ऐतरेय में इसका अस्तित्व नहीं हैं। दोनों में समान रूप से प्राप्त पंक्तियों से इनकी प्रतिपादन शैलियों की भिन्नता का आकलन किया जा सकता है-
अग्निर्वै देवानामवरार्ध्यो विष्णु: परार्ध्यस्तद्यश्चैव देवानामवरार्ध्यो यश्च परर्ध्यस्ताभ्यामेवैतत्सर्वा देवता: परिगृह्य सलोकतमाप्नोति’।*
इसी अभिप्राय की प्रस्तुति ऐतरेय-ब्राह्मण में अधिक सुस्पष्टता से हुई है-[2] शांखायन में ‘आग्नावैष्णवमेकादशकपालं पुरोडाशं निर्वपन्ति’ पंक्ति उद्धृत अंश से पहले आई है और ऐतरेय में बाद में। इस दृष्टि से ऐतरेय की व्यवस्था अधिक युक्तिसंगत प्रतीत होती है क्योंकि अग्नि और विष्णु के निमित्त पुरोडाश-निर्वाप-विधान से पूर्व याग में अग्नि और विष्णु की स्थिति को स्पष्ट कर देना आवश्यक था। रूप-समृद्धि को कौषीतकि-ब्राह्मण में ‘अभिरूपता’ कहा गया है। अपनी इसी सुव्यवस्थित निरूपण-शैली के कारण शांखायन की अपेक्षा ऐतरेय-ब्राह्मण को अधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई। लेकिन सोमयागों के साथ ही इष्टियों के भी प्रतिपादन के कारण शांखायन का महत्व अक्षुण्ण है। शांखायन की याग-मीमांसा में भी प्राचीनता का गौरव विद्यमान है।

आचार-मीमांसा

ऐतरेय-ब्राह्मण के सदृश शांखायन-ब्राह्मण में भी मानवीय आचार के नियामक और निर्देशक तत्व बाहुल्य से उपलब्ध होते हैं। व्यक्ति की पहचान वाणी से होती है, क्योंकि वह प्राणिमात्र की अधिष्ठात्री है। जीवन में प्रगति-पथ पर आगे बढ़ते हुए व्यक्ति के लिए वाणी परम उपादेय सिद्ध होती है, इस ओर शांखायन-ब्राह्मणकार का ध्यान है।[3] ऊपर ‘सर्प’ शब्द प्राणिमात्र के लिए व्यवहृत है। वाणी के संस्कार की दिशा उत्तर या पश्चिमोत्तर बतलाई गई है-
उदीच्यां दिशि प्रज्ञाततर वागुद्यते। उदञ्च उ एव यन्ति वाचं शिक्षितुम्। यो व तद् आगच्छति तस्य वा शुश्रूषन्त इति ह स्माह। एषा हि वाचो दिक् प्रज्ञाता।*

काशिका

वृत्ति में वामन-जयादित्य ने भी भाषा-ज्ञान की दृष्टि से उत्तर दिशा की सार्थकता बतलाई है।[4] स्मरणीय है कि महर्षि पाणिनि भी उत्तर दिशा में ही स्थित शलातुर स्थान पर उत्पन्न हुए थे। वाणी के गौरव-ज्ञापन के साथ ही सत्य-संभाषण की आवश्यकता भी शांखायन-ब्राह्मण में प्रतिपादित की गई है-
रात्र्या उ शीर्षन् सत्यं वदति। स यदि ह वा अपि तत ऊर्ध्वं मृषा वदति। सत्यं हैवास्योदितं भवति।*
सत्यमयो ह वा अमृतमय:।*
शांखायन-ब्राह्मण में पुरुष के शतायुष्य उत्सवमयता और शताधिक पराक्रमों और ऐन्द्रिक सामर्थ्य की आकांक्षा व्यक्त की गई है-‘शतायुर्वे पुरुष:’*; ‘शतायुर्वै पुरुष: शतपर्वा शतवीर्य: शतेन्द्रिय:’।* मानव-जीवन चतुष्टयात्मक है। भाष्यकार विनायक के हस्तलेख के अनुसार ‘चतुष्टय’ शब्द धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को लक्षित करता है। निष्कर्ष यह है कि शांखायन-ब्राह्मण प्रामाणिक याग-मीमांसा, प्राचीनता, संश्लिष्ट-प्रतिपादन और प्रेरक आचार-मीमांसा के कारण ब्राह्मण-साहित्य में अत्यन्त महत्वपूर्ण है।[5]

प्रकाशित संस्करण

अब तक इस ब्राह्मण के निम्नलिखित संस्करण मुद्रित हुए हैं-

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. शांखायन अथवा कौषीतकि ब्राह्मण पर विनायक नामक किसी भाष्यकार के भाष्य के अस्तित्व की सूचना हस्तलिखित ग्रन्थों की सूचियों में प्राप्त होती है। डॉ॰ मङ्गलदेव शास्त्री, कौषीतकि-ब्राह्मणपर्यालोचनम्, 1961 पृष्ठ 2
  2. अग्निर्वैदेवानामवमो विष्णु: परमस्तदन्तरेण सर्वा अन्या देवता: (ऐतरेय ब्राह्मण 1.1.1)।
  3. अथो वाग्वै सार्पराज्ञी। वाग्घि सर्पतो राज्ञी (कौषीतकि ब्राह्मण 27.4)
  4. प्रागुदञ्चौ विभजते हंस: क्षीरोदके यथा।
    विदुषां शब्दसिद्ध्यर्थं सा न: पातु शरावती॥ काशिकावृत्ति 1.1.75
  5. विशेष अध्ययनार्थ डॉ॰ गंगासागर राय का ग्रन्थ ‘शांखायन ब्राह्मण’ अवलोकनीय है।

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