शालिग्राम

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सालिग्राम / शालिग्राम / Shaligram / Saligram

(पद्म पुराण के अनुसार)

शालिग्राम का स्वरूप और महिमा का वर्णन

  1. भगवान गदाधर एक चक्र से चिह्नित देखे जाते हैं।
  2. लक्ष्मीनारायण दो चक्रों से,
  3. त्रिविक्रम तीन से,
  4. चतुर्व्यूह चार से,
  5. वासुदेव पाँच से,
  6. प्रद्युम्न छ: से,
  7. संकर्षण सात से,
  8. पुरुषोत्तम आठ से,
  9. नवव्यूह नव से,
  10. दशावतार दस से,
  11. अनिरुद्ध ग्यारह से और
  12. द्वादशात्मा बारह चक्रों से युक्त होकर जगत की रक्षा करते हैं।
  13. इससे अधिक चक्र चिह्न धारण करने वाले भगवान का नाम अनन्त है।

प्राप्तिस्थल

गण्डकी अर्थात नारायणी नदी के एक प्रदेश में शालिग्राम स्थल नाम का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है; वहाँ से निकलनेवाले पत्थर को शालिग्राम कहते हैं। शालिग्राम शिला के स्पर्शमात्र से करोड़ों जन्मों के पाप का नाश हो जाता है। फिर यदि उसका पूजन किया जाय, तब तो उसके फल के विषय में कहना ही क्या है; वह भगवान के समीप पहुँचाने वाला है। बहुत जन्मों के पुण्य से यदि कभी गोष्पद के चिह्न से युक्त श्रीकृष्ण शिला प्राप्त हो जाय तो उसी के पूजन से मनुष्य के पुनर्जन्म की समाप्ति हो जाती है। पहले शालिग्राम-शिला की परीक्षा करनी चाहिये; यदि वह काली और चिकनी हो तो उत्तम है। यदि उसकी कालिमा कुछ कम हो तो वह मध्यम श्रेणी की मानी गयी है। और यदि उसमें दूसरे किसी रंग का सम्मिश्रण हो तो वह मिश्रित फल प्रदान करने वाली होती है। जैसे सदा काठ के भीतर छिपी हुई आग मन्थन करने से प्रकट होती है, उसी प्रकार भगवान विष्णु सर्वत्र व्याप्त होने पर भी शालिग्राम शिला में विशेष रूप से अभिव्यक्त होते हैं। जो प्रतिदिन द्वारका की शिला-गोमती चक्र से युक्त बारह शालिग्राम मूर्तियों का पूजन करता है, वह वैकुण्ठ लोक में प्रतिष्ठित होता है। जो मनुष्य शालिग्राम-शिला के भीतर गुफ़ा का दर्शन करता है, उसके पितर तृप्त होकर कल्प के अन्ततक स्वर्ग में निवास करते हैं। जहाँ द्वारकापुरी की शिला- अर्थात गोमती चक्र रहता है, वह स्थान वैकुण्ठ लोक माना जाता है; वहाँ मृत्यु को प्राप्त हुआ मनुष्य विष्णुधाम में जाता है। जो शालग्राम-शिला की क़ीमत लगाता है, जो बेचता है, जो विक्रय का अनुमोदन करता है तथा जो उसकी परीक्षा करके मूल्य का समर्थन करता है, वे सब नरक में पड़ते हैं। इसलिये शालिग्राम शिला और गोमती चक्र की ख़रीद-बिक्री छोड़ देनी चाहिये। शालिग्राम-स्थल से प्रकट हुए भगवान शालिग्राम और द्वारका से प्रकट हुए गोमती चक्र- इन दोनों देवताओं का जहाँ समागम होता है, वहाँ मोक्ष मिलने में तनिक भी सन्देह नहीं है। द्वारका से प्रकट हुए गोमती चक्र से युक्त, अनेकों चक्रों से चिह्नित तथा चक्रासन-शिला के समान आकार वाले भगवान शालिग्राम साक्षात चित्स्वरूप निरंजन परमात्मा ही हैं। ओंकार रूप तथा नित्यानन्द स्वरूप शालिग्राम को नमस्कार है।

तिलक की विधि

तिलक की विधि का वर्णन इस प्रकार है-

अपराध और उनसे छूटने के उपाय

  1. भगवान के मन्दिर में खड़ाऊँ या सवारी पर चढ़कर जाना,
  2. भगवत-सम्बन्धी उत्सवों का सेवन न करना,
  3. भगवान के सामने जाकर प्रणाम न करना,
  4. उच्छिष्ट या अपवित्र अवस्था में भगवान की वन्दना करना,
  5. एक हाथ से प्रणाम करना
  6. भगवान के सामने ही एक स्थान पर खड़े-खड़े प्रदक्षिणा करना,
  7. भगवान के आगे पाँव फैलाना,
  8. पलंग पर बैठना,
  9. सोना,
  10. खाना,
  11. झूठ बोलना,
  12. जोर-जोर से चिल्लाना,
  13. परस्पर बात करना,
  14. रोना,
  15. झगड़ा करना,
  16. किसी को दण्ड देना,
  17. अपने बल के घंमड में आकर किसी पर अनुग्रह करना,
  18. स्त्रियों के प्रति कठोर बात कहना,
  19. कम्बल ओढ़ना,
  20. दूसरे की निन्दा,
  21. परायी स्तुति,
  22. गाली बकना,
  23. अधोवायु का त्याग (अपशब्द) करना
  24. शक्ति रहते हुए गौण उपचारों से पूजा करना-
  25. मुख्य उपचारों का प्रबन्ध न करना,
  26. भगवान को भोग लगाये बिना ही भोजन करना,
  27. सामयिक फल आदि को भगवान की सेवा में अर्पण न करना,
  28. उपयोग में लाने से बचे हुए भोजन को भगवान के लिये निवेदन करना,
  29. भोजन का नाम लेकर दूसरे की निन्दा तथा प्रशंसा करना,
  30. गुरु के समीप मौन रहना,
  31. आत्म-प्रशंसा करना तथा
  32. देवताओं को कोसना- ये विष्णु के प्रति बत्तीस अपराध बताये गये हैं। 'मधुसूदन! मुझसे प्रतिदिन हज़ारों अपराध होते रहते हैं; किन्तु मैं आपका ही सेवक हूँ, ऐसा समझकर मुझे उनके लिये क्षमा करें।'[1]। इस मन्त्र का उच्चारण करके भगवान के सामने पृथ्वी पर दण्ड की भाँति पड़कर साष्टांग प्रणाम करना चाहिये। ऐसा करने से भगवान श्रीहरि सदा हज़ारों अपराध क्षमा करते हैं।

हविष्यात्र

  1. द्विजातियों के लिये सबेरे और शाम- दो ही समय भोजन करना वेद विहित है।
  2. गोल लौकी, लहसुन, ताड़का फल और भाँटा- इन्हें वैष्णव पुरुषों को नहीं खाना चाहिये।
  3. वैष्णव के लिये बड़, पीपल, मदार, कुम्भी, तिन्दुक, कोविदार (कचनार) और कदम्ब के पत्ते में भोजन करना निषिद्ध है।
  4. जला हुआ तथा भगवान को अर्पण न किया हुआ अन्न, जम्बीर और बिजौरा नीबू, शाक तथा ख़ाली नमक भी वैष्णव को नहीं खाना चाहिये।
  5. यदि दैवात कभी खा ले तो भगवन्नाम का स्मरण करना चाहिये।
  6. हेमन्त ऋतु में उत्पन्न होने वाला सफेद धान जो सड़ा हुआ न हो, मूँग, तिल, यव, केराव, कंगनी, नीवार (तीना), शाक, हिलमोचिका (हिलसा), कालशाक, बथुवा, मूली, दूसरे-दूसरे मूल-शाक, सेंधा और साँभर नमक, गाय का दही, गाय का घी, बिना माखन निकाला हुआ गाय का दूध, कटहल, आम हर्रे, पिप्पली, ज़ीरा, नारंगी, इमली, केला, लवली (हरफा रेवरी), आँवले का फल, गुड़ के सिवा ईंख के रस से तैयार होने वाली अन्य सभी वस्तुएँ तथा बिना तेल के पकाया हुआ अन्न-इन सभी खाद्य पदार्थों को मुनि लोग हविष्यान्न कहते हैं।

तुलसी की महिमा

जो मनुष्य तुलसी के पत्र और पुष्प आदि से युक्त माला धारण करता है, उसको भी विष्णु ही समझना चाहिये। आँवले का वृक्ष लगाकर मनुष्य विष्णु के समान हो जाता है। आँवले के चारों ओर साढे तीन सौ हाथ की भूमि को कुरुक्षेत्र जानना चाहिये। तुलसी की लकड़ी के रुद्राक्ष के समान दाने बनाकर उनके द्वारा तैयार की हुई माला कण्ठ में धारण करके भगवान का पूजन आरम्भ करना चाहिये। भगवान को चढ़ायी हुई तुलसी की माला मस्तक पर धारण करे तथा भगवान को अर्पण किये हुए चन्दन के द्वारा अपने अंगों पर भगवान का नाम लिखे। यदि तुलसी के काष्ठ की बनी हुई मालाओं से अलकृंत होकर मनुष्य देवताओं और पितरों के पूजनादि कार्य करे तो वह कोटिगुना फल देनेवाला होता है। जो मनुष्य तुलसी के काष्ठ की बनी हुई माला भगवान विष्णु को अर्पित करके पुन: प्रसाद रूप से उसको भक्ति पूर्वक धारण करता है, उसके पातक नष्ट हो जाते हैं। पाद्य आदि उपचारों से तुलसी की पूजा करके इस मन्त्र का उच्चारण करे- जो दर्शन करने पर सारे पापसमुदाय का नाश कर देती है, स्पर्श करने पर शरीर को पवित्र बनाती है, प्रणाम करने पर रोगों का निवारण करती है, जल से सींचने पर यमराज को भी भय पहुँचाती है, आरोपित करने पर भगवान श्रीकृष्ण के समीप ले जाती है और भगवान के चरणों में चढ़ाने पर मोक्ष रूपी फल प्रदान करती है, उस तुलसी देवी को नमस्कार है। [2]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. (अपराधसहस्त्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया। तवाहमिति मां मत्वा क्षमस्व मधुसूदन॥ (पद्म पुराण,79।44))
  2. ( या दृष्टा निखिलाघसंशमनी स्पृष्टा वपुष्पावनी रोगाणामभिवन्दिता निरसनी सिक्तान्तकत्रासिनी।
    प्रत्यासत्तिविधायिनी भगवत: कृष्णस्य संरोपिता न्यस्ता तच्चरणे विमुक्तिफलदा तस्यै तुलस्यै नम:॥ (पद्मपुराण)
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