शैव मत

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शैव मत / शैव संप्रदाय / Shaiv Sect

  1. शैव
  2. पाशुपत
  3. कालदमन और
  4. कापालिक।
  1. कंठहार
  2. आभूषण
  3. कर्णाभूषण
  4. चूड़ामणि
  5. भस्म और
  6. यज्ञोपवीत। इनके आचार शिव के घोर रूप के अनुसार बड़े वीभत्स थे, जैसे कपालपात्र में भोजन, शव के भस्म को शरीर पर लगाना, भस्मभक्षण, यष्टिधारण, मदिरापात्र रखना, मदिरापात्र का आसन बनाकर पूजा का अनुष्ठान्करना आदि। कालमुख साहित्य में कहा गया है कि इस प्रकार के आचरण से लौकिक और पारलौकिक सभी कामनाओं की पूर्ति होती है। इसमें सन्देह नहीं की कापालिका क्रियायँ शुध्द शैवमत से बहुत दूर चली गयीं और इनका मेल वाममार्गी शाक्तों से अधिक हो गया।
  1. पाशुपत और
  2. आगमिक।
  1. पाशुपात,
  2. लघुलीश पाशुपत,
  3. कापालिक,
  4. नाथ सम्प्रदाय,
  5. गोरख पन्थ,
  6. रंगेश्वर।
  1. शैव सिध्दान्त,
  2. तमिल शैव
  3. काश्मीर शैव,
  4. वीर शैव।
  1. कार्य
  2. कारण
  3. योग
  4. विधि और
  5. दुःखान्त्।
  1. हँसना
  2. गाना
  3. नाचना
  4. हुंकारना और
  5. नमस्कार।
  1. स्पन्द शास्त्र और
  2. प्रत्यभिज्ञा शास्त्र। पहली शाखा के मुख्य ग्रन्थ ‘शिव दृष्टि’ (सोमानन्द कृत), ‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका’ (उत्पलाचार्य कृत), ईश्वरप्र्त्यभिज्ञाकारिकाविमर्शिनी’ और (अभिनवगुप्त रचित) ‘तन्त्रालोक’ हैं। दोनों शाखाओं में कोई तात्त्विक भेद नहीं है; केवल मार्ग का भेद है। स्पन्द शास्त्र में ईश्वराद्वय्की अनुभूति का मार्ग ईश्वरदर्शन और उसके द्वारा मलनिवारण है। प्रत्यभिज्ञाशास्त्र में ईश्वर के रूप में अपनी प्रत्यभिज्ञा (पुनरनुभूति) ही वह मार्ग है। इन दोनों शाखाओं के दर्शन को ‘त्रिकदर्शन’ अथवा ईश्वराद्वयवाद’ कहा जाता है।

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