षडविंश ब्राह्मण

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षडविंश ब्राह्मण / Shadvinsha Brahman

षडविंश-ब्राह्मण कौथुमशाखीय सामवेद का द्वितीय महत्त्वपूर्ण ब्राह्मणग्रन्थ है। जैसा कि पूर्वत: संकेत किया गया, षड्विंश कदाचित् ताण्ड्य ब्राह्मण का भाग माना जाता रहा है।भाष्योपक्रमणिका में सायण ने इसे 'ताण्डकशेषब्राह्मण' कहा है। मूलत: इसमें सोमयागों के ताण्ड्यानूक्त विषयों का ताण्ड्य की श्रङ्खला में विवेचन है, इस कारण भी यह ताण्ड्य ब्राह्मण का परिशिष्टि प्रतीत होता है।

विषय सूची

स्वरूप, विभाग तथा चयनक्रम

षडविंश ब्राह्मण में सम्प्रति छ: अध्याय हैं। नाम से प्रतीत होता है कि पहले कभी इन्हें एक ही अध्याय माना जाता होगा। षष्ठ अध्याय की विषय-वस्तु शेष पाँच अध्यायों की विषयवस्तु से भिन्न है, अतएव अद्भुत-ब्राह्मण के नाम से उस अंश की स्वतन्त्र मान्यता भी है। इस छठे अध्याय में प्रायश्चित्त और शकुनादि अद्भुत कर्मों का वर्णन है। कहा जाता है कि यह अध्याय ग्रन्थ से परवर्ती काल में सम्बद्ध हुआ। इस सन्दर्भ में प्रमुख युक्ति यह दी जाती है कि पंचम अध्याय का परिसमापन 'इति' से हुआ है-
तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति*
सायण-भाष्य से ज्ञात होता है कि 'इति' शब्द अध्याय की परिसमाप्ति का सूचक है। प्राचीन ग्रन्थों में सामान्यतया ग्रन्थ की समाप्ति या तो 'इति' से दिखलाई देती है या अन्तिम वाक्य की आवृत्ति से। छठे अध्याय का प्रारम्भ 'अथात:' से होना भी किसी नये ग्रन्थ के आरम्भ का द्योतक है- 'अथातोऽद्भुतानां कर्मणां शान्ति व्याख्यास्याम्:'।* उदाहरण के लिए ब्रह्मसूत्र और मीमांसासूत्र को लिया जा सकता है, जिनका आरम्भ क्रमश: 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' तथा 'अथातो धर्मजिज्ञासा' से हुआ है। किन्तु हमारे विचार से इस 'अथात:' का सम्बन्ध यहाँ नवीन ग्रन्थ के आरम्भ से न होकर नवीन वस्तु के निरूपण से है, जैसा कि सायण का कथन है कि इष्टप्राप्ति के साधनभूत कर्मों का निरूपण पहले पाँच अध्यायों में है और तत्पश्चात अनिष्टपरिहार के साधनों का निरूपण षष्ठ अध्याय में है।

षडविंश-ब्राह्मण के अब तक प्राय: सात विभिन्न संस्करण प्रकाशित हुए हैं, जिनमें व्यवस्था और विन्यासगत विपुल अन्तर है। यहाँ प्रो. बी.आर शर्मा और डब्ल्यू.बी. बोली (W.B. Bolle) के संस्करणों के आधार पर इस अन्तर को यों निर्दिष्ट किया जा सकता है। बोली का संस्करण मूलत: एच.एफ. ईलसिंह (H.F. Eelsingh) के शोध प्रबन्ध पर आधृत है। उसमें छ: प्रपाठकों को पाँच में ही समाविष्ट कर दिया गया है। यह निम्नप्रकार से किया गया है—

प्रतिपाद्य विषय

अध्यायानुसार षडविंश-ब्राह्मण की विषय-वस्तु इस प्रकार है-

प्रथम अध्याय

इसमें कुल 7 खण्ड हैं, जिनमें से प्रथम दो खण्डों में सुब्रह्यण्या निगद का वर्णन है। सर्गादि में ब्रह्म और सुब्रह्म दो ही के अस्तित्वसूचक अंशों से प्रारम्भ षडविंश-ब्राह्मण सुब्रह्मण्या निगद की गौरवमयी प्रशंसा करके यजमान को परामर्श देता है कि वह सुब्रह्मण्या के सर्वविधवेत्ता को ही सुब्रह्मण्य ऋत्विक् के पद पर नियुक्त करे। तृतीय खण्ड में तीनों सवनों के साम और उनके छन्दों का निरूपण है। चतुर्थखण्ड में ज्योतिष्टोम के सुत्याह के वाक् से पहले के कृत्यों तथा विश्वरूपागान का विधान हे। पंचम खण्ड में वसिष्ठगोत्रोत्पन्न ब्राह्मण को ही ब्रह्मा के पद पर प्रतिष्ठित करने के लिए कहा गया हा। प्रजापति ने भू:, भुव: और स्व: इन तीन महाव्याहृतियों को क्रमश: ॠग्वेद-यजुर्वेद और सामवेद से निस्सृत किया। इस खण्ड से तीन महाव्याहृतियों तथा प्रायश्चित्तपरक कृत्यों का भी विधान है। षष्ठ खण्ड में भी ज्ञात-अज्ञात त्रुटियों का प्रायश्चित्त विहित है। सप्तमखण्ड में अर्थवादपूर्वक सोमदेवविषयक अर्थात् सौम्य चरु के निर्वाप का विधान है।

द्वितीय अध्याय

इसमें भी 7 खण्ड हैं। 1-3 खण्डों में अग्निष्टोमान्तर्गत बहिष्पवमान के रेतस्या और धूरगानों का विधान है। चतुर्थखण्ड में होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा, उद्गाता और सदस्य प्रभृति ऋत्विजों तथा होत्राच्छंसी और चमसाध्वर्यु आदि उपऋत्विजों के यागगत प्रकीर्ण धर्मों का सामान्य निरूपण है। 5-7 खण्डों में तीनों सवनों में चमस-भक्षण हेतु उपहवादि का कथन है।

तृतीय अध्याय

प्रथम दो खण्डों में यह प्रदर्शित है कि होता आदि के द्वारा की गई भूलें यजमान के लिए हानिकारक होती हैं, अतएव उन्हें अपने कर्त्तव्यकर्म का पूर्णज्ञान प्राप्त करके यज्ञ को अङ्ग-वैकल्य से बचाये रखना चाहिए, क्योंकि यजमान की पशु-सम्पत्ति अध्वर्यु पर, कीर्ति होता पर, योगक्षेम ब्रह्मा पर और आत्मा उद्गाता पर आश्रित है। तृतीय खण्ड में ऋत्विक्-वरण, राजा से याग-भूमि की याचना और यागार्थ उपयुक्त भूमि का वर्णन है। चतुर्थ खण्ड में अवभृथ (स्नान) धर्म, यज्ञावशिष्ट द्रव्य का जल के समीप आनयन और रक्षोघ्न साम (अवभृथहेतुक) के गान-हेतुओं आदि का निरूपण है। 5-9 खण्डों में अभिचारयागों का विधान है, जिसके कारण इस ब्राह्मण का विशेष महत्त्व है। पंचम खण्ड में त्रिवृत्स्तोम की दो विष्टुतियों, षष्ठ में पंचदशस्तोम की विष्टुति, सप्तमखण्ड में सप्तदश स्तोम की विष्टुति, अष्टम में एकविंशस्तोम की विष्टुति तथा नवम में त्रिणवस्तोम की विष्टुति का वर्णन है।

चतुर्थ अध्याय

इसमें छ: खण्ड हैं। प्रथम खण्ड में व्यूढद्वादशाह याग के धर्मों का छन्दों के क्रम-परिवर्तन का कथन करते हुए निरूपण है। वस्तुत: यहाँ केवल नौ दिनों के कृत्यों का ही विधान है, क्योंकि प्रायणीयाख्य प्रथम दिन, उदयनीयाख्य 12वें दिन तथा 10वें दिन के कृत्य सभी यागों में समान होते हैं। द्वितीय खण्ड में श्येनयाग नामक अभिचार-याग का निरूपण तथा उसके स्तोत्रगत स्तोमों और सामों का कथन है। तृतीय और चतुर्थखण्डों में त्रिवृदग्निष्टोम और संदंश-यागों का निरूपण है। पंचमखण्ड में वज्रयाग का विधान तथा वज्र और संदंश यागों में गीयमान सामों का वैशिष्ट्य प्रदर्शित है। षष्ठ खण्ड वैश्वदेवाख्य त्रयोदशाह के निरूपण से सम्बद्ध है।

पंचम अध्याय

यह 7 खण्डों मे विभक्त हैं प्रथम खण्ड में अग्निहोत्र-निरूपण करते हुए उसकी ज्योतिष्टोम से तुलना की गई है। यजमान के पात्र से आज्य के गिर जाने पर प्रायश्चित्त का विधान है। हुतावशिष्ट, हवि ही इसकी दक्षिणा बतलाई गई है। द्वितीय खण्ड में कहा गया है कि अग्निहोत्र के अनुष्ठान से ही अन्य यागसाध्य इष्ट भी साधित हो जाते हैं। इसके समर्थन-हेतु एक आख्यायिका भी प्रस्तुत की गई है। तृतीय और चतुर्थ खण्डों में औदुम्बरी और यज्ञयूप का वैशिष्ट्यसहित निरूपण है। पंचम खण्ड में सन्ध्योपासनाविषयक विवरण प्राप्य है। षष्ठ खण्ड में चन्द्रमा के घटने-बढ़ने का निरूपण हैं देवगण शुक्लपक्ष में सोम-पान की दीक्षा लेते हैं और कृष्णपक्ष में सोम का भक्षण करते हैं। पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक- ये सोम-पान के तीन पात्र हैं। चन्द्रमा की 15 कलाएँ उपर्युक्त पात्रों के द्वारा देवताओं के भक्षण में काम आ जाती है और 16वीं कला औषधियों में प्रविष्ट हो जाती हे। सप्तम खण्ड में स्वाहा देवता की उत्पत्ति, पारिवारिक सम्बन्ध और उसके अक्षरादि का कथन है।

षष्ठ अध्याय

जैसा कि पहले सङ्केत किया गया है, इस अध्याय में अद्भुत कर्मो-अनिष्टों तथा अपशकुनों-की शान्ति का विधान है। इसमें कुल 12 खण्ड हैं, जिनमें से-


इस प्रकार यह ब्राह्मणग्रन्थ श्रौतयागों के साथ ही लोक-विश्वासों के आधार पर चलने वाले समानान्तर धार्मिक विश्वासों से सम्बद्ध आनुष्ठानिक कृत्यों का भी श्रौतस्वरूप में ही प्रस्तावक है। षड्विंशब्राह्मण में यज्ञीय विधि-विधानों की व्याख्या के सन्दर्भ में प्राय: 24 आख्यायिकाएँ आई हैं। इनमें से इन्द्र और अहल्याविषयक आख्यान, जिसका पुराणों में परवर्ती काल में प्रचुर पल्लवन हुआ, यहाँ विशेषरूप से उल्लेख्य है। षड्विंशब्राह्मण के विभिन्न संस्करणों में प्रो.बी.आर. शर्मा का 1967 में तिरुपति से प्रकाशित संस्करण श्रेष्ठ है।

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