सांख्य दर्शन और उपनिषद

Nayati
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उपनिषदों में सांख्य दर्शन / Sankhya and Upnishad

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्य: पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥
समाने वृक्षे पुरुषों निमग्नोऽनाशया शोचति मुह्यमान:।
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोक:॥
यदा पश्य: पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्।
तदा विद्वान्पुण्यपापे विधूय निरंजन: परमं साम्यमुपैति॥ - मुण्डकोपनिषद 3/1/1-3

अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां वह्वी: प्रजा सृजामानां सरूपा:।
अजो हि एको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्य:॥*

यहाँ लोहित शुक्ल कृष्ण वर्ण क्रमश: रजस, सत्त्व तथा तमस-त्रिगुण के लिए प्रयुक्त है। इन तीन गुणों से युक्त एक अजा (अजन्मा) तत्त्व है। इसका भोग करता हुआ एक अज तत्त्व है तथा भोग रहित एक और अज तत्त्व (परमात्मा) है। इस प्रकार यह उपनिषदवाक्य त्रिगुणात्मक प्रसवधर्मि (सृजन करने वाली) प्रकृति का उल्लेख भी करती है। परमात्मा को मायावी कहकर प्रकृति को ही माया कहा गया है।* इस प्रसंग में पुन: मायावी और माया से बन्धे हुए अन्य तत्त्व जीवात्मा का उल्लेख भी है।*

इन्द्रियेम्य: परं मनो मनस: सत्त्वमुत्तमम्।
सत्त्वादधिमहानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम्।
अव्यक्तात्तु पर: पुरुषो व्यापकोऽलिंग एव च॥
यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्त्वं च गच्छति। (कठोपनिषद- 2।3।7-8)

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