सांख्य मीमांसा

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सांख्य प्रमाण मीमांसा

विषय सूची

भारतीय दर्शन की एक सामान्य विशेषता है उसका मानव केन्द्रित होना। सांख्य दर्शन भी मानव केन्द्रित है। तत्त्व गणना या विवेचना साध्य नहीं है। यह साधन है मानव के अन्तर्निहित और स्पष्ट उद्देश्य की प्राप्ति का। उद्देश्य संसार के दु:खों से स्वयं को मुक्त करने की मानवी प्रवृत्ति ही रही है। अत: तदनुरूप ही सांख्याचार्यों ने उन विषयों की विवेचना को अधिक महत्व दिया, जिनसे उनके अनुसार उद्देश्य की प्राप्ति हो सके। मानव मात्र दु:ख से निवृत्ति चाहता है। संसार में दु:ख है- इस ज्ञान के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, दुख से मुक्ति हेतु प्रवृत्ति भी प्रमाणापेक्षी नहीं है। दु:खनिवृत्ति के मानवकृत सामान्य प्रयासों से तात्कालिक निवृत्ति तो होती है लेकिन ऐकान्तिक और आत्यन्तिक निवृत्ति नहीं होता। दु:ख क्यों होता है, कैसे उत्पन्न होता है, मानव दु:ख से क्यों मुक्त होना चाहता है- आदि प्रश्न गंभीर चिन्तनापेक्षी और उत्तरापेक्षी हे। यह चिन्तन और तदनुसार उत्तर ही दु:ख निवृत्ति में साधक हो सकते हैं। यह क्षेत्र ही 'ज्ञान' का है। अत: सांख्याचार्य अपनी दार्शनिक विवेचना का आरंभ ही दु:ख-विवेचना से करते हैं।

सांख्य दर्शन की प्रमाण-मीमांसा

द्वयोरेकतरस्य वाप्यसन्निकृष्टार्थपरिच्छित्ति: प्रमा
तत्साधकतमं यत्तत् त्रिविधं प्रमाणम्॥*

बुद्धि और पुरुष दोनों में से एक का पूर्व से अनधिगत अर्थ का अवधारण प्रमा है और उस प्रमा (यथार्थ ज्ञान) का जो अतिशय साधक (करण) है; उसे प्रमाण कहते हैं। प्रमा अर्थात ज्ञान की परिभाषा में अनधिगत और अवधारण दो महत्वपूर्ण शर्ते हैं। यथार्थ ज्ञान या प्रमा होने में। अनधिगत या जो पहले से ज्ञात नहीं है- उसे ही जाना जाता है। यदि पहले से ही ज्ञात हो तो उसकी स्मृति होगी यथार्थ ज्ञान नहीं। फिर अवधारणा अर्थात भली-भांति या निश्चयात्मक रूप से धारण करना भी एक शर्त है। अनिश्चित ज्ञान संशय रूप होगा। अत: परिच्छित्ति या अवधारणा प्रमा से संशय को पृथक् करता है। यथार्थ ज्ञान की परिभाषा में इसे बुद्धि और पुरुष दोनों में से 'एक' का भी कहा है। इसका आशय यह है कि ज्ञान बुद्धि को भी होता है पुरुष को भी। दोनों ही दशाओं में बुद्धि पुरुष संयोग अनिवार्य है। पुरुष शुद्ध चैतन्य है, असंग है। अत: विषय अवधारण तो बुद्धि में ही होता है। लेकिन पुरुष में उपचरित होता है। विचारणीय यह है कि बुद्धि तो अचेतन या जड़ है, उसे ज्ञान होता है, कहना भी संगत नहीं होगा। अत: ज्ञान तो पुरुष को ही होता है- ऐसा मानना होगा। फिर, समस्त विकार पुरुषार्थ हेतुक हैं। अत: बुद्धिवृत्ति भी साधन ही कही जाएगी पुरुषार्थ के लिए। सूत्रकार बुद्धि और पुरुष दोनों के 'ज्ञान' की संभावना को स्वीकार करते हैं। विज्ञान भिक्षु इस स्थिति को प्रमाता-साक्षी-भेद करके स्पष्ट करते हैं। उनके अनुसार पुरुष प्रमाता नहीं बल्कि प्रमा का साक्षी है। प्रमा चाहे बुद्धिनिष्ठ (बुद्धिवृत्ति) हो चाहे पुरुषनिष्ठ या पौरुषेयबोध या दोनों का हो, प्रमा का जो साधकतम करण होगा, उसे ही प्रमाण कहा जाएगा और यदि बुद्धिवृत्ति को प्रमा कहें तब इन्द्रिय सन्निकर्ष को प्रमाण कहा जाएगा।

  1. प्रत्यक्ष प्रमाण,
  2. अनुमान प्रमाण तथा
  3. शब्द प्रमाण।

प्रत्यक्ष प्रमाण

यत् सम्बद्धं सत् तदाकारोल्लेखि विज्ञानं तत् प्रत्यक्षं*— जिसके साथ सम्बद्ध होता हुआ उसी के आकार को निर्देशित करने वाला जो विज्ञान (बुद्धिवृत्ति) है वह प्रत्यक्ष है। प्रत्यक्ष की इस परिभाषा से सूत्रकार बुद्धिवृत्ति को प्रमाण रूप में स्वीकार करते प्रतीत होते हैं अर्थात वे प्रमा पौरुषेय बोध को मानते प्रतीत होते हैं क्योंकि इन्द्रिय का विषय से सन्निकर्ष होने पर इन्द्रिय विषयाकार नहीं होती वरन् बुद्धि विषयाकार होती है। बुद्धि का विषयाकार होना ही बुद्धिवृत्ति है।

अतिदूरात् सामीप्यादिन्द्रियघातान्मेनोऽनवस्थानात्। सौक्ष्म्याद्व्यवधानादभिभवात् समानाभिहाराच्च॥*

  1. शुद्ध और
  2. अशुद्ध प्रत्यक्ष।

अनुमान प्रमाण

प्रतिबन्धदृश: प्रतिबद्धानमनुमानम्*

  1. समव्याप्ति तथा
  2. विषमव्याप्ति।
  1. शेषवत,
  2. पूर्ववत तथा
  3. सामान्यतोदृष्ट भेदों की चर्चा की है।

शब्द प्रमाण

आप्तोपदेश: शब्द:।* आप्त व्यक्ति के उपदेश वचन को शब्द प्रमाण कहा जाता है। विज्ञान भिक्षु 'आप्ति' को योग्यता के अर्थ में स्वीकार करते हैं। विज्ञानभिक्षु के शिष्य भावागणेश 'स्वकर्मण्यभियुक्तो रागद्वेषरहितो ज्ञानवान् शीलसम्पन्न:*' को आप्त कहते हैं। उन आप्तों के वचनों का शब्द कहा जाता है। विज्ञानभिक्षु योग्य शब्द से उत्पन्न ज्ञान को शब्द प्रमा और कारण भूत शब्द को प्रमाण कहते हैं। ईश्वरकृष्ण 'आप्तश्रुतिराप्तवचनं' के रूप में शब्द प्रमाण को स्पष्ट करते हैं। यहाँ श्रुति को वाचस्पति मिश्र 'वाक्यजनितं वाक्यार्थज्ञानम्' कहते हैं और इसे (श्रुति प्रमाण को) स्वत: प्रमाण कहते हैं। यह स्वत: या स्वतंत्र प्रमाण 'अपौरुषेयवेद वाक्यजनितत्वेन सकलदोषाशंका विनिर्मुक्तेत्युक्तं*' होता है। न केवल सकल दोषाशंका रहित होने से अपौरुषेय वेद वाक्य जनित ज्ञान स्वत: प्रमाण होता है अपितु वेदमूलक स्मृति, इतिहास पुराणादि के वाक्य भी शब्द प्रमाण होते हैं। शब्द प्रमाण की यह स्वत: प्रमाणता शब्द की अपना ज्ञान कराने की शक्ति के कारण हैं।

सांख्य दर्शन में तीन की प्रमाण माने गए हैं, क्योंकि सांख्यों के अनुसार समस्त प्रमेयों का ज्ञान इन तीन प्रमाणों से हो जाता है। अन्य कथित प्रमाणों का भी विलय इन्हीं के अन्तर्गत हो जाता है। अब एक प्रश्न यह उठता है कि व्यक्ताव्यक्तज्ञ अर्थात व्यक्त जगत के पदार्थों का स्थूल से सूक्ष्म की ओर क्रम से प्रत्यक्ष और अनुमान से ज्ञान होता है, प्रकृति पुरुष विवेक भी सामान्यतोदृष्ट अनुमान प्रमाणगम्य माना गया है। तब शब्द, आप्तोपदेश या वेद या श्रुति प्रमाण के लिए प्रमेय ही क्या शेष रहा?

सदसत्ख्यातिवाद

भारतीय दर्शन में ख्यातिवाद भ्रम संबंधी मत के लिए प्रचलित हो गया है। भ्रम के स्वरूप के वर्णन भेद से ख्याति भेद भी हैं। भ्रम के एक उदाहरण के माध्यम से विभिन्न ख्याति संबंधी मतों के भेद को स्पष्ट किया जा सकता है। रज्जु-सर्प-भ्रम का दृष्टान्त भारतीय दर्शन में बहुत प्रचलित है। किसी स्थान पर पड़े हुए रज्जु को सर्प समझ लेना भ्रम है। ऐसा क्यों होता है कैसे होता है- इन प्रश्नों का उत्तर निम्नलिखित रूप में दिया जा सकता है-

  1. भ्रमस्थल पर सर्प नहीं है फिर भी प्रतीत हो रहा है यह असत सर्प है।
  2. कहीं न कहीं तो सर्प है सत है जिसकी प्रतीति हो रही है।
  3. भ्रमस्थल पर स्थिति रज्जु अन्यथा (सर्प) प्रतीत हो रही है।
  4. भ्रमस्थल पर सर्प न तो सत है न असत है अत: अनिवर्चनीय सर्प की प्रतीति हो रही है।
  5. प्रतीति सत और असत दोनों है।

सांख्य दर्शन सत्कार्यवादी है अत: उसके अनुसार असत की प्रतीति हो नहीं सकती है, अत: भ्रमस्थल पर 'असत सर्प है' कहना मान्य नहीं होगा। साथ ही बाध हो जाने पर वह सत भी नहीं है। सत और असत है और नहीं है एक साथ संभव नहीं है और वस्तु के बारे में इनके अतिरिक्त अन्य कुछ कहा भी नहीं जा सकता है। अत: अनिवर्चनीय सर्प की कल्पना भी नहीं की जा सकती। भ्रमस्थल पर जो वस्तु पड़ी है उसके स्थान पर अन्य वस्तु है कहना आत्मविरोधी स्थिति होगी। यह रज्जु है, यह ज्ञान भ्रमस्थाल पर होता है अत: भ्रमस्थल सर्प या ऐसा नहीं कहा जा सकता अत: सांख्य मत में सत और असत दोनों का एक साथ मानना ही संभव प्रतीत होता है।

प्रमेय मीमांसा

प्रमेयों के बारे में विचार करने से पूर्व सत्कार्यवाद पर चर्चा अपेक्षित है। सभी दर्शन-सम्प्रदाय प्राय: सृष्टि को कार्य या परिणाम के रूप में ग्रहण करते हैं और इसके मूल कारण की खोज करते हैं। मूल कारण की खोज करने से पूर्व एक तथ्य विश्वास के रूप में होना अनिवार्य है। कारण की खोज करने से पूर्व कारण का अस्तित्व है, ऐसा विश्वास यदि न हो तो कारण की खोज निरर्थक होगी। कारण के अस्तित्व का यह विश्वास प्रत्यक्ष पर आधृत अनुमान का ही रूप है। मृत्तिका से घट तथा तिल से तेल का उत्पन्न होना प्रत्यक्ष सिद्ध है। यदि कुछ उत्पन्न हुआ है तो उत्पन्न होने से पूर्व उसकी कोई अवस्था अवश्य रहनी चाहिए। जिस तरह 'घट' बनने से पूर्व 'मृत्तिका' घट की पूर्वावस्था होती है, उसी तरह हर कार्य की उत्पत्ति किसी न किसी कारण से ही होनी चाहिए। यदि कार्य नहीं है या असत है तो उसकी उत्पत्ति की चर्चा भी निरर्थक होगी। अत: कार्य के सत होने या मानने पर ही कारण चर्चा या उत्पत्ति चर्चा का औचित्य है। सृष्टि के स्वरूप, लक्षण, धर्म आदि की चर्चा अवश्य की जा सकती है। भगवान कपिल कहते हैं- नासदुत्पादो नृश्रृंगवत्*। मनुष्य के सींग के समान असत वस्तु की उत्पत्ति नहीं होती। सांख्य दर्शन के सत्कार्यवाद का यही आधार है। सत्कार्यवाद के सिद्धान्त को सिद्ध करने के लिए अन्य चार हेतु सूत्रकार ने प्रस्तुत किया है-

उपादाननियमात्, सर्वत्र सर्वदा सर्वासम्भवात्।
शक्तस्य शक्यकरणात् तथा कारणभावात्।*

प्रत्येक कार्य का उपादान नियम होने से, सर्वत्र, हमेशा किसी भी एक कारण से सभी कार्यो की उत्पत्ति न होने से, विशेष शक्ति से सम्पन्न कारण ही विशेष कार्य को उत्पन्न करने में सक्षम होने से तथा कार्य का कारण भावात्मक होने से सत्कार्यवाद की सिद्धि होती है। कार्य यदि है तो वह कभी असत नहीं हो सकता। अत: कार्य सत है। साथ ही कार्य अपनी उत्पत्ति से पूर्व किसी रूप में या अवस्था में असत है तब भी कार्य की उत्पत्ति नहीं हो सकती। अत: कार्य कारण रूप में भी पूर्व से ही सत्तावान है। मृत्तिका से घट उत्पन्न होता है, लेकिन घट की उत्पत्ति जल से नहीं होती। फिर मृत्तिका के अभाव में कुंभकार घट निर्माण भी नहीं कर सकता। अत: घट की उत्पत्ति के लिए उपादान जो घट में परिणत हो सके-होना आवश्यक तो है साथ ही, पद आदि अन्य कार्यों के लिए पृथक्-पृथक् उपादान की व्यवस्था है, इसीलिए यह भी लोकप्रसिद्ध है कि सभी कारणों से सभी कार्य हमेशा उत्पन्न नहीं होते हैं। कार्य उत्पन्न करने की विशेष क्षमता होने पर ही विशेष कार्य सम्पन्न होते हैं। यद्यपि मृत्तिका से घट उत्पन्न करने की विशेष क्षमता होने पर ही विशेष कार्य सम्पन्न होते हैं। यद्यपि मृत्तिका से घट उत्पन्न होता है तथापि पथरीली सूखी मिट्टी घट रूप में परिणत नहीं की जा सकती। मृत्तिका को एक विशेष रूप से साफ करके गीला करने पर ही 'घट' निर्माण होगा। घट बन जाने के बाद मृत्तिका का नाश नहीं हो जाता। मृत्तिका ही घट रूप में परिणत होती है। अत: कार्य में कारण के गुण भी विद्यमान रहते हैं ऐसा मानना होगा। इन सभी प्रत्यक्ष तथ्यों से यह सिद्ध होता है कि कार्य उत्पत्ति की शर्तों तथा कारण-कार्य सम्बन्ध के स्वरूप के आधार पर कार्य सत है ऐसा सिद्ध होता है।

इसीलिए सांख्यदर्शन में प्रत्यक्ष के विषयों के कारणों की खोज में कार्य के आधार पर न केवल कारण का अनुमान करते हैं वरन कारण के लक्षणों या धर्मो का अनुमान करते हैं। समस्त प्रमेयों को सांख्य दर्शन में व्यक्त प्रकट अव्यक्त अप्रकट तथा 'ज्ञ' इन तीन वर्गों में बांटा गया है। फिर व्यक्त तथा अव्यक्त में साधर्म्य की चर्चा करते हुए पुरुष के साथ उनका साधर्म्य-वैधर्म्य भी बताया गया। प्रकट व्यक्त अप्रकट अव्यक्त तथा 'ज्ञ' रूप में प्रमेयों का वर्गीकरण प्रमाणों की ओर भी संकेत करता है। प्रत्यक्ष के द्वारा व्यक्त, अनुमान के द्वारा अव्यक्त, तथा 'ज्ञ' या क्षेत्रज्ञ (हमारे मत में सर्वज्ञ परमात्मा भी) का ज्ञान शब्दप्रमाण द्वारा होता है। प्राय: विद्वान अव्यक्त तथा व्यक्त पदों को सर्वत्र प्रकृति और उसके कार्य के ही अर्थ में ग्रहण करते हैं। क्योंकि अव्यक्त को पारिभाषिक शब्द समझा जाता है प्रकृति के अर्थ में। यह जानना रोचक होगा कि सम्पूर्ण सांख्य सूत्र ग्रन्थ में केवल एक बार ही इस शब्द का प्रयोग हुआ है।* प्रधान और प्रकृति का प्रयोग अनेकश: हुआ है। जिस सूत्र में अव्यक्त शब्द का प्रयोग हुआ है वहां यह नपुसंकलिंगी प्रयोग है जिसका अर्थ अप्रकट है। वहां कहा गया है (त्रिगुणात्मक लिंग जो कि प्रथम व्यक्ततत्व है) से अव्यक्त (अप्रकट कारण) का अनुमान होता है। इससे पूर्व सूत्र में कहा है- 'कार्यात् कारणानुमानं तत्साहित्यम्*' इससे अव्यक्त का अप्रकट अथवा कारण अर्थ ही स्पष्ट होता है। 'त्रिगुणात्' पद अव्यक्त रूप कारण को प्रकृति के अर्थ में ग्रहण कराने के लिए है। सांख्यकारिका में 'अव्यक्तम्' शब्द का प्रयोग 5 स्थानों पर हुआ है। जिनमें से दूसरी दसवी तथा चौदहवीं कारिका में अप्रकट के ही अर्थ में हुआ है। सोलहवीं कारिका में 'त्रिगुणत:' शब्द के प्रयोग से अप्रकट प्रकृति के अर्थ में, अठावनवीं कारिका में 'पुरुषस्य विमोक्षार्थ' होने से अप्रकट प्रकृति के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। अभिप्राय यह है कि सूत्र/कारिका में प्रयुक्त अव्यक्त पद अप्रकट के अर्थ में हुआ है। प्रकृति के लिए इसका प्रयोग त्रिगुणसाम्यावस्था के अर्थ में किया गया है।

उपर्युक्त उल्लेख का आशय यह बताना मात्र है कि जहां भी अव्यक्त शब्द दिखे, उसे सीधे प्रकृति के अर्थ में ग्रहण न कर, अप्रकट के अर्थ में ग्रहण करने पर कारिका दर्शन की ऐसी व्याख्या संभव है जो महाभारत, गीता आदि में वर्णित सांख्य दर्शन के अनुरूप हो। साथ ही सांख्य तत्त्वों या प्रमेयों का उनके इष्ट प्रमाणों से सीधे संगति भी स्पष्ट हो सके। प्रत्यक्ष केवल व्यक्त का होता है यद्यपि व्यक्त केवल प्रत्यक्ष तक सीमित नहीं है; अव्यक्त तो अनुमान का विषय है ही। इसीलिए समस्त प्रमेयों को व्यक्त-अव्यक्त दो वर्गों में बांटा गया। इनके लक्षण इस प्रकार बताए गए हैं*-

ऐसा प्रतीत होता है कि इन दोनों व्याख्याकारों को पुरुष की एकता और बहुत्व में कोई असंगति नहीं प्रतीत हुई होगी। ऐसा दो कारणों से हो सकता है। एक तो यह कि एकत्व से इनका अभिप्राय प्रत्येक पुरुष के अनेक जन्मों में एक बना रहना या फिर पुरुष की दो अवस्थाएँ या दो प्रकार के पुरुष तत्व को ये सांख्यसम्मत समझते हों। पहले अर्थ में शाब्दिक खींचतान ही अधिक प्रतीत होता है। जबकि दूसरे अर्थ को स्वीकार करने पर सांख्यदर्शन का रूप वेदान्त सदृश ही हो जाता है कि अव्यक्तावस्था में पुरुष एक रहता है। और व्यक्तावस्था में अनेक रूप प्रतीत होने लगता है*

मूलप्रकृतिरविकृतिमर्हदाद्या: प्रकृतिविकृतय: सप्त।
षोडषकस्तु विकारो ने प्रकृतिर्न विकृति: पुरुष:॥*
अष्टौ प्रकृतय: ॥ षोडषविकारा: ॥ पुरुष: ॥*

सत्व, रजत् तथा तमस की साम्यावस्था प्रकृति है, महत, अहंकार, पञ्चन्मात्राएँ, एकादशेन्द्रिय, पंचस्थूलभूत तथा पुरुष ये सांख्यसम्मत पच्चीस तत्त्व हैं। प्रकृति-पुरुष-विवेक (भेद) कहें या व्यक्तकव्यक्तज्ञ कहें-इनमें ये पच्चीस तत्त्व ही प्रमेय कहे गए हैं। त्रिगुण की साम्यावस्था प्रकृति है- ऐसा सांख्यकारिका में उल्लेख नहीं मिलता। संभवत: कारिका- रचना से पूर्व तक प्रकृति की अव्यक्त रूप 'गुणसाम्य' के रूप में प्रसिद्धि हो जाने के कारण कारिकाकार को ऐसा कहने की आवश्यकता नहीं रही होगी। यद्यपि मूलप्रकृति के लिए अविकृति पद के प्रयोग में यह अर्थ भी निहित है। 'महाभारत' के प्रकृति विषयक उल्लेखों में तथा 'तत्त्वसमाससूत्र' में अष्टप्रकृति की मान्यता का पता चलता है। कारिका में मूलप्रकृति के साथ सात और तत्त्वों को विकृति के साथ-साथ प्रकृति कहकर मान्यता के साथ सामजस्य रखा गया है। षोडश विकारों के समूह का उल्लेख तत्त्वसमाससूत्र, महाभारत आदि तथा सांख्यकारिका में उपलब्ध है। पुरुष न तो प्रकृति (कारण) है न विकृति (कार्य) अब इन तत्त्वों का परिचय दिया जा रहा है।

प्रकृति

गुण

प्रकृति त्रिगुणात्मक कही गई है। यदि गुणों में परस्पर एकरूपता और साधर्म्य हो तो विषम सृष्टि संभव नहीं होगी, कार्य के कारण गुणात्मक होने से। लेकिन विषम सृष्टि तो प्रत्यक्ष सिद्ध है। अत: कारणभूत गुणों में भी वैषम्य अनुमित है। इसलिए इस वैषम्य या वैधर्म्य का निरूपण करते हुए ईश्वरकृष्ण कहते हैं-

प्रीत्यप्रीतिविषादात्मका: प्रकाशप्रवृलिनियमार्था:।
अन्योन्याभिभमवाश्रयजननमिथुनवृत्तयश्च गुणा:॥ -(कारिका-12)

सम्मोहकं तमो विद्यात् कृष्णमज्ञानसम्भवम्।
प्रीतिदु:खनिबन्द्धाश्च समस्तांस्त्रीनथो गुणान्॥21॥
सत्त्वस्य रजसश्चैव तमसश्च निबोध तान्।
प्रसादो हर्षजाप्रीतिरसंदेहो धृति: स्मृति:॥
एतान् सत्त्वगुणान् विद्यादिमान् राजसतामसान्॥22॥
कामक्रोधौ प्रमादश्च लोभमोहौ भयं क्लम:।
विषादशोकावरतिर्मानदर्पावनार्यता ॥23॥
प्रर्वत्तमानं रजस्तद्भावेनानुवर्तते।
प्रहर्ष: प्रीतिरानन्द: सुखं सशान्तचिलता॥25॥
कथंचिदुपपद्यन्ते पुरुषे सात्त्विका गुणा:।
परिदाहस्तथा शोक: संतापो पूतिरक्षमा॥26॥
लिंगानि रजस स्तानि दृश्यन्ते हेत्वहेतुभि:।
अविद्यारागमोहौ च प्रमाद: स्तब्धता भयम्॥27॥
असमृद्धिस्तथा दैन्यं प्रमोह: स्वप्नतन्द्रिता।
कथंचिदुपवर्तन्ते विविधास्तामता गुणा:॥28॥

प्रकृति के विकार

महत या बुद्धि

पृथग्भूतौ प्रकृत्या तौ सम्प्रयुक्तौ च सर्वदा।
यथा मत्स्योऽद्भिरन्य: स्यात् सम्प्रयुक्तौ तथैव तौ

अहंकार

पंचतन्मात्र

पुरुष


मोक्ष मीमांसा

  1. आध्यात्मिक,
  2. आधिदैविक तथा
  3. आधिभौतिक।
  1. शरीरिक तथा
  2. मानसिक* वात, पित्त, कफ की विषमता से उत्पन्न दु:ख शारीरिक दु:ख है।*

तत्र जरामरणकृतं दुखं प्राप्नोति चेतन: पुरुष:।
लिंगस्याविनिवृत्तेस्तस्माद् दुखं स्वभावेन॥*

मोक्ष अपवर्ग या कैवल्य-प्राप्ति

सांख्य मत में मोक्ष, अपवर्ग और कैवल्य दु:ख निवृत्ति रूप ही है। जब पुरुष को यह ज्ञान हो जाता है कि दु:ख तो रजोगुण का धर्म है और प्रकृति त्रिगुणात्मिका है अत: प्रकृति के विकारों में दु:ख तो रहेगा ही। तब वह यह भी जान लेता है कि वह (पुरुष) न सृष्टिकर्ता (गुणकर्ता) है, न वह स्वयं गुण स्वरूप है और न ही त्रिगुण उसके हैं* तब वह प्रकृति और उसके विकारों का तटस्थ द्रष्टा होकर रह जाता है। यही मोक्ष है। प्रारब्धवश जब तक शरीर है तब तक वह संसार में रहता है। (शरीरपात) प्रारब्धक्षय के उपरान्त उसे आत्यन्तिक और ऐकान्तिक मुक्ति की प्राप्ति हो जाती है। पुरुष के भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजन (पुरुषार्थ) की सिद्धि हो जाने पर प्रकृति उससे उपरमित हो जाती है।

बन्ध-मोक्ष पुरुष का ही

सांख्य दर्शन में ईश्वरवाद

सांख्य कारिका के भाष्यों के आधार पर विद्वानों की यह धारणा बन गई है कि सांख्य दर्शन निरीश्वरवादी ही है। यद्यपि कारिका पूर्वदर्शन या प्राचीन सांख्य को महाभारत आदि ग्रन्थों के आधार पर ईश्वरवादी या परमात्मवादी मान लेने में विद्वानों को आपत्ति नहीं होती, तथापि प्रामाणिक दर्शन शास्त्र के रूप में इसे निरीश्वरवादी ही माना जाता है। ऐसा इसलिए कि आधुनिक विद्वान सांख्यकारिका को ही सांख्य दर्शन की उपलब्ध प्राचीनत रचना मानते हैं और उपलब्ध भाष्य, टीका, वृत्ति आदि में कहीं भी ईश्वर (परमात्मा) का निरुपण प्राप्त नहीं होता। सांख्य दर्शन के बारे में सूचित करने वाले प्राचीन ग्रन्थों में अर्हिबुध्न्यसंहिता, महाभारत, भगवद्गीता, कतिपय उपनिषदों आदि में सांख्यदर्शन परमात्मवादी ही प्रतीत होता है। इसे वहां कपिल प्रणीत दर्शन ही माना गया है। लेकिन सांख्यग्रन्थ रूप में मान्य सांख्यसूत्र तथा सांख्यकारिका में भाष्यकारों के मतानुसार परमात्मा की सत्ता स्वीकृत न होने से आधुनिक विद्वानों ने सांख्यदर्शन को विकास के तीन चरणों में विभाजित किया है। तदनुसार प्राचीन सांख्य ईश्वरवादी था। द्वितीय चरण में वह निरीश्वरवादी हो गया जिसके अन्तर्गत सूत्र-कारिका सम्मिलित है तथा तृतीय चरण में विज्ञानभिक्षु ने सांख्य को पुन: प्राचीन रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया, तथापि सांख्य ग्रन्थों में ईश्वर-प्रतिषेध है- ऐसा वे भी स्वीकार करते हैं। इसीलिए वे इस अंश में सांख्यदर्शन को दुर्बल मानते हैं। उनका मत है कि सांख्यदर्शन में प्रौढिवादी से व्यावहारिक ईश्वर का ही प्रतिषेध है।* अत: यद्यपि विज्ञानभिक्षु को ईश्वरवादी माने जाने पर भी विज्ञानभिक्षु सांख्य सूत्र में ईश्वर का खण्डन किया जाना स्वीकार करते हैं। लेकिन उनके अनुसार यह खण्डन ईश्वर का खण्डन न होकर एक देशीयों के प्रौढिवादी से किया गया खण्डन है। अन्यथा 'ईश्वर सिद्धि' के स्थान पर 'ईश्वराभावात्' सूत्र होता।*

'सांख्य वदन्ति। ईश्वर: कारणं न भवति। कस्मात्? निर्गुणत्वात्।
इमा: सगुणा: प्रजा:। सत्त्वरजस्तमांसि त्रयो गुणा:। प्रकृतेरिमा:
समुत्पन्न: प्रजा:। यदीश्वरं कारणं स्यात्ततो निर्गुणादीश्वरा-
र्त्रिर्गुणा एव प्रजा:। न चैवम्। तस्मादीश्वर: कारणं न भवति।*

'प्रकृतिपुरुषौ द्वौ च तत्त्वमिति कपिलमते नास्त्येव श्रुतिविसंवाद:
पुरुष एक: सनातन: स निर्विशेष: चितिरूप:.............
पुमान् अविविक्त संसारभुक् संसारपालकश्चेति द्विकोटिस्थो वर्तते।
संसारभुजो वयं, तत्पालका: ब्रह्मरुद्रेन्द्रादय:। विविक्त:
परम: पुमानेक एव। स आदौ सर्गमूलनिर्वाहाय ज्ञानेन विविक्तोऽपि
इच्छया अविविक्तो भवति। स एव नारायणादिशब्दैरुच्यते।

सांख्य दर्शन समाधान

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