सुवर्णसप्तति शास्त्र

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#पंचतन्मात्ररूपं सूक्ष्मशरीरं त्रयोदशविधकरणैर्युक्त-त्रिविधलोकसर्गान् संसरति।  
 
#पंचतन्मात्ररूपं सूक्ष्मशरीरं त्रयोदशविधकरणैर्युक्त-त्रिविधलोकसर्गान् संसरति।  
 
*सभी उद्धरणों में त्रयोदश करणों के साथ सूक्ष्म शरीर के संसरण की बात कहीं गई है। अत: त्रयोदश करण तथा सूक्ष्म शरीर का पार्थक्य-स्वीकृति स्पष्ट है। चौथे उद्धरण में तो स्पष्टत: 'पंचतन्मात्ररूपं सूक्ष्मशरीरं' कहा गया है। हां एक बात अवश्य विचारणीय है, जिसकी चर्चा शास्त्री जी ने की है कि 'यदि व्याख्याकार सूक्ष्म शरीर में केवल सात तत्त्वों को मानता तो उसका यह-एकादश इन्द्रियों के साथ बुद्धि और अहंकार को जोड़कर त्रयोदश करण का सूक्ष्म शरीर के साथ निदेश करना सर्वथा असंगत हो जाता है<balloon title="सां.द.इ. पृष्ठ 391" style=color:blue>*</balloon>'।
 
*सभी उद्धरणों में त्रयोदश करणों के साथ सूक्ष्म शरीर के संसरण की बात कहीं गई है। अत: त्रयोदश करण तथा सूक्ष्म शरीर का पार्थक्य-स्वीकृति स्पष्ट है। चौथे उद्धरण में तो स्पष्टत: 'पंचतन्मात्ररूपं सूक्ष्मशरीरं' कहा गया है। हां एक बात अवश्य विचारणीय है, जिसकी चर्चा शास्त्री जी ने की है कि 'यदि व्याख्याकार सूक्ष्म शरीर में केवल सात तत्त्वों को मानता तो उसका यह-एकादश इन्द्रियों के साथ बुद्धि और अहंकार को जोड़कर त्रयोदश करण का सूक्ष्म शरीर के साथ निदेश करना सर्वथा असंगत हो जाता है<balloon title="सां.द.इ. पृष्ठ 391" style=color:blue>*</balloon>'।
*यहां यह कहा जा सकता है कि टीकाकार ने चूंकि कारिकाकार का आशय इसी रूप में समझा है अत: उसने सूक्ष्म शरीर को सप्ततत्त्वात्मक ही कहा और संसरण हेतु एकादशेन्द्रिय की अनिवार्यता को स्वीकार किया।<ref>टीकाकार का यह मन्तव्य स्वयं उदयवीर शास्त्री द्वारा प्रस्तुत उद्धरण में भी स्पष्ट हो जाता है- 'तत्सूक्ष्मशरीरमेकादशेन्द्रियसंयुक्तं' में एकादशेन्द्रिय का सूक्ष्म शरीर से पृथक निर्देश टीकाकार के इस आग्रह की पुष्टि करता है कि सूक्ष्म शरीर सात तत्त्वों का है। सूक्ष्म शब्द यहां शरीर नाम का नहीं अपि तु सूक्ष्मता का बोधक है।</ref> लेकिन कारण के रूप में 'त्रयोदशकरण' के मानने का कारिकाकार का स्पष्ट मत देख कर उसका वैसा ही उल्लेख किया।  
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*यहां यह कहा जा सकता है कि टीकाकार ने चूंकि कारिकाकार का आशय इसी रूप में समझा है अत: उसने सूक्ष्म शरीर को सप्ततत्त्वात्मक ही कहा और संसरण हेतु एकादशेन्द्रिय की अनिवार्यता को स्वीकार किया।<ref>टीकाकार का यह मन्तव्य स्वयं उदयवीर शास्त्री द्वारा प्रस्तुत उद्धरण में भी स्पष्ट हो जाता है- 'तत्सूक्ष्मशरीरमेकादशेन्द्रियसंयुक्तं' में एकादशेन्द्रिय का सूक्ष्म शरीर से पृथक् निर्देश टीकाकार के इस आग्रह की पुष्टि करता है कि सूक्ष्म शरीर सात तत्त्वों का है। सूक्ष्म शब्द यहां शरीर नाम का नहीं अपि तु सूक्ष्मता का बोधक है।</ref> लेकिन कारण के रूप में 'त्रयोदशकरण' के मानने का कारिकाकार का स्पष्ट मत देख कर उसका वैसा ही उल्लेख किया।  
 
*यह भी कहा जा सकता है कि बुद्धि और अहंकार कारण तभी कहे जा सकते हैं जब भोग शरीर या संसरण शरीर उपस्थित हो। अत: संसरण के प्रसंग में त्रयोदशकरण कहना और सूक्ष्म (लिंग) शरीर के रूप में बुद्धि और अहंकार को कारण न मानकर मात्र तत्त्व मानना असंगत नहीं है। अथवा यदि यह असंगत है भी तो इसे असंगत कहना ही पर्याप्त है। व्याख्याकार पर अन्य मत का आरोपण संगत नहीं कहा जाएगा।  
 
*यह भी कहा जा सकता है कि बुद्धि और अहंकार कारण तभी कहे जा सकते हैं जब भोग शरीर या संसरण शरीर उपस्थित हो। अत: संसरण के प्रसंग में त्रयोदशकरण कहना और सूक्ष्म (लिंग) शरीर के रूप में बुद्धि और अहंकार को कारण न मानकर मात्र तत्त्व मानना असंगत नहीं है। अथवा यदि यह असंगत है भी तो इसे असंगत कहना ही पर्याप्त है। व्याख्याकार पर अन्य मत का आरोपण संगत नहीं कहा जाएगा।  
  

08:41, 21 फ़रवरी 2010 का संस्करण

सुवर्णसप्तति शास्त्र

  1. त्रयोदशविधकरणै: सूक्ष्मशरीरं संसारयति
  2. तस्मात् सूक्ष्मशरीरं विहाय, त्रयोदशकं न स्थातुं क्षमते॥
  3. इदं सूक्ष्मशरीरं त्रयोदशकेन सह ... संसरति
  4. पंचतन्मात्ररूपं सूक्ष्मशरीरं त्रयोदशविधकरणैर्युक्त-त्रिविधलोकसर्गान् संसरति।

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