सुवर्णसप्तति शास्त्र

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==सुवर्णसप्तति शास्त्र==
 
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*यह बौद्ध भिक्षु परमार्थ द्वारा 550 ई.-569 ई. के मध्य चीनी भाषा में अनुवादित सांख्यकारिका का भाष्य है। किस भाष्य का यह चीनी अनुवाद है- इस पर कुछ विवाद है।  
 
*यह बौद्ध भिक्षु परमार्थ द्वारा 550 ई.-569 ई. के मध्य चीनी भाषा में अनुवादित सांख्यकारिका का भाष्य है। किस भाष्य का यह चीनी अनुवाद है- इस पर कुछ विवाद है।  
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*यह भी कहा जा सकता है कि बुद्धि और अहंकार कारण तभी कहे जा सकते हैं जब भोग शरीर या संसरण शरीर उपस्थित हो। अत: संसरण के प्रसंग में त्रयोदशकरण कहना और सूक्ष्म (लिंग) शरीर के रूप में बुद्धि और अहंकार को कारण न मानकर मात्र तत्त्व मानना असंगत नहीं है। अथवा यदि यह असंगत है भी तो इसे असंगत कहना ही पर्याप्त है। व्याख्याकार पर अन्य मत का आरोपण संगत नहीं कहा जाएगा।  
 
*यह भी कहा जा सकता है कि बुद्धि और अहंकार कारण तभी कहे जा सकते हैं जब भोग शरीर या संसरण शरीर उपस्थित हो। अत: संसरण के प्रसंग में त्रयोदशकरण कहना और सूक्ष्म (लिंग) शरीर के रूप में बुद्धि और अहंकार को कारण न मानकर मात्र तत्त्व मानना असंगत नहीं है। अथवा यदि यह असंगत है भी तो इसे असंगत कहना ही पर्याप्त है। व्याख्याकार पर अन्य मत का आरोपण संगत नहीं कहा जाएगा।  
  
 
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07:16, 9 जुलाई 2010 का संस्करण

सुवर्णसप्तति शास्त्र

  1. त्रयोदशविधकरणै: सूक्ष्मशरीरं संसारयति
  2. तस्मात् सूक्ष्मशरीरं विहाय, त्रयोदशकं न स्थातुं क्षमते॥
  3. इदं सूक्ष्मशरीरं त्रयोदशकेन सह ... संसरति
  4. पंचतन्मात्ररूपं सूक्ष्मशरीरं त्रयोदशविधकरणैर्युक्त-त्रिविधलोकसर्गान् संसरति।

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