सूरजमल के निर्माणकार्य

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सूरजमल के निर्माणकार्य

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दिल्ली और आगरा के श्रेष्ठ मिस्तरी, झुंड बनाकर बदनसिंह और सूरजमल के दरबारों में रोज़गार ढूँढ़ने आते थे। इन दोनों ने ही अपने विपुल एवं नव-अर्जित धन का उपयोग कलाकृतियों के सृजन के लिए किया। भरतपुर राज्य में सुव्यवस्था और जीवन तथा सम्पत्ति की सुरक्षा थी, जो अन्यत्र दुर्लभ थीं, और जिसके लिए लोग तरसते थे। इसके विपरीत, दिल्ली और आगरा में अशान्ति और अव्यवस्था थी। इस समय बदनसिंह के पास जन, धन और साधन-सभी कुछ था। अपने भवन-निर्माण-कार्यक्रम के लिए उसने जीवनराम बनचारी को अपना निर्माण-मन्त्री नियुक्त किया। बनचारी बहुत योग्य और सुरूचि सम्पन्न व्यक्ति था। अपने लिए उसने एक बड़ा लाल पत्थर का मकान बनवाया था, जो आजकल स्थानीय चिकित्सा अधिकारियों के क़ब्ज़े में है।

डीग का मुख्य महल

भरतपुर का क़िला

इस क़िले को बनाने का काम सन् 1732 में आरम्भ हुआ। सैकड़ों ब्राह्मणों को भोजन कराया गया; गोवर्धन में श्री गिरिराज महाराज से आशीर्वाद लिया गया। लगभग एक पूरा सप्ताह तो पूजा ही में लग गया होगा। एक बार शुरू हो जाने के बाद निर्माण-कार्य साठ वर्ष तक रूका ही नहीं। मुख्य क़िलेबन्दियाँ आठ वर्षों में पूरी हो गई; इनमें दो खाइयाँ भी सम्मिलित थीं– एक तो शहर की बाहरवाली चारदीवारी के पास थी और दूसरी कम चौड़ी, पर ज़्यादा गहरी खाई क़िले को घेरे हुए हुई थी। बाढ़ के पानी को रोकने और अकाल के समय सहायता पहुँचाने के लिए दो बाँध और जलाशय (ताल) बनाए गये। यहाँ बहुधा अकाल पड़ते रहते थे और यही हाल मलेरिया, चेचक, हैजा, तथा अन्य अनेक बीमारियों का था। विस्तार का कार्य सूरजमल के पौत्र के प्रपौत्र महाराज जसवन्तसिंह (सन 1853-93) के राज्य-काल तक चलता रहा।

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