हरिदास

Nayati
ब्रज डिस्कवरी, एक मुक्त ज्ञानकोष से
(स्वामी हरिदास से भेजा गया)
यहां जाएं: भ्रमण, खोज

स्वामी हरिदास जी / Swami Haridasa

अकबर, तानसेन और हरिदास
Akbar, Tansen and Haridas

परिचय

श्री बांकेबिहारीजी महाराज को वृन्दावन में प्रकट करने वाले स्वामी हरिदासजी का जन्म विक्रम सम्वत् 1535 में भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी (श्री राधाष्टमी) के ब्रह्म मुहूर्त में हुआ था। आपके पिता श्री आशुधीर जी अपने उपास्य श्रीराधा-माधव की प्रेरणा से पत्नी गंगादेवी के साथ अनेक तीर्थो की यात्रा करने के पश्चात अलीगढ जनपद की कोल तहसील में ब्रज आकर एक गांव में बस गए। श्री हरिदास जी का व्यक्तित्व बड़ा ही विलक्षण था। वे बचपन से ही एकान्त-प्रिय थे। उन्हें अनासक्त भाव से भगवद्-भजन में लीन रहने से बड़ा आनंद मिलता था। श्री हरिदासजी का कण्ठ बड़ा मधुर था और उनमें संगीत की अपूर्व प्रतिभा थी। धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। उनका गांव उनके नाम से विख्यात हो गया। हरिदास जी को उनके पिता ने यज्ञोपवीत-संस्कार के उपरान्त वैष्णवी दीक्षा प्रदान की। युवा होने पर माता-पिता ने उनका विवाह हरिमति नामक परम सौंदर्यमयी एवं सद्गुणी कन्या से कर दिया, किंतु स्वामी हरिदास जी की आसक्ति तो अपने श्यामा-कुंजबिहारी के अतिरिक्त अन्य किसी में थी ही नहीं। उन्हें गृहस्थ जीवन से विमुख देखकर उनकी पतिव्रता पत्नी ने उनकी साधना में विघ्न उपस्थित न करने के उद्देश्य से योगाग्नि के माध्यम से अपना शरीर त्याग दिया और उनका तेज स्वामी हरिदास के चरणों में लीन हो गया।


विषय सूची

विक्रम सम्वत् 1560 में पच्चीस वर्ष की अवस्था में श्री हरिदास वृन्दावन पहुंचे। वहां उन्होंने निधिवन को अपनी तपोस्थली बनाया। हरिदास जी निधिवन में सदा श्यामा-कुंजबिहारी के ध्यान तथा उनके भजन में तल्लीन रहते थे। स्वामीजी ने प्रिया-प्रियतम की युगल छवि श्री बांकेबिहारीजी महाराज के रूप में प्रतिष्ठित की। हरिदासजी के ये ठाकुर आज असंख्य भक्तों के इष्टदेव हैं। वैष्णव स्वामी हरिदास को श्रीराधा का अवतार मानते हैं। श्यामा-कुंजबिहारी के नित्य विहार का मुख्य आधार संगीत है। उनके रास-विलास से अनेक राग-रागनियां उत्पन्न होती हैं। ललिता संगीत की अधिष्ठात्री मानी गई हैं। ललितावतार स्वामी हरिदास संगीत के परम आचार्य थे। उनका संगीत उनके अपने आराध्य की उपासना को समर्पित था, किसी राजा-महाराजा को नहीं। बैजूबावरा और तानसेन जैसे विश्व-विख्यात संगीतज्ञ स्वामी जी के शिष्य थे। मुग़ल सम्राट अकबर उनका संगीत सुनने के लिए रूप बदलकर वृन्दावन आया था। विक्रम सम्वत 1630 में स्वामी हरिदास का निकुंजवास निधिवन में हुआ।

सखी-सम्प्रदाय

स्वामी जी ने एक नवीन पंथ सखी-सम्प्रदाय का प्रवर्तन किया। उनके द्वारा निकुंजोपासना के रूप में श्यामा-कुंजबिहारी की उपासना-सेवा की पद्धति विकसित हुई, यह बडी विलक्षण है। निकुंजोपासना में जो सखी-भाव है, वह गोपी-भाव नहीं है। निकुंज-उपासक प्रभु से अपने लिए कुछ भी नहीं चाहता, बल्कि उसके समस्त कार्य अपने आराध्य को सुख प्रदान करने हेतु होते हैं। श्री निकुंजविहारी की प्रसन्नता और संतुष्टि उसके लिए सर्वोपरि होती है। राधाष्टमी के पावन पर्व में स्वामी हरिदास का पाटोत्सव (जन्मोत्सव) वृन्दावन में बड़े धूमधाम के साथ मनाया जाता है। सायंकाल मंदिर से चाव की सवारी निधिवन में स्थित उनकी समाधि पर जाती है। ऐसा माना जाता है कि ललितावतार स्वामी हरिदास की जयंती पर उनके लाडिले ठाकुर बिहारीजी महाराज उन्हें बधाई देने श्रीनिधिवन पधारते हैं। देश के सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ निधिवन में स्वामीजी की समाधि के समक्ष अपना संगीत प्रस्तुत करके उनका आशीर्वाद लेते हैं।

हरिदास सम्प्रदाय/श्री बाँके बिहारी जी का मन्दिर

स्वामी हरिदास जी, निधिवन, वृन्दावन
Swami Haridasa, Nidhivan, vrindavan

वृन्दावन के आधुनिक सर्वाधिक महत्वपूर्ण सम्प्रदायों में से एक उल्लेखनीय सम्प्रदाय है, हरिदास सम्प्रदाय जिसकी संस्थापना स्वामी हरिदास द्वारा हुई थी। वृन्दावनस्थ आधुनिक मन्दिरों में विशिष्ट एक प्रख्यात मन्दिर है, जो श्री बाँके बिहारी जी के मन्दिर के नाम से लोक विश्रुत है। यह गुंसाई जी तथा उनके वशधरों के आधिपत्य में है। इस वंश परम्परा के लोगों की संख्या 19 वीं सदी में लगभग 500 थी। श्रीकृष्ण को समर्पित यह मन्दिर हरिदासी संप्रदाय का मुख्यावास मात्र ही नहीं, वरन् सम्पूर्ण भारत में यह एक मात्र मन्दिर है, जिस पर गोस्वामियों का एकाधिकार है। सत्तर हज़ार रुपयों की धनरशि से इनका पुनर्निर्माण निकट अतीत में ही हुआ। यह निधि दूर पास के यजमानों से तेरह वर्ष के अन्तराल में एकत्र की थी। सामान्य किन्तु अत्यन्त सारभूत स्वरूप के लाल पत्थर से निर्मित इस विशद वर्गाकार मन्दिर का प्रमुख केन्द्रीय द्वार संगमरमर से बना हुआ है, जो अत्यन्त प्रभावशाली है। यह भवन निर्माण शिल्प का एक प्रसन्न आदर्श प्रस्तुत करता है। यह सभ्य संसार के ऐसे कतिपय स्थानों में से एक है, जहाँ भारतीय शिल्प मृत अतीत की परिश्रम साध्य प्रति कृति मात्र न होकर एक जीवन्त कला है, जो निरन्तर स्वत: ही विकास की प्रक्रिया में प्रबर्द्धमान है। गुसाइयों के वंशानुक्रमानुसार यह सम्पत्ति दो भागों में विभक्त हुई। उसका एक भाग स्वयं एक ब्रह्मचारी का था, किन्तु उसके भ्राता जगन्नाथ के मेघश्याम, मुरारीदास और गोपीनाथदास नामक तीन पुत्र थे, जिनमें से तीसरे नि:सन्तान दिवंगत हो गये। शेष दोनों भाई वर्त्तमान वंश परम्परा के पूर्वज थे। जैसा कि ऐसे प्रकरणों में सामान्यत: होता है दोनों परिवार परस्पर संघर्षरत रहने लगे। एकाधिक बार शान्तिभंग होने की गम्भीर स्थिति के निवारणार्थ शासन को क़ानून की सहायता लेने को विवश होना पड़ा। अपने पूर्वज की महानता के परे कतिपय गुंसाई ही सम्मान के अधिकारी होने का दावा कर सकते थे। या तो अपने वैदुष्य के कारण या अपनी नैतिकता की सटीकता के कारण, क्योंकि उनमें से बहुसंख्यक पढ़ लिख नहीं सकते थे। सामान्यतः उसके दो दावेदार थे। प्रत्येक 'बट' के लिये एक-एक। ये थे गुसाई जगदीश और किशोर चन्द्र। सम्प्रदाय के साहित्य की संकीर्ण सीमाओं में ये दोनों ही पक्ष अच्छे पढ़े लिखे थे।

हरिदास के सन्दर्भ में नाभा जी के मूल भक्तमाल में निम्नोक्त छन्द है—

आशधीर उद्योत कर रसिक छाप हरिदास की॥

जुगल नाम सौं नैम जपत नित कुंज बिहारी॥

अविंलोकित रहैं केलि सखी सुख को अधिकारी॥

गान कला गंधर्व श्याम श्यामा को तोषें॥

उत्तम भोग लगाय मोर मरकट तिमि पोषें॥

नृपति द्वार ठाड़े रहें दरशन आशा जासकी॥

आशधीर उद्योत कर रसिक छाप हरिदास की॥

इसके पश्चात प्रियादास की टिप्पणिका या अनुपूरक इस प्रकार है—

॥टीका॥

श्री स्वामी हरिदास रास राशि को बषांनि सकै

रसिकता की छाप कोई जाप मधि पाई है॥

ल्यायौ कोऊ चोवा ताकौ अति मन भोवा वामै

डारयौ लै पुलनि यह खोवा हिय आइयै॥

जानि के सुजान कही लै दिषावौ लाल प्यारे

नैसिकु उघारे पट सुगन्ध बुड़ाइयै॥

पारस पषांन करि जल डरबाइ दियौ

कियौ तब शिष्य अंसैं नाना विधि गाइयै॥

अन्य तथ्य

कदाचित इसे सभी मानेगे कि इस विशिष्ट छन्द में शिष्य अपने गुरु से अधिक अस्पष्ट रहा है। भक्त सिंधु ने उक्त दोनों छन्दों का 211 पदों की कविता में विशदीकरण किया है तथा समस्त भ्रमों की कुंजी निम्नांकित विवरण में प्रदान की है-

ग्राउस के विचार

स्वामी हरिदास जी की समाधि, निधिवन, वृन्दावन
Swami Haridas Samadhi(Tomb), Nidhivan, Vrindavan

मेरे (ग्राउस) पास 680 पृष्ठों की एक छोटी पोथी हैं, जिसमें संस्थापक से लेकर इस हस्तलेख की तिथि सं0 1825 तक के समस्त महन्तों की तथा उनके लेखों की तालिका है। सूची यह है-

प्रत्येक महन्ती के लिये बीस वर्ष रखे जायें, जो एक ऊँचा औसत हैं, क्योंकि इस पद पर एक वयस्क व्यक्ति का चयन होता है, स्वामी हरिदास के शरीरान्त की तिथि मात्र सं0 1665 वि0 ठहरती है। उनकी रचनाएँ शैली में तुलसीदास की कविता से अधिक पूर्ववर्ती नहीं हैं, जिनका देहावसान सं0 1680 में हुआ था। अत: प्रत्येक दशा में निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वे अकबर और जहाँगीर के शासनकाल में ईसवी की सोलहवीं शती के अन्त और सत्रहवीं शती के आरम्भ में विद्यमान रहे। उपरिलिखित सूची में प्रत्येक महन्त अपने पूर्ववर्ती महन्त का शिष्य उल्लिखित है और प्रत्येक ने कुछ भक्ति कविताएँ लिखी, जिन्हें साखी , चौबोला या पद कहा जाता है। सर्वाधिक मात्रा में लिखने वाले लेखक बहारिनदास हैं, जिनके पद 684 पूष्ठों का कलेवर भरते हैं। उनमें से अनेक पदों में अतिशयातिरेक में वे रहस्यात्मक भक्ति को अभिव्यक्त करते हैं, जो दिव्यभाव की अपेक्षा भौतिकता की द्योतक हैं। किन्तु निम्नोक्त उद्धरण सर्वथा पृथक् प्रकृति का है। यह स्वामी हरिदास के देहावसान की तिथि का अनुमोदन करने की दिशा में अधिक सहायक है, जो ऊपर निष्कर्षित है। क्योंकि इसमें सम्राट् अकबर और उसके प्रसिद्ध मित्र बीरबल की मृत्यु का नाम से उल्लेख है, जो सन 1590 ई॰ में हुई थी।

राग गोरी

कहा गर्वे रे मृतक नर ॥

स्वान स्यार की ख़ान पांन तन अंठि चलत रे निलज निडर ॥

यहै अवधि जग विदित जग बांभन बड़े भये बीरबर ॥

मरत दूष्यौं हियौ न जियौ किसी न सहाइ अकबर ॥

स्वासन निकसत सुर असुर रषि गेंथि काल करतर ॥

इतहि न उतहि बीच ही भूल्यों है फिरत कौंन कौ थर ॥

सुखद सरन हरिचरन कमल भजि बादि फिरत भटकत घर धर ॥

श्री बिहारीदास हरिदास विपुलबल लटकि लग्यौ संग सर्वोपर ॥

[1]


संप्रदाय के संस्थापक की 'साधारण सिद्धान्त' और 'रास के पद' शीर्षक 41 पृष्ठों की केवल दो छोटी रचनाएँ हैं। पहली अपने मूल पाठ में नीचे उद्धृत की जाती है। मन्दिर के सभी भक्तों को इसका बहुलांश कंठस्थ है, यद्यपि निश्वयपूर्वक जान लिया गया कि उनमें से विरले ही इसके सामान्य अर्थ से आगे अधिक जानते है। किशोरचन्द्र जैसे बहुज्ञ पुजारी ने इसका अवलोकन किया और उसके कुछ अंशों के अर्थ किये। अन्य पंडितों का अभिमत लेने पर वे अर्थ अपर्याप्त पाये गये और विवशत: छोड़ने पड़े।

राग विभास

ज्यौंही ज्यौंही तुम राषत हौ त्यौंही त्यौंही रहियत है हों हरि॥

और तौ अचरचे पाय धरौं सु तौ कहौं कौन के पेंड भरि ॥

जद्यपि हौं अपनौ भायौ कियौ चाहौं कैसे करि सकौं जो तु राखौ पकरि ॥

श्री हरिदास के स्वामी श्याम कुंज बिहारी

पिजरा के जनावर लौं तरफराय रहौ उड़िवे कौ कितौक करि ॥1॥

काहूकौ बस नांहि तुम्हारी कृपा ते सब होय श्री बिहारी बिहारिन ॥

और मिथ्या प्रपंच काहे कौं भाषिये सो तौ है हारिनि ॥

जाहि तुम सौं हित तासौं तुम हित करौ सब सुख कारनि ॥

श्री हरिदास के स्वामी श्यामा कुंजबिहारी प्राँननि के आधारनि ॥2॥

कबहूँ कबहूँ मन इत उत जातैं यातें अब कौन है अधिक सुष॥

बहुत भाँति नयत आंनि राष्यौ नाहितौ पावतौ दुष ॥

कोटि कमलावन्य बिहारी तातै मुहा चुहीं सब सुष लियें रहत रूष॥

श्री हरिदास के स्वामी श्यामा कुंज बिहारी दिन देषत रहौ विचित्र मुष॥3॥

हरि भजि हरि भजि छांड़िन मान नर तन कौ॥

जिन बंछैरे जिन बंछैरे तिल तिल धनकौं ॥

अनमागैं आगैं आवैगौ ज्यौं पल लागैं पलकौं ॥

कहि हरिदास मीच ज्यौं आवै त्यौं धन आपुन कौ ॥4॥

राग बिलावल

हे हरि मोसौं न बिगारन कौं तोसौं न संम्हारन कौं मोहि तांहि परी होड़ ॥

कौंन धौं जी तै कौंन धौं हारै परि बादी न छोड़ ॥

तुम्हारी मायाबाजी पसारी विचित्र मोहे मुनि काके भूले कोउ॥

कहि हरिदास हम जीते हारे तुम तहु न तोड़ ॥5॥

वंदे अषत्यार भला ॥

चित न डुलाव आव समाधि भीतर न होहु अगला ॥

न फिर दर दर पदर पद न होहु अधला॥

कहि हरिदास करता किया सो हुवा सुमेर अचल चला ॥6॥

हित तौ कीजै कमल नैन सों जा हित के आगैं और हित के लागै फीकौ॥

कै हित कीजैं साधु संगत सौं ज्यौं कलमषि जाय जीकौ॥

हरि कौ हित ऐसौ जैसौ रंग मजीठ॥

संसार हिंत असौ जैसौ रंग कसूम दिन दुती कौ॥

कहि हरिदास हित कीजै बिहारी सौं और निवाहू जी कौ ॥7॥

तिनका बयार बस॥

ज्यौं भावै त्यौं उड़ाय ले जाय आपने रस ॥

ब्रह्म लोक शिवलोक और लोक अस।

कहे श्री हरिदास विचार देषौ विना बिहारी नाहिं जस ॥8॥

संसार समुद्र मनुष्य मीन नक्र मगर और जीब बहु बंदसि ॥

मन बयार प्रेरे स्नेह फंद फदसि ॥

लोभ पिंजरा लोभी मरजिया पदारथ चारि षंदषंदसि॥

कहि हरिदास तेई जीव पराभये जे गहि रहे चरन आनन्द नन्दसि ॥9॥

हरि के नाम कौ आलस कित करत है रे काल फिरत सर सांधे ॥

बेर कुबेर कछू नहि जानत कढ्यौ फिरत है कांधे॥

हीरा बहुत जवाहिर सच्चे राँचे कहा भयौ हस्ती दर बाँधे ॥

कहि हरिदास महल में बनिता बनठाढ़ी भई॥

तव कछु न चलत जब आवत अन्त की आँधे ॥10॥

देषौ इनि लोगन की लावनि ॥

बूझत नाँहिं हरिचरनकमल कौं मिथ्या जन्म गवावनि

जब जमदूत आय घेरत हैं करत आप मनभावनि ॥

कहै श्री हरिदास तबहीं चिरजीवै कुंजबिहारी चितवनि ॥11॥

मन लगाय प्रीति कीजै करवासों ब्रज बीचिन न दीजे सोहनी॥

वृन्दावन सो बन उपबन सौं गुंजमाल हाथ पोहनी ॥

गो गोसुतन सों मृगी मृगसुतन सौं और तन नेंक न जोहनी ॥

श्री हरिदास के स्वामी श्यामां कुंज बिहारी सोचित ज्यों सिर पर दोहनी ॥12॥

राग कल्यान

हरि कौ असोई सब खेल ॥

मृग तृष्णा जग ब्यापि रह्यों है कहूँ बिजौरौ न बेलि॥

धन मद जोवन मद राज मद ज्यौं पंछिन में डेल ॥

कहै श्री हरिदास यहै जिय जानौ तीरथ को सौ मेल ॥13॥

माई धनि वे मृगी जे कमल नैन कों पूजित अपनें अपनैं भरतारन सहित॥

धनिवे गाइ वछ वेई जे वशरस पीवत श्रवन दोना ज्यौं जाई न बहत ॥

पंछी न होंहिं मुनि जन जेते केते सेवहि दिन काम क्रोध लोभ रहित॥

सुनि श्री हरिदास हमारे पति ते कठिन जान दे हये राखत गहत ॥14॥

राग बरारी

लाल मेरे दूध की दोहनी॥

मारग जात माहि रह्यौ री अंचरा मेरौ जाहिन दंत हो बिना बोहना॥

नागरि गूजरि ठगि लीनों मेरौं लाल गोरोचन कौ तिलक भावै मोहना॥

श्री हरिदास के स्वामी इहां असोई न्याव है या नगरी जिन बसोरी सोहनी॥15॥

राग कान्हरो

झूठी बात सांची करि दिषावत हौ हरि नागर॥

निसि दिन बुनत उधेरत हौ जाय प्रपंच कौ सागर॥

ठाठ बनाय धरयौ मिहरी कौ है पुरुषतें आगर॥

सुनि हरिदास यहै जिय जानों सुपनें कौ सौ जागर॥16॥

जगत प्रीति करि देवी नाहि नेंग टीकौ कोऊ॥

छत्रपति रंक लौ देषै प्रकृति विरोध न बन्यौ कोऊ॥

दिन जु गये बहुत जन्मन के ऐसौ जावौं जिन कोऊ॥

सुनि हरिदास मीत भलौ पायौ विहारी ऐसौ पावौ सब कोऊ॥17॥

लोग तौ भूल्यौ भलै भूल्यों तुम मति भूलौ मालाधारी॥

आपनौ पति छाँड़ि आरनि सौं राति ज्यौं दारिन में दारी॥

स्याम कहत जे जीव मोते विमुख जोको जिन दूसरी कर डारी॥

कहि हरिदास जज्ञ देवता पितरन कौ शरधा भारी ॥18॥

जौलौ जीवै तौलौ हरि मज रे मन और बात सब बादि ॥

द्यौस चार के हलभला में तू कहा लेगौ लादि॥

धनमद जोवनमद राजमद भूल्यौ नगर विवादि॥

कहि श्री हरिदास लोभ चरपट भयौ काहेकी लगै फिरादि॥19॥

प्रेम समुद्र रूप रस गहिरे कैसे लागै घाट॥

बेकार्यौ दै जानि कहावत जानि पन्यौ को कहा परी वाट॥

काहू कौ सर सूधौ न परै मारत गाल गली गली हाट॥

कहि श्री हरिदास जानि ठाकुर बिहारी तकत न ओट पाट॥20॥

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अरे मर्त्य प्राणी क्यों अभिमान करता है? तेरा शरीर कुतों और श्रृगालों का भोज्य बनेगा, तथापि तू निर्ल्लज्ज और निर्भय ऐंठकर चलता है। सभी का यह अन्त सारे संसार को विदित है। ब्राह्मण वीरबल एक महान पुरुष था, तथापि उसकी मृत्यु हुई। उसकी मृत्यु से सम्राट अकवर का हृदय शोकाकुल हुआ। वह भी जीवित न रहा और न कोई सहायता मिली। जब देवासुर मृत्यु को प्रापत होते हैं, मृत्यु उनकी जुगाली करती है। न इधर न उधर , बीच में ही तू किस किसके घर भटकता है सभी भ्रमित हैं और अभिमान में फूले हुए हैं, तेरा किस पर विश्वास है? हरि के पद-कमलों की आराधना कर। घर-घर घूमना और भटकना सब अभिमान है। हरिदास के विषुल वल से बिहारिनदास ने उस सर्वाच्च को प्राप्त कर लिया है।

सम्बंधित लिंक

निजी टूल
नामस्थान
संस्करण
क्रियाएं
सुस्वागतम्
टूलबॉक्स
अन्य भाषाएं