अम्बिका वन

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अम्बिका वन जिसे वर्तमान में महाविद्या कॉलोनी के नाम से जाना जाता है, कटरा केशव देव से लगा हुआ क्षेत्र है। यहाँ प्रारम्भ से ही अम्बिका देवी का वास था, जिसकी कथा श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में है। द्वापर युग में नन्दबाबा आदि गोपों ने शिवरात्रि के अवसर पर बैलगाड़ियों में सवार होकर इस अम्बिका वन की परिक्रमा की थी, जिसका उल्लेख श्रीमद्भागवत में है-

एकदा देवयात्रायां गोपाला जातकौतुका:।
अनोभिरनडुद्युक्तै: प्रययुस्तेsम्बिकावनम् ।।[1]

श्रीमद्भागवत में ऐसा वर्णन है कि वहां उन लोगों ने सरस्वती नदी में स्नान किया औऱ सर्वान्तर्यामी पशुपति भगवान शंकरजी और भगवती अम्बिका जी का बड़ी भक्ति भाव से पूजन किया।

सिद्ध-विद्याधर वास स्थल

ऐसा वर्णन है कि अम्बिका वन में उस समय भी सिद्ध और विद्याधरों का वास था। अजगर रूपधारी एक श्रापित विद्याधर ने नन्दबाबा को पकड़ लिया था जो भगवान श्रीकृष्ण के स्पर्श से शापमुक्त हुआ। बाद में इन्हीं अम्बिका देवी ने श्रीकृष्ण की सुरक्षा का भार भी ले लिया जिसका वर्णन वाराह पुराण में है। वर्तमान में यहां जो भव्य मंदिर है, उसका निर्माण 15वीं शताब्दी में जयपुर के जगन्नाथ पंडितराज सामराज दीक्षित द्वारा कराया गया।

पंडितराज सामराज दीक्षित

दीक्षित जी उच्च कोटि के तांत्रिक और खगोलविद थे। सवाई माधोपुर की सम्राटवेध शाला इस बात का प्रमाण है। ऐसी ही एक वेधशाला उन्होंने मथुरा में भी बनवायी थी जिसके अवशेष जयसिंहपुरा में आज भी हैं। खगोलविद होने के साथ ही आप उच्च स्तर के आध्यात्मिक साधक भी थे। कहते हैं कि आपके साथ दो माया सिंह रहा करते थे जो आपके पूजन आदि का प्रबन्ध करते थे। आप जब अम्बिका वन आये तो महाविद्या उपासना की सिद्धि के लिये प्रयत्न किया, किन्तु असफल रहने पर किसी गुरु की खोज करने लगे। आपने जब माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मणों से उनके गुरु श्री शंकरमुनि जी महाराज के विषय में सुना तो इनके दर्शन की इच्छा की। कहते हैं कि जब शंकरमुनि जी महाराज अम्बिका वन पहुंचे तो दीक्षित जी के दोनों सिंह पाषाण सिंह बन गये और स्वयं दीक्षित जी की समाधि लग गयी। तदन्तर, माथुर चतुर्वेद कुलगुरु श्री शंकरमुनि जी महाराज ने महाविद्या देवी मंदिर का शिखरबन्ध निर्माण कराकर दीक्षित जी को महाविद्या उपासना की सिद्धि उपलब्ध करायी।

सामराज दीक्षित जी ने शंकरमुनि जी महाराज को स्वलिखित बहुमूल्य पूजारत्न ग्रंथ भेंट किया जो ऊर्ध्वाम्नाय श्रीपीठ, श्रीजी दरबार में आज भी सुरक्षित है। कालान्तर में महाविद्या मंदिर के जर्जर हो जाने पर 1907 के आस-पास ऊर्ध्वाम्नाय पीठाधीश्वर माथुर चतुर्वेद कुलगुरु श्री शीलचंद्राचार्य जी महाराज द्वारा यहां शतचण्डी यज्ञ कराकर अपने पूर्वज श्री शंकरमुनि जी महाराज द्वारा निर्मित इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया। जिसका शिलालेख अभी कुछ समय पूर्व तक मंदिर में लगा हुआ था किंतु अब अनुपलब्ध है।


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. श्रीमद्भागवत 10।34।1

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