झांझ

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*दोनों एक-एक टुकड़े को एक-एक हाथ में पकड़कर बजाया जाता है।
 
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गोलाकार समतल या उत्तलाकार धातु की तश्तरी जैसा ताल वाद्य, जिसे [[ढोल]] बजाने की लकड़ी से या इसके जोड़े को एक-दूसरे से रगड़ते हुए टकराकर बजाया जाता है। इसका असीरिया, इज़राइल (1100 ई॰पू॰), मिस्र और अन्य प्रचीन सभ्यताओं में अक्सर आनुष्ठानिक तौर पर इस्तेमाल किया जाता था। यह [[मध्य काल]] में सुदुर पूर्व एवं यूरोप में 13वीं सदी से पहले पहुंचा। अधिकतर एशियाई झांझ चौड़े किनारे वाले उभार या बिना उभार के क्षैतिज तरीक़े से आड़े पकड़कर तेजी से टकराए जाते हैं या छोटे किनारे वाले (या किनारा रहित), खड़े तरीके से पकड़कर धीमे बजाए जाते हैं। [[bk:झांझ|...और पढ़ें]]
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गोलाकार समतल या उत्तलाकार धातु की तश्तरी जैसा ताल वाद्य, जिसे [[ढोल]] बजाने की लकड़ी से या इसके जोड़े को एक-दूसरे से रगड़ते हुए टकराकर बजाया जाता है। इसका असीरिया, इज़राइल (1100 ई॰पू॰), मिस्र और अन्य प्रचीन सभ्यताओं में अक्सर आनुष्ठानिक तौर पर इस्तेमाल किया जाता था। यह [[मध्य काल]] में सुदुर पूर्व एवं यूरोप में 13वीं सदी से पहले पहुंचा। अधिकतर एशियाई झांझ चौड़े किनारे वाले उभार या बिना उभार के क्षैतिज तरीक़े से आड़े पकड़कर तेजी से टकराए जाते हैं या छोटे किनारे वाले (या किनारा रहित), खड़े तरीक़े से पकड़कर धीमे बजाए जाते हैं। [[bk:झांझ|...और पढ़ें]]
  
 
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07:33, 11 मई 2010 का संस्करण

झांझ / Jhanjh


गोलाकार समतल या उत्तलाकार धातु की तश्तरी जैसा ताल वाद्य, जिसे ढोल बजाने की लकड़ी से या इसके जोड़े को एक-दूसरे से रगड़ते हुए टकराकर बजाया जाता है। इसका असीरिया, इज़राइल (1100 ई॰पू॰), मिस्र और अन्य प्रचीन सभ्यताओं में अक्सर आनुष्ठानिक तौर पर इस्तेमाल किया जाता था। यह मध्य काल में सुदुर पूर्व एवं यूरोप में 13वीं सदी से पहले पहुंचा। अधिकतर एशियाई झांझ चौड़े किनारे वाले उभार या बिना उभार के क्षैतिज तरीक़े से आड़े पकड़कर तेजी से टकराए जाते हैं या छोटे किनारे वाले (या किनारा रहित), खड़े तरीक़े से पकड़कर धीमे बजाए जाते हैं। ...और पढ़ें

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