शुभगुप्त आचार्य

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आचार्य शुभगुप्त

इतिहास में इनके नाम की बहुत कम चर्चा हुई। 'कल्याणरक्षित' नाम भी ग्रन्थों में उपलब्ध होता है। वस्तुत: भोट भाषा में इनके नाम का अनुवाद 'दगे-सुङ्' हुआ है। 'शुभ' शब्द का अर्थ 'कल्याण' तथा 'गुप्त' शब्द का अर्थ 'रक्षित' भी होता है। अत: नाम के ये दो पर्याय उपलब्ध होते हैं। शान्तरक्षित के तत्त्वसंग्रह की 'पंजिका' टीका में कमलशील ने 'शुभगुप्त' इस नाम का अनेकधा व्यवहार किया है। अत: यही नाम प्रामाणिक प्रतीत होता है, फिर भी इस विषय में विद्वान ही प्रमाण हैं। शुभगुप्त कहाँ उत्पन्न हुए थे, इसकी प्रामाणिक सूचना नहीं है, फिर भी इनका कश्मीर-निवासी होना अधिक संभावित है। भोटदेशीय परम्परा इस सम्भावना की पुष्टि करती है। धर्मोत्तर इनके साक्षात शिष्य थे, अत: तक्षशिला इनकी विद्याभूमि रही है। आचार्य धर्मोत्तर की कर्मभूमि कश्मीर-प्रदेश थी, ऐसा डॉ॰ विद्याभूषण का मत है।

समय

कृतियाँ

भदन्त शुभगुप्त युक्ति-अनुयायी सौत्रान्तिकों के अन्तिम और लब्धप्रतिष्ठ आचार्य थे। उनके बाद ऐसा कोई आचार्य ज्ञात नहीं है, जिसने सौत्रान्तिक दर्शन पर स्वतन्त्र और मौलिक रचना की हो। यद्यपि धर्मोत्तर आदि भारतीय तथा जमयङ्-जद्-पई, तक्-छङ्-पा आदि भोट आचार्यों ने बहुत कुछ लिखा है, किन्तु वह पूर्व आचार्यों की व्याख्यामात्र है, नूतन और मौलिक नहीं है। आज भी दिङ्नागीय परम्परा के सौत्रान्तिक दर्शन के विद्वान् थोड़े-बहुत हो सकते हैं, किन्तु मौलिक शास्त्रों के रचयिता नहीं हैं। आचार्य शुभगुप्त ने कुल कितने ग्रन्थों की रचना की, इसकी प्रामाणिक जानकारी नहीं है। उनका कोई भी ग्रन्थ मूल संस्कृत में उपलब्ध नहीं है। भोट भाषा और चीनी भाषा में उनके पाँच ग्रन्थों के अनुवाद सुरक्षित हैं, यथा

  1. सर्वज्ञसिद्धिकारिका,
  2. वाह्यार्थसिद्धिकारिका,
  3. श्रुतिपरीक्षा,
  4. अपोहविचारकारिका एवं
  5. ईश्वरभङ्गकारिका।

ये सभी ग्रन्थ लघुकाय हैं, किन्तु अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। इनका प्रतिपाद्य विषय इनके नाम से ही स्पष्ट है, यथा-

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