कात्यायनी पीठ

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कात्यायनी पीठ / Katyayani peeth

कात्यायनी पीठ, वृन्दावन
Katyayani peeth, Vrindavan

भारतीय संस्कृति जहां जो कुछ उत्तम एवं शुभ है उसका संग्रह करने वाली है। 'सर्वेषाम् विरोधेन ब्रह्मकर्म समार-भे' को वाणी प्रदान करने वाली है। संकुचित भावना से दूर त्याग, संयम, वैराग्य, सेवा, प्रेम, ज्ञान आदि से सुरभित वातावरण में पली भारतीय संस्कृति समस्त संस्कृतियों का श्रृंगार है। भारत की सांस्कृतिक चेतना मानवता के मंदिर की अखंड ज्योति सी निरंतर प्रज्वलित रही। जब भी यह ज्योति मंद पड़ी एक नवीन ज्योति ने अपना शुभ स्नेह दान कर उसमें प्राण फूंके। कितने वात्याचक्र आये और चले गये, किन्तु विश्व को शान्ति और सदभाव का संदेश देती हुई वह मंगल ज्योति निरन्तर जलती आ रही है। इसी श्रृंखला के अंतर्गत भगवती कात्यायनी द्वारा नियुक्त महान योगिराज श्री श्यामाचरण लाहिड़ी जी महाराज के परम सुयोग्य शिष्य योगी जी 1008 श्रीयुत स्वामी केशवानन्द ब्रह्मचारी जी महाराज ने अपनी कठोर साधना द्वारा भगवती के प्रत्यक्ष आदेशानुसार इस लुप्त स्थान श्री कात्यायनी पीठ राधा बाग, वृन्दावन नामक पावनतम पवित्र स्थान का उध्दार किया।

वृन्दावन में कात्यायनी पीठ

अनन्त काल से भारतवर्ष यथार्थ में पवित्र स्थानों, तीर्थों, सिध्दपीठों, मन्दिरों एवं देवालयों से सुसज्जित एवं सुशोभित रहा है। जिस पावन पवित्र भूमि में गंगा, यमुना, सरस्वती आदि नदियों एवं राम कृष्ण आदि आराध्य देवों ने अवतार ग्रहण किया और अधर्म का नाश कर धर्म की रक्षा की, ऐसे सुन्दर पवित्रतम स्थानों को तीर्थ एवं सिध्दपीठ के नाम से पुकारा गया, जिनमें भगवान नन्दनन्दन अशरणशरण, करुणावरुणालय, ब्रजेन्द्र नन्दन श्री कृष्णचंद्र की पावन पुण्यमय क्रीड़ाभूमि श्रीधाम वृन्दावन में कालिन्दी गिरिनन्दनी सकल क्ल्मषहारिणी श्री यमुना के सन्निकट राधाबाग स्थित अति प्राचीन सिध्दपीठ के रूप में श्री श्री मां कात्यायनी देवी विराजमान हैं।


भगवान श्री कृष्ण की क्रीड़ा भूमि श्रीधाम वृन्दावनमें भगवती देवी के केश गिरे थे, इसका प्रमाण प्राय: सभी शास्त्रों में मिलता ही है। आर्यशास्त्र, ब्रह्म वैवर्त पुराण एवं आद्या स्तोत्र आदि कई स्थानों पर उल्लेख है- व्रजे कात्यायनी परा अर्थात वृन्दावन स्थित पीठ में ब्रह्मशक्ति महामाया श्री माता कात्यायनी के नाम से प्रसिद्ध है। वृन्दावन स्थित श्री कात्यायनी पीठ भारतवर्ष के उन अज्ञात 108 एवं ज्ञात 51 पीठों में से एक अत्यन्त प्राचीन सिध्दपीठ है। देवर्षि श्री वेदव्यास जी ने श्रीमद् भागवत के दशम स्कंध के बाईसवें अध्याय में उल्लेख किया है-
कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नम:॥
हे कात्यायनि! हे महामाये! हे महायोगिनि! हे अधीश्वरि! हे देवि! नन्द गोप के पुत्र को हमारा पति बनाओ हम आपका अर्चन एवं वन्दन करते हैं। दुर्गा सप्तशती में देवी के अवतरित होने का उल्लेख इस प्रकार मिलता है-
नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा। मैं नन्द गोप के घर में यशोदा के गर्भ से अवतार लूंगी। श्रीमद् भावगत में भगवती कात्यायनी के पूजन द्वारा भगवान श्री कृष्ण को प्राप्त करने के साधन का सुन्दर वर्णन प्राप्त होता है। यह व्रत पूरे मार्गशीर्ष (अगहन) के मास में होता है। भगवान श्री कृष्ण को पाने की लालसा में ब्रजांगनाओं ने अपने ह्रदय की लालसा पूर्ण करने हेतु यमुना नदी के किनारे से घिरे हुए राधाबाग नामक स्थान पर श्री कात्यायनी देवी का पूजन किया।
ऐसे महान सिध्दपीठ का उध्दार क्या कोई साधारण व्यक्ति कर सकता है? जब तक उसे भगवती की कृपा प्राप्त ना हो जाये। भगवती द्वारा नियुक्त पुत्र श्री केशवानन्द जी ने श्री कात्यायनी पीठ का पुनरुध्दार करने हेतु इस पृथ्वी पर जन्म लिया।
कामरूप मठ के स्वामी रामानन्द तीर्थ जी महाराज से दीक्षित होकर कठोर साधना के लिए हिमालय की कंदराओं में गमन किया। साधनान्तर सर्वशक्तिशाली मां के आदेशानुसार वृन्दावन स्थित अज्ञात सिध्दपीठ का उन्होंने पुनरूध्दार कराया। स्वामी केशवानन्द जी महाराज द्वारा 1 फरवरी, 1923 माघी पूर्णिमा के दिन बनारस, बंगाल तथा भारत के विभिन्न सुविख्यात प्रतिष्ठित वैदिक याज्ञिक ब्राह्मणों द्वारा वैष्ण्वीय परम्परा से मंदिर की प्रतिष्ठा का कार्य पूर्ण कराया। मां कात्यायनी के साथ-साथ पंचानन शिव, विष्णु, सूर्य तथा सिध्दिदाता श्री गणेश जी महाराज (जिनकी बात तो कुछ अलौकिक ही है "जिसने जाना उसने पाया" वाली कहावत चरितार्थ है) की मूर्तियों की भी इस मंदिर में प्रतिष्ठा की गई।
राधाबाग मंदिर के अंतर्गत गुरु मंदिर, शंकराचार्य मंदिर, शिव मंदिर तथा सरस्वती मंदिर भी दर्शनीय हैं। यहाँ की अलौकिकता का मुख्य कारण जहां साक्षात मां कात्यायनी सर्वशक्तिस्वरूपणि, दु:खकष्टहारिणी, आल्हादमयी, करुणामयी अपनी अलौकिकता को लिए विराजमान है वहीं पर सिध्दिदाता श्री गणेश जी एवं बगीचा में अर्ध्दनारीश्वर (गौरीशंकर महादेव) एक प्राण दो देह को धारण किये हुए विराजमान हैं। लोग उन्हें देखते ही मन्त्रमुग्ध हो जाते हैं।
शकराचार्य मंदिर में जहां विप्र वटुओं द्वारा वेद ध्वनि से सम्पूर्ण वेद विद्यालय एवं सम्पूर्ण कात्यायनी पीठ का प्रांगण पवित्र हो जाता है, वहीं कात्यायनी पीठ में स्थित औषधालय द्वारा विभिन्न असाध्य रोगियों का सफलतम उपचार तथा मंदिर में स्थित गौशाला में गायों की सेवा पूजा दर्शनीय है। इसके अतिरिक्त यज्ञशाला में वेदोक्तरीति से स्वाहाकार मन्त्रों का श्रवण एवं विभिन्न उपासना पध्दति द्वारा अर्चन को देखकर कोई व्यक्ति स्तम्भित होकर मां के समक्ष पहुंच जाता है और सम्पूर्ण संसार को ही वह पल भर के लिए भूल जाता है। यही मां कात्यायनी की कृपा शक्ति का फल है जो कई बार दर्शन करने के बाद भी उसकी लालसा और जाग्रत होती चली जाती है।
श्री स्वामी केशवानन्द ब्रह्मचारी जी महाराज ने हरिद्वार में चण्डी पर्वत के चरण पर चारों ओर से पतितपावनी कल्मषहारिणी पुनीत गंगा से घिरे हुए सुरम्य स्थान पर योग साधना हेतु एक आश्रम की स्थापना की, वहां का वातावरण अत्यन्त सुरम्य एवं मनोहारी है। चतुर्दिक वृक्षों एवं फलफूलों से आच्छादित्य उस दिव्य आश्रम की भूमि मानो मानव मात्र को अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। ये तपोस्थली है जहां व्यक्ति एकाग्रचित्त होकर उस अलौकिक प्रेम को पाने के लिए लालायित हो उठता है।
श्री श्री कात्यायनी पीठ वृन्दावन में समयोचित पूजा महोत्सव आदि अनवरत रूप से विधिपूर्वक होते रहते हैं।

श्री सिध्द गणेश

कात्यायनी पीठ, वृन्दावन
Katyayani peeth, Vrindavan

श्री श्री कात्यायनी पीठ वृन्दावन में स्थित गणपति महाराज की मूर्ति का भी विचित्र इतिहास है। एक अंग्रेज़ श्री डब्लू॰ आर॰ यूल कलकत्ता में मैसर्स एटलस इंशोरेंस कम्पनी लि॰ जो न॰ 4 क्लाइव रोड पर है, में ईस्टर्न सेक्रेटरी पद पर कार्य करते थे। इनकी पत्नी श्रीमती यूल ने कोई सन 1911 या 1912 में जबकि वह विलायत जा रही थीं, जयपुर से एक गणपति महाराज की मूर्ति ख़रीदी। वह अपने पति को कलकत्ता छोड़कर इंग्लैण्ड चली गईं तथा उन्होंने अपनी बैठक में कारनेस पर गणपति जी की प्रतिमा सजा दी। एक दिन श्रीमती यूल के घर भोज हुआ तथा उनके मित्रगणों ने गणेश जी की प्रतिमा को देखकर उनसे पूछा कि यह क्या है? श्रीमती यूल ने उत्तर दिया कि यह हिन्दुओं का सूंड वाला देवता है। उनके मित्रों ने गणेश जी की मूर्ति को बीच की मेज पर रखकर उपहास करना आरम्भ किया। किसी ने गणेश जी के मुख के पास चम्मच लगाकर पूछा कि इनका मुंह कहां है। जब भोज समाप्त हो गया तब रात्रि में श्रीमती यूल की पुत्री को ज्वर हो गया जो रात्रि को बड़े वेग से बढ़ गया। वह अपने तेज ज्वर में चिल्लाने लगी हाय मेरा सूंड़वाला खिलौना मुझे निगलने आ रहा है। डाक्टरों ने सोचा कि वह विस्मृति में बोल रही है। किन्तु वह रात दिन यही शब्द दोहराती रही एवं अत्यन्त भयभीत हो गयी। श्रीमती यूल ने यह सब वृतांत अपने पति को कलकत्ता लिखकर भेजा। उनकी पुत्री को किसी भी औषधि से लाभ नहीं हुआ। एक दिन यूल ने स्वप्न में देखा कि वह अपने बाग के अतिथिगृह में बैठी है। सूर्यास्त हो रहा है, अचानक एक नम्र पुरुष जिसके घुंघराले बाल, मशाल सी जलती आंख, हाथ में भाला लिए, वृषभ पर सवार बढ़ते हुए अंधकार से उसकी ओर आ रहा है एवं कह रहा है, ' मेरे पुत्र सूंड़ वाले देवता को तत्काल भारत भेज दो अन्यथा मैं तुम्हारे सारे परिवार का नाश कर दूंगा। वह अत्यधिक भयभीत होकर जाग उठी और दूसरे दिन प्रात: ही उन्होंने उस खिलौने को पार्सल बनवाकर पहली डाक से ही अपने पति के पास भारत भेज दिया। जहां वह देवता गार्डन हेंडरसन के कार्यालय में तीन दिन तक रहे। वहां शीघ्र ही कलकत्ता के नर नारियों की सिध्द गणेश के दर्शनार्थ कार्यालय में भीड़ लग गयी। कार्यालय का सारा कार्य रुक गया। श्री यूल ने अपने अधीन इंश्योरेंस एजेण्ट केदार बाबू से पूछा कि इस देवता का क्या करना चाहिए। अन्त में केदार बाबू गणेश जी को अपने घर 7, अभय चरण मित्र स्ट्रीट ले गए एवं वहां उनकी पूजा शुरु कर दी। तब से सब भक्तों ने केदार बाबू के घर पर जाना आरम्भ कर दिया।
इधर वृन्दावन में स्वामी केशवानन्द जी महाराज कात्यायनी देवी की पंचायतन पूजन विधि से प्रतिष्ठा के लिए सनातन धर्म की पांच प्रमुख मूर्तियों का प्रबन्ध कर रहे थे। श्री श्री कात्यायनी देवी की अष्टधातु से निर्मित मूर्ति कलकत्ता में तैयार हो रही थी तथा भैरव चन्द्रशेखर की मूर्ति जयपुर में बनाई गई थी। जबकि महाराज गणेश जी की प्रतिमा के विषय में विचार कर रहे थे, तभी उन्हें मां का आदेश हुआ कि एक सिध्द गणेश कलकत्ता में केदार बाबू के घर में हैं। जब तुम कलकता से प्रतिमा लाओगे तब मेरे साथ मेरे पुत्र को भी लाना। अत: जब श्री केशवानन्द जी श्री श्री कात्यायनी मां की अष्टधातु की मूर्ति पसंद करके लाने के लिए कलकत्ता गये तब केदार बाबू ने उनके पास आकर कहा गुरुदेव मैं आपके पास वृन्दावन आने का विचार कर रहा था।
मैं बड़ी विपत्ति में हूं। मेरे पास पिछले कुछ दिनों से एक गणेश जी की प्रतिमा है। प्रतिदिन रात्रि में स्वप्न में वह मुझसे कहते हैं कि जब श्री श्री कात्यायनी मां की मूर्ति वृन्दावन जायेगी तो मुझे भी वहां भेज देना। कृपया आप स्वीकार करें। गुरुदेव ने कहा," बहुत अच्छा तुम वह मूर्ति स्टेशन पर ले आना, मैं तूफान से जाऊँगा। जब मां जायेगी तो उनका पुत्र भी उनके साथ जाएगा।"
अत: जब श्री श्री स्वामी केशवानंद जी महाराज श्री श्री कात्यायनी देवी की अष्टधातु की अत्यन्त ही सुन्दर प्रतिमा लेकर कलकत्ता से वापस आ रहे थे, केदारबाबू ने स्टेशन आकर गुरुदेव को गणेश जी की प्रतिमा दे दी। वह सिध्द गणेश इन महायोगी द्वारा श्री श्री कात्यायनी पीठ में प्रतिष्ठित किए गए हैं। इनकी स्थापना के कुछ समय बाद से ही इस अद्भुत देवता की कई आश्चर्यजनक घटीं जो कि लिपिबध्द की जाएं तो एक पूरा ग्रन्थ ही बन जाए।

स्वामी विद्याननद जी महाराज

कात्यायनी पीठ, वृन्दावन
Katyayani peeth, Vrindavan

स्वामी श्री केशवाननद जी महाराज के परम भक्त श्री विश्म्भर दयाल जी और उनकी पत्नी श्री रामप्यारी देवी जी जो प्रतिदिन महाराज जी के दर्शन करने आया करते थे, 'मां' की भक्ति के साथ-साथ गुरु महाराज स्वामी श्री केशवानंद जी के भी कृपा पात्र हो गये। श्री विश्म्भर दयाल जी के छ्ह पुत्र थे, इन छ्ह पुत्रों पर महाराज का आशीर्वाद सदा विद्यमान रहा। परन्तु चतुर्थ पुत्र पर उनकी कृपा दृष्टि अत्यधिक रही और विधुभूषण नामक यह बालक आज स्वामी विद्यानंद जी महाराज के नाम से जाने जाते हैं।

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