वेदांग

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वेदांग / Vedang

'तस्मै स हो वाच। द्वै विद्ये वेदितब्ये इति ह स्म यद्ब्रह्म विद्यौ वदंति परा चैवोपरा च॥
तत्रापरा ॠग्वेदो यजुर्वेद: सामवेदोऽर्थ वेद: शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दोज्योतिषमिति। अथ परा यथा तदक्षरमधिगम्यते॥'*

'अर्थात मनुष्य को जानने योग्य दो विद्याएं हैं-परा और अपरा। उनमें चारों वेदों के शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष- ये सब 'अपरा' विद्या हैं तथा जिससे वह अविनाशी परब्रह्म तत्व से जाना जाता है, वही 'परा' विद्या है।'

शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य, हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते मुखं व्याकरणं स्मृतम्।
निरुक्त श्रौतमुच्यते, छन्द: पादौतु वेदस्य ज्योतिषामयनं चक्षु:॥

'कल्पौ वेद विहितानां कर्मणामानुपूर्व्येण कल्पनाशास्त्रम्।'

'अर्थात् 'कल्प' वेद प्रतिपादित कर्मों का भली-प्रकार विचार प्रस्तुत करने वाला शास्त्र है। कल्प में यज्ञों की विधियों का वर्णन होता है।'

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