वेद का स्वरूप

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वेद का स्वरूप / Structure of Ved
भारतीय मान्यता के अनुसार वेद सृष्टिक्रम की प्रथम वाणी है।[1] फलत: भारतीय संस्कृतिका मूल ग्रन्थ वेद सिद्ध होता है। पाश्चात्य विचारकों ने ऐतिहासिक दृष्टि अपनाते हुए वेद को विश्व का आदि ग्रन्थ सिद्ध किया। अत: यदि विश्वसंस्कृति का उद्गम स्त्रोत वेद को माना जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं है।

वेद शब्द और उसका लक्षणात्मक स्वरूप

शाब्दिक विधा से विश्लेषण करने पर वेद शब्द की निष्पत्ति 'विद-ज्ञाने' धातु से 'घञ्' प्रत्यय करने पर होती है।

वेद के भाग

विषय सूची

वेद के दो भाग मन्त्र और ब्राह्मण-

  1. करण मन्त्र,
  2. क्रियमाणानुवादि मन्त्र,
  3. अनुमन्त्रण मन्त्र और
  4. जपमन्त्र।

इनमें जिस मन्त्र के उच्चारणानन्तर ही कर्म किया जाता है, वह करण मन्त्र' है। यथा-याज्या पुरोऽनुवाक् आदि। कर्मानुष्ठान के साथ-साथ जो मन्त्र पढ़ा जाता है, वह 'क्रियमाणानुवादि मन्त्र' होता है। यथा-युवा सुवासा0 आदि। जब यज्ञ में यूप-संस्कार किया जाता है तभी यह मन्त्र पढ़ा जाता है। कर्म के ठीक बाद जो मन्त्र पढ़ा जाता है, वह 'अनुमन्त्रण मन्त्र' कहलाता है। यथा- एको मम एका तस्य योऽस्मान् द्वेष्टि0 आदि। यह मन्त्र द्रव्यत्याग रूप याग किये जाने के ठीक बाद यजमान द्वारा पढ़ा जाता है। इनके अतिरिक्त जो 'मयीदमिति यजमानो जपति'[16] इत्यादि वाक्यों द्वारा विहित सन्निपत्योपकारक[17]

मन्त्रों कें लक्षण

ब्राह्मण के दो भेद हैं

  1. विधि और
  2. अर्थवाद।
  1. उत्पत्तिविधि,
  2. गुणविधि या विनियोग विधि,
  3. अधिकारविधि और
  4. प्रयोगविधि। इनमें जो वाक्य 'यह कर्म इस प्रकार करना चाहिये' एवंविध कर्मस्वरूप-मात्र के अवबोधन में प्रवृत्त हैं, वे 'उत्पत्तिविधि' कहे जाते हैं, यथा-'अग्निहोत्रं जुहोति'। जो उत्पत्तिविधि से विहित कर्मसम्बन्धी द्रव्य और देवता के विधायक हैं, वे 'गुणविधि' ('विनियोगविधि') कहे जाते हैं। यथा- 'दध्रा जुहोति'। जो उन-उन कर्मों में किस का अधिकार है तथा किस फल के उद्देश्य से कर्म करना चाहिये- यह बतलाते हैं, वे 'अधिकारविधि' कहे जाते हैं। यथा- 'यस्याहिताग्नेरग्निर्गृहान् दहेत् सोऽग्नये क्ष्मावतेऽष्टाकपालं निर्वपेत्'। जो कर्मों के अनुष्ठानक्रमादिका बोधन कराते हैं, वे 'प्रयोगविधि' हैं। यहाँ यह ज्ञातव्य है कि प्रयोगविधि के वाक्य साक्षात उपलब्ध नहीं होते, अपितु प्रधान वाक्य (दर्शपूर्णमासाभ्याम्)- के साथ अंग-वाक्यों (सामधेयजति0)- की एकवाक्यता होकर कल्पित वाक्य (प्रमाणानुयाजादिभिरूपकृतवद्भ्यां दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत) ही प्रयोगविधि का परिचायक होता है।

अर्थवाद

आपस्तम्ब, पारस्कर आदि आचार्यों ने वेद के तीन ही भाग माने हैं- विधि, मन्त्र और अर्थवाद। अर्थ- संग्रहकारने वेद के पाँच भाग माने हैं- विधि, मन्त्र, नामधेय, निषेध और अर्थवाद।[33] नामधेय- जैसा कि संज्ञा से स्पष्ट हैं, नामधेय-प्रकरण में कतिपय नामों से जुड़े हुए विशेष भागों की आलोचना होती है। इनमें 'उद्भिदा यजेत पशुकाम:','चित्रया यजेत पशुकाम:','अग्निहोत्रं जुहोति', 'श्येनेनाभिचरन् यजेत'- ये चार वाक्य ही प्रमुख हैं। नामधेय विजातीय की निवृत्तिपूर्वक विधेयार्थ का निश्चय कराता है।[34] यथा- 'उद्भिदा यजेत पशुकाम:' इस वाक्य में पशु-रूप फल के लिये याग का विधान किया गया है। यह याग वाक्यान्तर से अप्राप्त है और इस वाक्य द्वारा विहित किया जा रहा है। यदि इस वाक्य से 'उद्भिद्' शब्द हटा दिया जाय तो 'यजेत पशुकाम:' यह वाक्य होगा, जिसका अर्थ है-'यागेन पशुं भावयेत्', किंतु इससे याग-सामान्य का विधान होगा जो कि अविधेय है, क्योंकि याग विशेष का नाम अभिहित किये बिना अनुष्ठान सम्भव नहीं है। 'उद्भिदा' पदद्वारा इस प्रयोजन की पूर्ति होती है, अत: 'उद्भिद्' याग का नाम हुआ तथा याग-विशेष का निर्देशक होने से विधेयार्थ-परिच्छेद भी हुआ। नामधेयत्व चार कारणों से होता है-(1) मत्वर्थ-लक्षणा के भय से, (2) वाक्य भेद के भय से, (3) तत्प्रख्यशास्त्र से और (4) तद्व्यपदेश से। निषेध- जो वाक्य पुरुष को किसी क्रिया को करने से निवृत्त कराता है, उसे 'निषेध' कहते हैं।[35] शास्त्रों ने नरकादिको अनर्थ माना है। इस नरक-प्राप्ति का हेतु कलञ्जभक्षणादि है, अत: पुरुष को ऐसे कार्यों से 'निषेध-वाक्य' निवर्तित करते हैं इस प्रकार अनर्थ उत्पन्न करने वाली क्रियाओं से पुरुष का निवर्तन कराना ही निषेध-वाक्यों का प्रयोजन है। मन्त्र-ब्राह्मणात्मक (विधिमन्त्र-नामधेय-निषेधार्थवाद-रूप) वेद में कतिपय विचारकों ने ब्राह्मणभाग को वेद नहीं माना है। उनके प्रधान तर्क ये हैं- (1)- ब्राह्मण-ग्रन्थ वेद नहीं हो सकते, क्योंकि उन्हीं का नाम इतिहास, पुराण, कल्प, गाथा और नाराशंसी भी है। (2)- एक कात्यायन को छोड़कर किसी अन्य ऋषि ने उनके वेद होने में साक्षी नहीं दी है। (3)- ब्राह्मण-भाग को भी यदि वेद माना जाय तो 'छन्दोब्राह्मणानि च तद्विषयाणि'[36] इत्यादि पाणिनि-सूत्र में 'छन्द:' शब्द के ग्रहण से ही ब्राह्मणों का भी ग्रहण हो जाने से अलग से 'ब्राह्मण' शब्द का उल्लेख करना व्यर्थ होगा। (4)- ब्राह्मण-ग्रन्थ चूँकि मन्त्रों के व्याख्यान हैं, अत: ईश्वरोक्त नहीं हैं, अपितु महर्षि लोगों द्वारा प्रोक्त हैं।


इसके समाधान में यह कहना अत्यन्त संगत है कि ऐतरेय, शतपथ आदि ब्राह्मणों को पुराण अथवा इतिहास नहीं कहा जाता; रामायण, महाभारत, विष्णु पुराण आदि को ही इतिहास, पुराण कहा जाता है। यदि पुरातन अर्थ के प्रतिपादक होने से तथा ऐतिहासिक अर्थ के प्रतिपादक होने से इनको पुराण-इतिहास कहा जायगा तो इस तरह की संज्ञा से 'वेद' संज्ञा का कोई विरोध नहीं है, 'वेद' संज्ञा के रहते हुए भी ब्राह्मण-भाग की पुराण-इतिहास संज्ञा भी हो सकती है। भारतीय दृष्टि से-भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ वेद से ज्ञात होता है।[37] अत: जिस प्रकार कम्बु-ग्रीवादि से युक्त एक ही पदार्थ के घट, कलश आदि अनेक नामधेय होने से कोई विरोध उपस्थित नहीं होता, उसी तरह एक ही ब्राह्मण-ग्रन्थ के वेद होने में और पुराण-इतिहास होने में कोई विरोध नहीं है।[38]

वेद का विभाजन

भारतीय वाड्मय में बतलाया गया है कि सृष्टि के प्रारम्भ में ऋग्यजु:साम-अथर्वात्मक वेद एकत्र संकलित था। सत युग, त्रेता युग तथा द्वापर युग की लगभग समाप्ति तक एकरूप वेद का ही अध्ययन-अध्यापन यथाक्रम चलता रहा।

द्वापर युग की समाप्ति के कुछ वर्षों-पूर्व महर्षि व्यास ने भावी कलि युग के व्यक्तियों की बुद्धि, शक्ति और आयुष्य के ह्रास की स्थिति को दिव्य-दृष्टि से जानकर ब्रह्मपरम्परा से प्राप्त एकात्मक वेद का यज्ञ-क्रियानुरूप चार विभाजन किया। इन चार विभाजनों में उन्होंने होत्र कर्म के उपयोगी मन्त्र एवं क्रियाओं का संकलन ऋग्वेद के नाम से, यज्ञ के आध्वर्यव कर्म (आन्तरिक मूलस्वरूप-निर्माण) के उपयोगी मन्त्र एवं क्रियाओं का संकलन यजुर्वेद के नाम से, औद्गात्र कर्म के उपयोगी मन्त्र एवं क्रियाओं का संकलन सामवेद के नाम से और शान्तिक-पौष्टिक अभिलाषाओं (जातविद्या)- के उपयोगी मन्त्र एवं क्रियाओं का संकलन अथर्ववेद के नाम से किया। इस विभाजन में भगवती श्रुति के वचन को ही आधार रखा गया। यहाँ यह ज्ञातव्य है कि सम्प्रति प्रवर्तमान वेद-शब्दराशि का वैवस्वत मन्वन्तर में कृष्ण द्वैपायन महर्षि व्यास द्वारा यह 28वाँ विभाजन है। अर्थात्

चार वेद और उनकी यज्ञपरकता

वेदविभागकर्ता व्यासोपाधि-विभूषित महर्षि कृष्णद्वैपायन ने यज्ञ-प्रयोजन की दृष्टि से वेद का ऋग्वेद-यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद-यह विभाजन प्रसारित किया; क्योंकि भारतीय चिन्तन में वेदों का अभिप्रवर्तन ही यज्ञ एवं उसके माध्यम से समस्त ऐहिकामुष्मिक फलसिद्धि के लिये हुआ है। वैदिक यज्ञों का रहस्यात्मक स्वरूप क्या है एवं साक्षात्कृतधर्मा ऋषियों ने किन बीजों द्वारा प्रकृति से अभिलषित पदार्थों का दोहन इस भौतिक यज्ञ के माध्यम से आविष्कृत किया, यह पृथक् विवेचनीय विषय है। यहाँ स्थूलदृष्टया यह जानना है कि प्रत्येक छोटे (इष्टि) और बड़े (सोम, अग्निचयन) यज्ञों में मुख्य चार ऋत्विक्- होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा होते हैं। बड़े यज्ञों में एक-एक के तीन सहायक और होकर सोलह ऋत्विक् हो जाते हैं, किंतु वे तीन सहायक उसी मुख्य के अन्तर्गत मान लिये जाते हैं। इनमें 'अध्वर्यु' नामक ऋत्विक् द्रव्य-देवतात्यागात्मक यज्ञस्वरूप का निर्माण यजुर्वेद से करता है। 'होता' नामक ऋत्विक् यज्ञ के अपेक्षित शस्त्र (अप्रगीत मन्त्रसाध्य स्तुति) एवं अन्य अंगकलापों का अनुष्ठान ऋग्वेद द्वारा तथा 'उद्गाता' नामक ऋत्विक् स्तोत्र (गेय मन्त्रसाध्य स्तुति) और उसके अंगकलापों का अनुष्ठान सामवेद द्वारा करता है।'ब्रह्मा' नामक चतुर्थ ऋत्विक् यज्ञिय कर्मों के न्यूनादि दोषों का परिहार एवं शान्तिक-पौष्टिक-आभिचारिकादि सर्वविध अभिलाषा-सम्पूरक कर्म अथर्ववेद द्वारा सम्पादित करता है। वेद-त्रयी- कतिपय अर्वाचीन वेदार्थ-विचारक 'सैषा त्रय्येव विद्या तपति' [39], 'त्रयी वै विद्या' [40], 'इति वेदास्त्रयस्त्रयी' इत्यादि वचनों के द्वारा वेद वस्तुत: तीन हैं तथा कालान्तर में अथर्ववेद को चतुर्थ वेद के रूप में मान्यता दी गयी-ऐसी कल्पना करते हैं, किंतु यह कल्पना भारतीय परम्परा से सर्वथा विपरीत है। भारतीय आचार्यों ने रचना-भेद की दृष्टि से वेदचतुष्टयी का त्रित्वमें अन्तर्भाव कर उसे लक्षित किया है।

रचना-शैली

रचना-शैली तीन ही प्रकार की होती है-

  1. गद्य,
  2. पद्य और
  3. गान। इस दृष्टि से-छन्द में आबद्ध, पादव्यवस्था से युक्त मन्त्र 'ऋक्' कहलाते हैं; वे ही गीति-रूप होकर 'साम' कहलाते हैं तथा वृत्त एवं गीति से रहित प्रश्लिष्टपठित (-गद्यात्मक) मन्त्र 'चजुष्' कहलाते हैं।[41] यहाँ यह ध्यातव्य है कि छन्दोबद्ध ऋग्विशेष मन्त्र ही अथर्वागिंरस हैं, अत: उनका ऋग्रूपा (पद्यात्मिका) रचना-शैली में ही अन्तर्भाव हो जाता है और इस प्रकार वेदत्रयी की अन्वर्थता होती है।


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै (श्वेताश्वतरोपनिषद 6।18)।
  2. वेद्यन्ते ज्ञाप्यन्ते धर्मादिपुरुषार्थचतुष्टयोपाया येन स वेद: (का0 श्रौ0 भू0, पृ0 4)।
  3. इष्टप्राप्त्यनिष्टपरिहारयोरलौकिकमुपायं यो ग्रन्थो वेदयति स वेद: (का0 भा0 भू0)।
  4. अपौरूषेयं वाक्यं वेद: (अर्थसंग्रह, पृ0 36)।
  5. अनुपलभ्यमानमूलान्तरत्वे सति महाजनपरिगृहीतवाक्यत्वं वेदत्वम्।
  6. मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्।
  7. वेदार्थपारिजात, पृ0 20।
  8. आम्राय: पुनर्मन्त्राश्च ब्राह्मणानि (कौ0 सू0 1।3)।
  9. अपि च यज्ञकर्मणि संहितयैव विनियुज्यन्ते मन्त्रा: (नि0 1।17 पर दुर्ग)।
  10. मन्त्रा मननात्।
  11. मननान्मनुशार्दूल त्राणं कुर्वन्ति वै यत:। ददते पदमात्मीयं तस्मान्मन्त्रा: प्रकीर्तिता:॥ (ई॰ स0, 3।7।9)।
  12. याज्ञिकानां समाख्यानं लक्षणं दोषवर्जितम्। तेऽनुष्ठानस्मारकादौ मन्त्रशब्दं प्रयुज्यते॥ (जै0न्या0मा0, 2।1।7)।
  13. प्रयोगसमवेतार्थस्मारका मन्त्रा: (अ0 स0, पृ0 157)।
  14. न तु तदुच्चारणमदृष्टार्थत्वम्, सम्भवति दृष्टफलकत्वेऽदृष्टकल्पनाया अन्यारूयत्वात् (अं0 सं0, मन्त्र-विचार-प्रकरण)।
  15. पुरुषविद्याऽनित्यत्वात् कर्मसम्पत्तिर्मन्त्रो वेदे (नि0 1।2।7)
  16. (का0 श्रौ0, 3। 4।12)
  17. मीमांसादर्शन के अनुसार अंग दो प्रकार के होते हैं-1-सिद्धरूप और 2-क्रियारूप। इनमें जाति, द्रव्य एवं संख्या आदि 'सिद्धरूप' हैं, क्योंकि इन सबका प्रयोजन प्रत्यक्ष (दिखायी देनेवाला) है। क्रियारूप अंग के दो भेद हैं- (1) गुणकर्म और (2) प्रधान कर्म। इनमें गुणकर्म को' सन्निपत्योपकारक' कहते हैं। 'सन्निपत्य द्रव्यादिषु सम्बध्य उपकुर्वन्ति तानि' अर्थात जो साक्षात न होकर किसी के माध्यम से मुख्य भाग के उपकारक होते हैं। यथा- 'व्रीह्यवघात एवं सेचनादि।' जो साक्षात रूप में प्रधान क्रिया के उपकारक होते हैं, उन्हें 'प्रधानकर्म' या 'आरादुपकारक' कहते हैं। होते हैं, वे 'जपमन्त्र' हैं। इनमें प्रथम त्रिविध मन्त्रों का अनुष्ठेयस्मारकत्व-रूप दृष्अ प्रयोजन है। जपमन्त्रों का अदृष्ट मात्र प्रयोजन है, ऐसा याज्ञिकों एवं मीमांसकों का सिद्धान्त है।
  18. बृहद्देवता- (1।34)।
  19. आप0 श्रौ0 सू0, (24। 1।34)।
  20. 'शेषे ब्राह्मणशब्द:'। (मी0 2।1।33)।
  21. 'ब्राह्मणनाम कर्मणस्तन्मन्त्राणाञ्च व्याख्याग्रन्थ:' (तै0 सं0 1।5।1 पर भाष्य)।
  22. 'वेदचतुष्टयमन्त्राणां कर्मसु विनियोजक: कर्मविधायको नानाविधानादीतिहासाख्यानबहुलो ज्ञानविज्ञानपूर्णो भागो ब्राह्मणभाग:। (श0ब्रा0भू0, पृ0 2)
  23. कर्मचोदना ब्राह्मणानि। ब्राह्मणशेषोऽर्थवाद: (आप0 परि0 34।35) 'चोदनेति क्रियाया: प्रवर्तकवचनमाहु:' (भाष्य)।
  24. तत्राज्ञातार्थज्ञापको वेदभागो विधि: (अ0 सं0, पृ0 36)
  25. ऋ0 भा0 भू0 विधिप्रामाण्य-विचार।
  26. ब्राह्मणशेषोऽर्थवाद:।
  27. प्राशस्त्यनिन्दान्यतरपरं वाक्यमर्थवाद: (अ0 सं0)।
  28. आम्नायस्य क्रियार्थत्वात्0 (जै0 सू0)।
  29. जै0 सू0 (1।2।7)
  30. स द्विविध:- विधिशेषो निषेधशेषश्चेति।
  31. विधिर्विधेयस्तर्कश्च वेद: (पा0 गृ0 सू0 2।6।6)।
  32. तर्कशब्देनार्थवादोऽभिधीयते। तर्क्यते ह्यनेन संदिग्धोऽर्थ: (पा0 गृ0 सू0 2।6।5 पर कर्क)।
  33. स च विधिमन्त्रनामधेयनिषेधार्थवादभेदात् पञ्चविध:।
  34. नामधेयानां च विधेयार्थपरिच्छेदकतयार्थवत्त्वम् (अ0 स0)।
  35. पुरुषस्य निवर्तकं वाक्यं निषेध: (अ0 स0)।
  36. पा0 सू0 (4।2।66)।
  37. भूंत भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात् प्रसिध्यति॥ (मनु0 12।97)।
  38. वेदार्थपारिजात।
  39. (श0 ब्रा0 10।3।6।2)
  40. (श0 ब्रा0 4।6।7।1)
  41. पादेनार्थेन चोपेता वृत्तबद्धा मन्त्रा ऋच:। गीतिरूपा मन्त्रा: सामानि। वृत्तगीतिवर्जितत्वेन प्रश्लिष्टपठिता मन्त्रा: यजूंषि।
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