वैशाली

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वैशाली / Vaishali

गंगा घाटी के नगर जो आज के बिहार एवं बंगाल प्रान्त के बीच सुशोभित हैं इनमें वैशाली का नाम आदर के साथ लिया जाता है। इस नगर का एक दूसरा नाम विशाला भी था। इसकी स्थापना महातेजस्वी विशाल नामक राजा ने की थी, जो भारतीय परम्परा के अनुसार इक्ष्वाकु-वंश में उत्पन्न हुए थे। इसकी पहचान मुजफ्फरपुर ज़िले में स्थित आधुनिक बसाढ़ से की जाती है। वहाँ के एक प्राचीन टीले को स्थानीय जनता अब भी 'राजा विशाल का गढ़' कहती है।

प्राचीन ग्रन्थों में

यह नगर एक दूसरे से कुछ अन्तर पर बनी हुई तीन दीवालों से घिरा था। इनमें से एक मिट्टी दूसरी ईंट तथा तीसरी पत्थर की बनी रही होगी। प्राचीन ग्रन्थों में वर्णन मिलता है कि नगर की किलेबन्दी यथासंभव इन तीनों कोटि की दीवालों से की जाय ताकि शत्रु के लिये नगर के भीतर पहुँचना असंभव हो सके। संभव है कि यह नगर तीन तरह की खाइयों से घिरा हो जिनका वर्णन कौटिल्य आदि ने किया है; जैसे सूखी खाई, जल तथा कीचड़ से भरी खाई। आशा है कि इस विषय पर वहाँ भविष्य में होने वाली खुदाइयों द्वारा प्रकाश पड़ेगा। इस नगर के केन्द्रीय भाग में वहाँ के शासक लिच्छवि लोग रहते थे। हुयेनसांग ने इस हिस्से को 'पैलेससिटी' (अर्थात वह भाग जहाँ पर राजमहल वर्तमान था) कहा है। इसका घेरा एक मील के लगभग था। अधिक सावधानी वरतने के लिये इसे भी सुरक्षा के साधनों से युक्त कर दिया गया था। इसके भीतर कुछ चुने हुए लोग ही प्रवेश कर पाते थे। शेष जनता को इसके बाहर बसाया गया था। हुयेनसांग के अनुसार पूरे नगर का घेरा 14 मील के लगभग था। इस स्थान पर उल्लेखनीय है कि नगर के विभाजन की यह प्रथा हड़प्पा की परम्परा का स्मरण दिलाती है, जो गंगा घाटी में प्रचलित थी। वहाँ भी विशिष्ट जनता दुर्ग वाले हिस्से में तथा साधारण जनता लघु नगर मे आबाद की गई थी।

शासन व्यवस्था

लिच्छवियों का शासन प्रजातंत्रात्मक आदर्शों पर आधारित था। कड़े से कड़े मसलों का निर्णय वे अपने सभागृह में बहुमत द्वारा करते थे। अवस्था की दृष्टि से वे कोई भेद भाव नहीं मानते थे। सबके राजनीतिक अधिकार एवं प्रभाव बराबर ही थे। इसकी खिल्ली उड़ाते हुय ललितविस्तर नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि लिच्छवि लोग अपने से ज्येष्ठ, वृद्ध या पद में उच्च व्यक्ति के प्रति भी कोई आदर या शिष्टाचार नहीं दिखाते थे। सबके सब अपने को राजा समझते थे। वे गौतम बुद्ध के बड़े ही भक्त थे। बौद्ध ग्रन्थों में वर्णन मिलता है कि इस नगर में आम्रपाली नामक एक वेश्या रहती थी, जो पुर के शोभा थी। साधारण वेश्याओं की तुलना में उसका स्थान ऊँचा था। बुद्ध के उपदेशों सें वह अत्यन्त प्रभावित थी।

नागरिकों का चरित्र

लिच्छवि उद्योगी एवं पुरुषार्थी समझे जाते थे। मगध नरेश अजातशत्रु तक को उनके विनाश की तैयारी में लोहे के चने चबाने पड़े थे। वे बड़े ही अतिथिपरायण थे। जब नगर में कोई भी नवागन्तुक आता था, तो उसका दिल खोल कर वे स्वागत करते थे। उत्सव एवं समारोह में वे ख़ूब भाग लेते थे। आभूषण एवं अच्छे वस्त्रों के वे शौक़ीन थे। घोड़े, हाथी या पालकी पर वे सज-धज कर आरूढ़ हो राजमार्गों पर निकलते थे। वे अपने सदाचार सम्बन्धी नियमों का पालन बड़ी ही कड़ाई के साथ करते थे। उनके समय में वैशाली में बौद्ध धर्म का प्रभाव काफ़ी फैल गया था। वहाँ के भिक्षुसंघ के नैतिक आदर्शों से वे प्रभावित रहे होंगे। वे व्यभिचार को सबसे बड़ा अपराध समझते थे। इस जुर्म में पकड़े हुये व्यक्ति को प्राणदण्ड तक दिया जाता था। इससे छूट केवल उन्हीं पुरुषों या महिलाओं को दी जाती थी, जो प्रायश्चित्त स्वरूप है कि उनके समय में यह नगर सुन्दर राजमार्गों, महलों, उद्यान सरोवर तथा मठ आदि से सुशोभित था।

लिच्छवियों में दोष

लिच्छवियों में दोष यह था कि उनमें जातिगत भावना परले दर्जे की थी। उन्होंने एक सरोवर बना रखा था, जिसमें नहाने का अधिकार एकमात्र लिच्छवि वंशज को ही था। उनका इतना आतंक था कि इसके जल को और कोई छ तक नहीं सकता था। यह सरोवर ऊपर से एक लोहे की जाली से ढका था, जिससे पशु पक्षी उसके पानी को दूषित नहीं कर सकते थे। बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर-निकाय के वर्णन से ऐसा लगता है कि कुछ लिच्छवि नवयुवक उद्दंड भी थे। वे कोठे अटारियों के ऊपर से नीचे सड़कों पर चलने वाली सुन्दरियों के ऊपर कभी-कभी धूल या गन्दा पदार्थ फेंक देते थे। इस प्रकार के दुर्व्यवहारों के कारण महिलाओं का घर से बाहर निकलना अत्यन्त दुष्कर हो जाता था। इस बात का स्पष्टीकरण यहाँ आवश्यक है कि इस तरह के नवयुवकों की संख्या अत्यल्प थी। अधिकांश लिच्छवि उदारचरित, शिष्ट एवं गुणसंम्पन्न थे।

मौर्यों से सम्बन्ध

गुप्तकाल में लिच्छवि-वंश की कन्या कुमारदेवी का विवाह चंद्रगुप्त प्रथम से हुआ था। इसी राजकुमारी के गर्भ से प्रतापी समुद्रगुप्त पैदा हुआ। कुमारदेवी के नाम का उल्लेख समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में हुआ है। राजनीतिक दृष्टि से यह विवाह संबन्ध महत्त्व से भरा हुआ था। इसके फलस्वरूप सम्पूर्ण लिच्छविराज्य गुप्त-राज्य में मिल गया। लगता है कि कुमारदेवी लिच्छवि-राज्य की एक मात्र वारिस रह गई थी। इस विवाह के स्मारक-रूप में चन्द्रगुप्त और कुमारदेवी दोनों के ही नाम पर सिक्के चलाये गये। ये सिक्के एक ही तरह के हैं। इन पर दोनों के नाम और चित्र तथा लिच्छवियों का उल्लेख मिलता है। वैशाली का नगर अब गुप्तों को प्राप्त हो गया। उन्होंने इसे तीरभुक्ति (तिरहुत प्रान्त) की राजधानी बना दी। वहाँ गुप्प वंशीय राजकुमार राज्यपाल की हैसियत से नियुक्त किये गये थे। इसकी पुष्टि पुरातत्वीय साक्ष्यों से भरपूर हो जाती है।

धार्मिक तीर्थ

बुद्ध को यह स्थान बड़ा ही प्रिय था, अतएव बौद्ध लोग इस नगर की गणना अपने धार्मिक तीर्थ के रूप में करने लगे। लगता है कि अशोक बौद्ध तीर्थों का पर्यटन करता हुआ इस नगर में भी आया था। उसने वहाँ एक स्तम्भ खड़ा किया, पर्यटन करता हुआ इस नगर में भी आया था। उसने वहाँ एक स्तम्भ खड़ा किया, जिसके शीर्षस्थान पर एक सिंह-प्रतिमा मिलती है। यह लाट चुनार के बालूदार पत्थर की बनी है। चीनी यात्रियों ने भी इस नगर का वर्णन किया है। फाहियान लिखता है कि इसके उत्तर की दिशा में एक उद्यान था, जिसमें एक दुमंज़िला भवन बना हुआ था। लिच्छवियों ने गौतम बुद्ध के विश्राम की सुविधा के लिए इसे बनवा रखा था। उसने इस नगर में तीन स्तूपों के वर्तमान होने का उल्लेख किया है। ये उन स्थानों पर बने हुये थे जो गौतम बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित थे। हुयेनसांग लिखता है कि इस नगर के आस-पास की ज़मीन बहुत ही उपजाऊ थी। उसमें केले, आम तथा तरह-तरह के फल-फूल पैदा होते थे। चीनी यात्री का यह कथन प्रामाणिक है। आज भी मुजफ्फरपुर ज़िले में, जहाँ वैशाली का नगर स्थित था, लीची, केले और आम की फ़सल बहुत अच्छी होती है। हुयेनसांग लिखता है कि लिच्छवि बड़े ही ईमानदार, सुशिक्षित तथा धर्मपरायण थे। अपनी जबान की रक्षा के लिये वे प्राणों की बाजी लगा देते थे। उसने अशोक निर्मित स्तम्भ का उल्लेख किया है। उसने भी वहाँ कई स्तूपों के होने का उल्लेख किया है, जिनमें बुद्ध तथा उनके प्रिय शिष्यों की अस्थियाँ गाड़ी गई थीं। जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर स्वामी का जन्म इसी नगरी में हुआ था। अतएव वे लोग इस पुरी को 'महावीर-जननी' कहते थे। वैशाली के नागरिक उनकी मृत्यु तिथि के अवसर पर रात्रि को दीपक जलाते थे।

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