रहीम

ब्रज डिस्कवरी, एक मुक्त ज्ञानकोष से
यहां जाएं: भ्रमण, खोज

अब्दुर्रहीम रहीम खानखाना / Abdurraheem Khankhana

अब्दुर्रहीम रहीम खानखाना

परिचय

अब्दुर्रहीम खाँ, खानखाना मध्ययुगीन दरबारी संस्कृति के प्रतिनिधि कवि थे। अकबरी दरबार के हिन्दी कवियों में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान है। ये स्वयं भी कवियों के आश्रयदाता थे। केशव, आसकरन, मण्डन, नरहरि और गंग जैसे कवियों ने इनकी प्रशंसा की है। ये अकबर के अभिभावक बैरम खाँ के पुत्र थे। इनका जन्म माघ कृष्ण पक्ष गुरुवार, सन 1556 ई॰ में हुआ था। जब ये कुल 5 वर्ष के ही थे, गुजरात के पाटन नगर में (1561 ई॰) इनके पिता की हत्या कर दी गयी। इनका पालन-पोषण स्वयं अकबर की देख-रेख में हुआ। इनकी कार्यक्षमता से प्रभावित होकर अकबर ने 1572 ई॰ में गुजरात की चढ़ाई के अवसर पर इन्हें पाटन की जागीर प्रदान की। अकबर के शासनकाल में उनकी निरन्तर पदोन्नति होती रही। 1576 ई॰ में गुजरात विजय के बाद इन्हें गुजरात की सूबेदारी मिली। 1579 ई॰ में इन्हें 'मीर अर्जु' का पद प्रदान किया गया। 1583 ई॰ में इन्होंने बड़ी योग्यता से गुजरात के उपद्रव का दमन किया। प्रसन्न होकर अकबर ने 1584 ई॰ में इन्हें' खानखाना' की उपाधि और पंचहज़ारी का मनसब प्रदान किया। 1589 ई॰ में इन्हें 'वकील' की पदवी से सम्मानित किया गया। 1604 ई॰ में शाहजादा दानियाल की मृत्यु और अबुलफजल की हत्या के बाद इन्हें दक्षिण का पूरा अधिकार मिल गया। जहाँगीर के शासन के प्रारम्भिक दिनों में इन्हें पूर्ववत सम्मान मिलता रहा। 1623 ई॰ में शाहजहाँ के विद्रोही होने पर इन्होंने जहाँगीर के विरुद्ध उनका साथ दिया। 1625 ई॰ में इन्होंने क्षमा याचना कर ली और पुन: 'खानखाना' की उपाधि मिली। 1626 ई॰ में 70 वर्ष की अवस्था में इनकी मृत्यु हो गयी।

पारिवारिक जीवन

विषय सूची

रहीम का पारिवारिक जीवन सुखमय नहीं था। बचपन में ही इन्हें पिता के स्नेह से वंचित होना पड़ा। 42 वर्ष की अवस्था में इनकी पत्नी की मृत्यु हो गयी। इनकी पुत्री विधवा हो गयी थी। इनके तीन पुत्र असमय में ही कालकवलित हो गये थे। आश्रयदाता और गुणग्राहक अकबर की मृत्यु भी इनके सामने ही हुई। इन्होंने यह सब कुछ शान्त भाव से सहन किया। इनके नीति के दोहों में कहीं-कहीं जीवन की दु:खद अनुभूतियाँ मार्मिक उद्गार बनकर व्यक्त हुई हैं।

भाषा

रचनाएं

इनका काव्य इनके सहज उद्गारों की अभिव्यक्ति है। इन उद्गारों में इनका दीर्घकालीन अनुभव निहित है। ये सच्चे और संवेदनशील हृदय के व्यक्ति थे। जीवन में आने वाली कटु-मधुर परिस्थितियों ने इनके हृदय-पट पर जो बहुविध अनुभूति रेखाएँ अंकित कर दी थी, उन्हीं के अकृत्रिम अंकन में इनके काव्य की रमणीयता का रहस्य निहित है। इनके 'बरवै नायिका भेद' में काव्य रीति का पालन ही नहीं हुआ है, वरन उसके माध्यम से भारतीय गार्हस्थ्य-जीवन के लुभावने चित्र भी सामने आये हैं। मार्मिक होने के कारण ही इनकी उक्तियाँ सर्वसाधारण में विशेष रूप से प्रचलित हैं। रहीम-काव्य के कई संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें-

  1. रहीम रत्नावली (सं0 मायाशंकर याज्ञिक-1928 ई॰) और
  2. रहीम विलास (सं0 ब्रजरत्नदास-1948 ई॰, द्वितीयावृत्ति) प्रामाणिक और विश्वसनीय हैं। इनके अतिरिक्त
  3. रहिमन विनोद (हि0 सा0 सम्मे0),
  4. रहीम 'कवितावली (सुरेन्द्रनाथ तिवारी),
  5. रहीम' (रामनरेश त्रिपाठी),
  6. रहिमन चंद्रिका (रामनाथ सुमन),
  7. रहिमन शतक (लाला भगवानदीन) आदि संग्रह भी उपयोगी हैं।

रहीम के दोहे

ज्यों सरितन सूख परे, कुआं खनावत लोग।।
कविवर रहीम कहते हैं कि यदि कोई दानी मनुष्य दरिद्र भी हो तो भी उससे याचना करना बुरा नहीं है क्योंकि वह तब भी उनके पास कुछ न कुछ रहता ही है। जैसे नदी सूख जाती है तो लोग उसके अंदर कुएं खोदकर उसमें से पानी निकालते हैं।

जहां काम आवै सुई, कहा करै तलवारि।।
कविवर रहीम के अनुसार बड़े लोगों की संगत में छोटों की उपेक्षा नहीं करना चाहिए क्योंकि विपत्ति के समय उनकी भी सहायता की आवश्यकता पड़ सकती है। जिस तरह तलवार के होने पर सुई की उपेक्षा नहीं करना चाहिए क्योंकि जहां वह काम कर सकती है तलवार वहां लाचार होती है।


रहीम एक सहृदय स्वाभिमानी, उदार, विनम्र, दानशील, विवेकी, वीर और व्युत्पन्न व्यक्ति थे। ये गुणियों का आदर करते थे। इनकी दानशीलता की अनेक कथाएं प्रचलित है। इनके व्यक्तित्व से अकबरी दरबार गौरवान्वित हुआ था और इनके काव्य से हिन्दी समृद्ध हुई है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

सहायक ग्रन्थ-

  1. अकबरी दरबार के हिन्दी कवि: डा॰ सरयूप्रसाद अग्रवाल;
  2. रहिमन विलास : ब्रजरत्नदास;
  3. रहीम रत्नावली : मायाशंकर याज्ञिक।

सम्बंधित लिंक

निजी टूल
नामस्थान
संस्करण
क्रियाएं
सुस्वागतम्
Mathura A District Memoir
टूलबॉक्स