वैशेषिक दर्शन की तत्त्व मीमांसा

Nayati
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वैशेषिक दर्शन की तत्त्व-मीमांसा

विषय सूची

  1. त्रिपदार्थवाद,
  2. षट्पदार्थवाद,
  3. दशपदार्थवाद तथा
  4. सप्तपदार्थवाद कहा जा सकता है।

न्याय और वैशेषिक समान तन्त्र माने जाते हैं। वैशेषिकसूत्र और न्यायसूत्र की रचना से पूर्व संभवत: आन्वीक्षिकी के अन्तर्गत इन दोनों शास्त्रों का समावेश होता रहा, किन्तु कालान्तर में न्यायशास्त्र में प्रमाणों के विवेचन को और वैशेषिक शास्त्र में प्रमेयों के विश्लेषण को प्रमुखता दी गई जिससे कि दोनों का विकास पृथक्-पृथक् रूप में हुआ। बाद के कतिपय प्रकरण ग्रन्थों में फिर इन दोनों शास्त्रों का समन्वय करने का प्रयास किया गया, पर वस्तुत: ऐसे उत्तरकालीन ग्रन्थों में भी कुछ न्यायप्रधान हैं और कुछ वैशेषिकप्रधान। न्याय के आचार्यों ने गौतम प्रवर्तित सोलह पदार्थों में वैशेषिकसम्मत सात प्रदार्थों का, तथा वैशेषिक के व्याख्याकारों ने वैशेषिकसम्मत सात पदार्थों में न्यायसम्मत सोलह पदार्थों का अन्तर्भाव करते हुए इन दोनों दर्शनों में समन्वय करने का प्रयत्न किया, किन्तु इससे इन दोनों दर्शनों की अपनी-अपनी विशिष्टता पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ा और दोनों शास्त्रों का पृथक्-पृथक् प्राधान्य आज भी बना हुआ है।

पदार्थ

वैशेषिक दर्शन में तत्त्व शब्द के स्थान पर पदार्थ शब्द को प्रयुक्त किया गया है। पदार्थ शब्द का व्युत्पत्तिमूलक* आशय यह है कि कोई भी ऐसी वस्तु, जिसकों कोई नाम दिया जा सके अर्थात जो शब्द से संकेतित की जा सके और इन्द्रिय-ग्राह्य हो वह अर्थ कहलाती है।* कतिपय विद्वानों के अनुसार जिस प्रकार हाथी के पद (चरण-चिह्न) को देखकर हाथी का ज्ञान किया जा सकता है, उसी प्रकार पद (शब्द) से अर्थ का ज्ञान होता है। वैशेषिकसूत्र में पदार्थ का लक्षण उपलब्ध नहीं होता। पदार्थ शब्द का प्रयोग भी सूत्रकार ने केवल एक बार किया है।*

अस्तित्व

अभिधेयत्व
अभिधान का आशय है- नाम या शब्द। शब्दों से जिसका उल्लेख हो सके, वह अभिधेय है।

ज्ञेयत्व

  1. पदार्थ सत है,
  2. पदार्थ अभिधेय है और
  3. पदार्थ ज्ञेय है। फिर भी परवर्ती कई ग्रन्थकारों ने इनमें से किसी एक को भी पदार्थ का समग्र लक्षण मानकर काम चला लिया।

पदार्थ संख्या

वैशेषिक में पदार्थों की संख्या के संदर्भ में प्रमुख रूप से चार सोपान या चार मत उपलब्ध होते हैं। उनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-
त्रिपदार्थवाद

षट्पदार्थवाद
वैशेषिकसूत्र में छ: पदार्थों का उल्लेख पूर्वोक्त रूप में उपलब्ध होता है। फिर भी कई विद्वानों का यह मत है कि सिद्धान्त के रूप में षट्पदार्थवाद की विधिवत स्थापना प्रशस्तपाद ने की। इस मान्यता के समर्थन में यह बात भी कही जाती है कि वैशेषिकसूत्र की चन्द्रानन्दवृत्ति और मिथिलावृत्ति में प्रथमाध्याय के प्रथम आह्निक के उस सूत्र की व्याख्या नहीं है, जो पदार्थ-गणना से सम्बद्ध माना जाता है।

सप्तपदार्थवाद
वैशेषिकसम्मत पदार्थमीमांसा के विकासक्रम के द्वितीय चरण में प्रशस्तपाद प्रभृति भाष्यकारों ने षट्पदार्थवाद को प्रतिष्ठापित कर दिया था। किन्तु षट्पदार्थी अवधारणा मुख्यत: भाव पदार्थों पर ही चरितार्थ होती है, अभाव पर नहीं। चन्द्रमति जैसे भाष्यकारों के ग्रन्थों से भी इस बात के संकेत मिलते हैं कि अभाव-पदार्थत्व के सम्बन्ध में शिवादित्य से पहले भी विचार होता रहा। फिर भी यह तो स्पष्ट ही है कि परम्परीण रूप से चर्चित और प्राय: पदार्थश्रृंखला में परिगणित होने के बाद भी अभाव का पदार्थत्व विवादास्पद रहता चला आ रहा था। शिवादित्य ने सप्तपदार्थी में अभाव को प्रतिष्ठित करके पदार्थों की संख्या विधिवत सात निर्धारित कर दी।
दशपदार्थवाद
चन्द्रमति (6ठी शती) ने दशपादार्थशास्त्र (दशपदार्थी) में

  1. द्रव्य,
  2. गुण,
  3. कर्म,
  4. सामान्य
  5. विशेष,
  6. समवाय,
  7. शक्ति,
  8. अशक्ति,
  9. सामान्य-विशेष तथा
  10. अभाव नामक दस पदार्थों का परिगणन किया। इनमें से छ: तो वैशेषिक परम्परा में पहले से ही स्वीकृत थे। बाकी चार का अवतरण चन्द्रमति ने किया। इन चारों में से शक्ति के पदार्थत्व का उल्लेख प्रभाकर मतानुयायी मीमांसकों ने भी किया।

इनमें से अभाव का समावेश तो शिवादित्य (10वीं शती) ने सप्तपदार्थी में कर दिया, किन्तु चन्द्रमति परिगणित शेष तीन का पदार्थत्व उत्तरवर्ती वैशेषिक परम्परा में स्वीकार्य नहीं हो पाया, संक्षेप में प्रस्तुत है कि शक्ति, अशक्ति और सामान्य-विशेष को पदार्थ मानने के पक्ष में चन्द्रमति आदि वैशेषिकों, आचार्यों और प्रभाकर मीमांसकों के क्या तर्क थे और अन्य आचार्यों ने उनको क्यों नहीं अपनाया?
शक्ति के पृथक् पदार्थत्व का निरसन
मीमांसकों का यह तर्क है कि शक्ति एक अतिरिक्त पदार्थ है। यह इस उदाहरण से सिद्ध होता है कि चन्द्रकान्तमणि की उपस्थिति या सन्निधि में आग और काष्ठ के संयोग से भी दाहक्रिया नहीं होती। इसके विपरीत यदि चन्द्रकान्तमणि की उपस्थिति या सन्निधि न हो तो दाहक्रिया हो जाती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि चन्द्रकान्तमणि की उपस्थिति में दाहक्रिया नहीं होती और अनुपस्थिति में हो जाती है। अत: शक्ति एक अतिरिक्त पदार्थ है। इस तर्क का खण्डन इस प्रकार किया जाता है कि यदि किसी वस्तु के समीप होने या न होने से शक्ति का उत्पाद और विनाश माना जाएगा तो इस प्रकार अनेक शक्तियाँ माननी पड़ेंगी। अत: इसकी अपेक्षा यह मानना अधिक उचित है कि अग्नि मात्र नहीं, अपितु उत्तेजक मणि के अभाव से विशिष्ट अग्नि ही दाह का कारण होती है। शक्ति के पदार्थत्व का खण्डन करते हुए शिवादित्य ने यह बताया कि शक्ति पृथक् पदार्थ नहीं, अपितु द्रव्यादि स्वरूप ही है। दृष्ट कारणों से ही दृष्ट कार्य की उत्पत्ति होती है। अत: अदृष्टि शक्ति को कारण मानना उचित नहीं है। एक ही कार्य की उत्पत्ति अनेक कारणों से भी हो सकती है। जैसे कि आग, काष्ठ के घर्षण से अथवा सूर्यकान्त मणि के प्रभाव से भी उत्पन्न हो सकती है। अत: दाह का कारण शक्ति नहीं, अपितु उत्तेजकाभाव विशिष्टमण्यभाव है।* अग्नि में रहने वाली शक्ति अग्नि के अतिरिक्त और कुछ नहीं हे, वह अग्नि ही है।
अशक्ति के पृथक् पदार्थत्व का निरसन
जैसे भाव पदार्थों के विपरीत अभाव का पदार्थत्व स्वीकार किया गया है, उसी प्रकार शक्ति के विपरीत अशक्ति को भी एक पदार्थ मानकर चन्द्रमति ने पदार्थों की गणना में इसका भी समावेश किया, किन्तु वैशेषिक की उत्तरवर्ती पदार्थमीमांसा पर इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा।
सामान्य-विशेष के पृथक् पदार्थत्व का निरसन

सादृश्य आदि के पृथक् पदार्थत्व का निरसन

  1. मध्यत्व परापरत्व का अभाव है,
  2. तमस् का अन्तर्भाव अभाव में हो जाता है,
  3. शक्ति द्रव्यादिस्वरूप है,
  4. विशेष्य विशेषण विशेष्यभावसम्बन्ध है,
  5. ज्ञातता ज्ञानविषयक सम्बन्ध के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं,
  6. सादृश्य उपाधि रूप है और
  7. लघुत्व गुरुत्व का अभाव है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि पदार्थों के अभिधान और संख्या के संबन्ध में वैशेषिक के आचार्यों और अन्य दार्शनिकों ने भी विभिन्न मत प्रस्तुत किये। किन्तु वैशेषिक पदार्थमीमांसा के विकासक्रम में अन्तत: शिवादित्य द्वारा निरूपित सप्तपदार्थवाद ही सर्वाधिक मान्य समझा गया।
वैशेषिक के सप्त पदार्थों में न्याय के सोलह पदार्थों का अन्तर्भाव
यों तो यह प्रश्न उठाना अनावश्यक सा है कि न्याय में परिगणित 16 पदार्थों का वैशेषिक में निर्दिष्ट 7 पदार्थों में कैसे अन्तर्भाव होता है, क्योंकि न्यायसूत्र में पदार्थों की नहीं, अपितु शास्त्रार्थ में उपयोगी विषयों की गणना की गई है। फिर भी, अन्तर्भाव की रूपरेखा निम्नलिखित रूप से सम्पन्न होती है।*

  1. द्रव्य(आत्मा) में- प्रमाण (प्रत्यक्ष कुछ आचार्यों के अनुसार गुण में), प्रयोजन, दृष्टान्त, हेत्वाभास (संदर्भानुसार गुण में भी), निग्रहस्थान (संदर्भानुसार) तथा सिद्धान्त का अन्तर्भाव माना जा सकता है।
  2. गुण (बुद्धि) में- अर्थ प्रमाण (अनुमान), संशय, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, छल और जाति को अन्तर्भूत किया जा सकता है।
  3. कर्म
  4. सामान्य
  5. विशेष
  6. समवाय— न्याय-वैशेषिक में समान है, किन्तु इनके वर्गीकरण और निरूपण में कुछ भेद है। वात्स्यायन के अनुसार न्याय के प्रमेयों का इनमें और इनका न्याय के प्रमेयों में अन्तर्भाव है। न्यायशास्त्र में इनकी चर्चा प्रमेयों के अन्तर्गत की गई है।
  7. अभाव में— निग्रहस्थान (अज्ञान, अप्रतिभा तथा विक्षेप) तथा अपवर्ग (दु:खों की आत्यन्तिक निवृत्ति) का अन्तर्भाव हो जाता है।

द्रव्य

वैशेषिकों ने पूर्वोक्त प्रकार से सात पदार्थों का उल्लेख किया है और ब्रह्माण्ड की समस्त वस्तुओं को सात वर्गों में वर्गीकृत किया है। पदार्थों की संख्या के सम्बन्ध में वैशेषिक के विभिन्न आचार्यों और विभिन्न दार्शनिकों में मतभेद हैं, द्रव्य का सामान्य स्वरूप, द्रव्यों के लक्षण और उनके प्रमुख भेदों का संक्षेप में उल्लेख करेंगे।
द्रव्य का लक्षण

द्रव्य है।* पृथ्वी आदि नौ द्रव्यों का इस लक्षण से युक्त होना ही उनका साधर्म्य है। इस लक्षण को कणादोत्तरवर्ती प्राय: सभी वैशेषिकों ने अपने द्रव्यपरक चिन्तन का आधार बनाया, किन्तु उनके विचारों में कहीं-कहीं कुछ अन्तर भी दिखाई देता है।

  1. कर्म का आश्रय है,
  2. गुणों का आश्रय है और
  3. कार्यों का समवायिकारण है।

द्रव्य के भेद
वैशेषिक में द्रव्य के पृथ्वी अप, तेज, वायु, आकाश, काल, दिक, आत्मा और मन ये नौ भेद माने गये हैं।*

पृथ्वी

  1. नित्य- परमाणुरूप और
  2. अनित्य परमाणुजन्य कार्यरूप।
  1. शरीर,
  2. इन्द्रिय और विषय के भेद से तीन प्रकार का द्रव्यारम्भकत्व माना जाता है।

अप् (जल)

तेज

विषय भेद से तीन प्रकार का द्रव्यारम्भकत्व (समवायिकारणत्व) माना जाता है।

  1. भौम- जो काष्ठ-इन्धन से उद्भूत, ऊर्ध्वज्वलनशील एवं पकाना, जलाना, स्वेदन आदि क्रियाओं को करने में समर्थ (अग्नि) है,
  2. दिव्य- जो जल से दीप्त होता है और सूर्य, विद्युत् आदि के रूप में अन्तरिक्ष में विद्यमान है,
  3. उदर्य- जो खाये हुए भोजन को रस आदि के रूप में परिणत करने का निमित्त (जठराग्नि) है;
  4. आकरज- जो खान से उत्पन्न होता है अर्थात् सुवर्ण आदि जो जल के समान अपार्थिव हैं और जलाये जाने पर भी अपने रूप को नहीं छोड़ते। पार्थिव अवयवों से संयोग के कारण सुवर्ण का रंग पीत दिखाई देता है। किन्तु वह वास्तविक नहीं है। सुवर्ण का वास्तविक रूप तो भास्वर शुक्ल है। पूर्वमीमांसकों ने सुवर्ण को पार्थिव ही माना है, तेजस नहीं। उनकी इस मान्यता को पूर्वपक्ष के रूप में रखकर इसका मानमनोहर, विश्वनाथ, अन्नंभट्ट आदि ने खण्डन किया है।*

वायु

  1. मुखनासिका से निष्क्रमण और प्रवेश करने के कारण प्राण,
  2. मल आदि को नीचे ले जाने के कारण अपान,
  3. सब ओर ले जाने से समान,
  4. ऊपर ले जाने से उदान और
  5. नाड़ी द्वारों में विस्तृत होने से व्यान कहलाता है।

आकाश

काल

  1. पर, अपर आदि प्रतीतियों का ,
  2. वस्तुओं की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश का,
  3. तथा क्षण, निमेष आदि प्रतीतियों का जो हेतु है, वह काल कहलाता है।

दिशा

आत्मा

मन

गुण का स्वरूप और भेद

  1. रूप,
  2. रस,
  3. गन्ध,
  4. स्पर्श,
  5. संख्या,
  6. परिमाण,
  7. पृथक्त्व,
  8. संयोग,
  9. विभाग,
  10. परत्व,
  11. अपरत्व,
  12. बुद्धि,
  13. सुख,
  14. दु:ख,
  15. इच्छा,
  16. द्वेष और
  17. प्रयत्न।
  1. गुरुत्व,
  2. द्रवत्व,
  3. स्नेह,
  4. संस्कार,
  5. धर्म,
  6. अधर्म और
  7. शब्द।
  1. लघुत्व,
  2. मृदुत्व,
  3. कठिनत्व और
  4. आलस्य को जोड़कर गुणों की संख्या 28 करने का प्रयत्न किया है।
  1. परत्व,
  2. अपरत्व और पृथक्त्व को अनावश्यक मानकर गुणों की संख्या 21 बताई है। किन्तु सामान्यतया यही माना जाता है कि वैशेषिक दर्शन में गुणों की संख्या 24 है। नव्यन्याय में परत्व, अपरत्व को विप्रकृष्टत्व और सन्निकृष्टत्व या ज्येष्ठत्व और कनिष्ठत्व में अन्तर्निहित मान लिया गया है और पृथक्त्व को अन्योन्याभाव का ही एक रूप बताया गया है। अत: नव्यनैयायिक 21 गुण मानते हैं। विश्वनाथ ने उपर्युक्त चौबीस गुणों का वर्गीकरण निम्नलिखित रूप से किया है-

आश्रयद्रव्यों की मूर्तामूर्तपरक

आश्रय-संख्यापरक
इन गुणों में से कुछ एक-एक द्रव्य में रहते हैं और कुछ एकाधिक द्रव्यों में। संयोग, विभाग, संख्या, अनेकाश्रित गुण हैं और अन्य एकाश्रित।
सामान्य-विशेषपरक
विश्वनाथ ने गुणों का वर्गीकरण

  1. सामान्य और
  2. विशेष रूप में भी किया है।

इन्द्रियग्राह्यतापरक
विश्वनाथ ने यह भी बताया है कि इन्द्रियग्राह्यता के आधार पर भी गुणों का निम्नलिखित रूप से वर्गीकरण किया जा सकता है-

  1. एकेन्द्रियग्राह्य- रूप, रस, गन्ध, स्पर्श तथा शब्द।
  2. द्वीन्द्रियग्राह्य- (चक्षु और त्वक् से) संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, द्रवत्व, स्नेह, वेग-संस्कार।
  3. अतीन्दिय- गुरुत्व, बुद्धि, सुख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म तथा भावना-संस्कार।

रूप का स्वरूप
केवल चक्षु द्वारा ग्रहण किये जाने वाले विशेष गुण को रूप कहते हैं। यहाँ पर ग्रहण का आशय है लौकिक प्रत्यक्ष-योग्य जाति का आश्रय। दृष्ट वस्तु में परिमाणवत्ता, व्यक्तता तथा अन्य गुणों से अनभिभूतता होनी चाहिए तभी उसका रूप चक्षुग्रह्यि होगा। 'चक्षुमात्रि' शब्द के प्रयोग का यह आशय है कि चक्षु से भिन्न बहिरिन्द्रिय द्वारा रूप का ग्रहण नहीं होता। अन्तरिन्द्रिय मन पर यह बात लागू नहीं होती। रूप पृथ्वी, जल और तेज इन तीनों द्रव्यों में रहता है और शुक्ल, नील, रक्त, पीत, हरित, कपिश और चित्र भेद से सात प्रकार का होता है।
रस का स्वरूप
जीभ से प्रत्यक्ष होने वाले गुण का नाम रस है। रस छ: प्रकार का होता है- मथुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त तथा कषाय। रस पृथ्वी और जल में रहता है। पृथ्वी में छ: प्रकार काजल रहता है, किन्तु जल में केवल मधुर रस रहता है और वह अपाकज होता है। चित्ररस की सत्ता को नैयायिकों ने स्वीकार नहीं किया, क्योंकि आँख किसी वस्तु के विस्तृत भाग के रूपों को एक साथ देख सकती है, किन्तु जिह्वाग्र एक समय एक ही रस का ग्रहण कर सकता है।
गन्ध का स्वरूप
घ्राण इन्द्रिय द्वारा ग्रहण किये जाने योग्य गुण को गन्ध कहते हैं। सुगन्ध और दुर्गन्ध के भेद से यह दो प्रकार का होता है और केवल पृथ्वी में रहता है और अनित्य है। सुगन्ध और दुर्गन्ध गम्य हैं। नैयायिकों ने चित्रगन्ध की सत्ता को भी स्वीकार नहीं किया। जल में गन्ध का जो आभास होता है, वह पृथ्वी के संयोग के कारण संयुक्त समवाय सम्बन्ध से होता है।
स्पर्श का स्वरूप
जिस गुण का केवल त्वचा से प्रत्यक्ष होता है, वह स्पर्श कहलाता है। स्पर्श तीन प्रकार का होता है और चार द्रव्यों में रहता हैं- शीत (जल में), उष्ण (तेज में) तथा अनुष्णाशीत (पृथ्वी और वायु में)। यह पृथ्वी, जल, तेज और वायु में रहता है। नव्य नैयायिक कठिन और सुकुमार को भी स्पर्श का भेद मानते है, जबकि प्राचीन नैयायिक उनको संयोग के अन्तर्गत समाविष्ट करते हैं।
संख्या का स्वरूप

  1. नित्य, जो पृथ्वी, जल, तेज और वायु के परमाणु तथा आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन इन नित्य पदार्थों में रहता है और
  2. अनित्य, जो अपने आश्रय घट-पट आदि के समवायि कारण तन्तु आदि अनित्य पदार्थों में रहता है। इन पदार्थों के नाश से तद्गत एकत्व भी नष्ट हो जाता है पट का रूप अपने समवायिकारणों के रूप से उत्पन्न होता है। द्वित्वादि नामक संख्या तो सभी द्रव्यों में अनित्य होती है।

परिमाण का स्वरूप
मान के व्यवहार अर्थात् दो सेर आदि नापने और तौलने के असाधारण कारण को परिमाण कहा जाता है। परिमाण नौ द्रव्यों में रहता है और अणु, महत, दीर्ष व हृस्व भेद से चार प्रकार का होता है। परिमाण का नित्य और अनित्य के रूप में भी वर्गीकरण किया जाता है। नित्य द्रव्यों में रहने वाला परिमाण नित्य और अनित्य द्रव्यों में रहने वाला परिमाण अनित्य होता है। कार्यगत परिमाण के तीन उपभेद हैं-

  1. संख्यायोनि,
  2. परिमाणयोनि तथा
  3. प्रचययोनि।
  4. पृथक्त्व का स्वरूप

पृथक्ता के व्यवहार के असाधारण कारण को पृथक्त्व कहा जाता है। यह दो प्रकार का होता है- जहाँ एक वस्तु में अन्य वस्तु से पृथक्त् प्रतीत होती हैं, वहाँ एक पृथक्त्व और जहां दो वस्तुओं में अन्य वस्तु या वस्तुओं से पृथक्ता प्रतीत होती है (जैसे घट और पट पुस्तक से पृथक् है) वहाँ द्विपृथक्त्व आदि। एक पृथक्त्व नित्य द्रव्य में रहता हुआ नित्य होता है और अनित्य द्रव्य में रहता हुआ अनित्य। द्विपृथक्त्य आदि सर्वत्र अनित्य ही होता है, क्योंकि उसका आधार द्वित्व आदि संख्या हे, जिसको अनित्य माना जाता है। 'यह घट उस घट से पृथक् है'- इस प्रकार का व्यवहार द्रव्यों के संबन्ध में प्राय: देखा जाता है। इस प्रकार की प्रतीति का निमित्त एक गुण माना जाता है। यही पृथक्त्व है। अन्योन्याभाव के आधार पर यह प्रतीति नहीं हो सकती, क्योंकि अन्योन्याभाव तो 'घट पट नहीं है' आदि ऐसे उदाहरणों पर चरितार्थ होता है, जिनमें तादात्म्य का अभाव है। इस प्रकार पृथक्त्व की प्रतीति भावात्मक है जबकि अन्योन्याभाव की प्रतीति अभावात्मक होती है।
संयोग का स्वरूप
जब दो द्रव्य इस प्रकार समीपस्थ होते हैं कि उनके बीच कोई व्यवधान न हो तो उनके मेल को संयोग कहते हैं। इस प्रकार संयोग एक सामान्य गुण है, जो दो द्रव्यों पर आश्रित रहता है। संयोग अव्याप्यवृत्ति होता है। उदाहरणतया पुस्तक और मेज का संयोग दो द्रव्यों से सम्बद्ध होता हे, किन्तु यह संयोग दोनों द्रव्यों को पूर्ण रूप से नहीं घेरता, केवल उनके एक देश में रहता है। मेज के साथ पुस्तक के एक पार्श्व का और पुस्तक के साथ मेज के एक भाग का ही संयोग होता है। संयोग को केवल व्यवधानाभाव नहीं कहा जा सकता, क्योंकि व्यवधानाभाव तो कुछ दूर पर स्थित द्रव्यों में भी हो सकता है। किन्तु संयोग में तो व्यवधानाभाव तो कुछ दूर पर स्थित द्रव्यों में भी हो सकता है। किन्तु संयोग में तो व्यवधानाभाव के साथ ही मेल होना भी आवश्यक है।

  1. अन्यतरकर्मज,
  2. उभयकर्मज और
  3. संयोगज-संयोगकर्मज।
  1. आश्रय का नाश और
  2. विभाग।
  1. अन्यतर कर्मज,
  2. उभयकर्मज और
  3. संयोगज।

विभाग का स्वरूप
परस्पर मिले हुए पदार्थों के अलग-अलग हो जाने से संयोग का जो नाश होता है, उसको विभाग कहते हैं। वह सभी द्रव्यों में रहता है। केशव मिश्र के अनुसार 'यह द्रव्य से विभक्त है'- इस प्रकार के अलगाव की प्रतीति का असाधारण कारण विभाग कहलाता हे। वह संयोगपूर्वक होता है और दो द्रव्यों में होता है। विभाग तीन प्रकार का माना गया है- अन्यतरकर्मज, उभयकर्मज और विभागज।
परत्व और अपरत्व का स्वरूप
'यह पर है, यह अपर है'- इस प्रकार के व्यवहार का असाधारण कारण परत्व एवं अपरत्व है। वे दो प्रकार के हैं- दिक्कृत और (ख) कालकृत।

  1. दिक्कृत परत्व-अपरत्व- एक ही दशा में स्थित दो द्रव्यों में 'यह द्रव्य इस द्रव्य के समीप है'- इस प्रकार के ज्ञान के सहयोग से दिशा और वस्तु के संयोग द्वारा समीपस्थ वस्तु में अपरत्व उत्पन्न होता है। अपरत्व की उत्पत्ति का साधन सन्निकर्ष है। इसी प्रकार 'यह द्रव्य इस द्रव्य से दूर है'– ऐसी बुद्धि के सहयोग से दिग्द्रव्य के संयोग से विप्रकृष्ट द्रव्य में परत्व उत्पन्न होता है। परत्व की उत्पत्ति का साधन विप्रकर्ष है।
  2. कालकृत परत्व और अपरत्व

वर्तमान काल को आधार मानकर दो वस्तुओं या व्यक्तियों में एक अनियत दिशा में स्थित युवक तथा वृद्धि शरीरों में 'यह (युवक शरीर) इस (वृद्धि शरीर) की अपेक्षा अल्पतर काल से सम्बद्ध' है- इस प्रकार वृद्धिरूप निमित्तकारण के सहयोग से कालशरीर-रूप असमवायिकारण से युवा मनुष्य के शरीररूप आश्रय में अपरत्व उत्पन्न होता है तथा यह (वृद्ध शरीर) इस (युवक शरीर) की अपेक्षा अधिक काल से सम्बन्ध रखता है' इस प्रतीति से वृद्ध शरीर में परत्व उत्पन्न होता है। यह ज्ञातव्य है कि दिक्कृत परत्वापरत्व एक दिशा में स्थित दो द्रव्यों में ही उत्पन्न हुआ करते हैं, भिन्न-भिन्न दिशाओं में स्थित द्रव्यों में नहीं, किन्तु कालकृत परत्वापरत्व के लिए पिण्डों का एक ही दिशा में स्थित होना आवश्यक नहीं है।
गुरुत्व का स्वरूप
गुरुत्व उस धर्मविशेष (गुण) को कहते हैं, जिसके कारण किसी द्रव्य का प्रथम पतन होता है। किसी वस्तु की ऊपर से नीचे की ओर जाने की क्रिया का नाम पतन है। पतन-क्रिया जिस वस्तु में होती है, वह वस्तु पतन का समवायिकारण होती है और स्वयं उस वस्तु का जो अपना भारीपन है वह उस वस्तु में संयोग, वेग या प्रयत्न का अभाव हो जाता है। अत: पतन का समवायिकारण कोइर न कोई द्रव्य होता है, असमवायिकारण गुरुत्व होता है। परमाणु का गुरुत्व नित्य होता है। परमाणु से भिन्न पृथ्वी और जल का गुरुत्व अनित्य होता है। पहली पतन-क्रिया से वस्तु में जो वेग उत्पन्न होता है, वह बाद की पतन-क्रिया का असमवायिकारण है। वृन्त से टूट कर भूमि पर पहुँचने तक फल में अनेक क्रियाएँ होती हैं। उनमें पहली पतन-क्रिया का असमवायिकारण फल का गुरुत्व होता है और बाद की पतनक्रियाओं का असमवायिकारण पहली पतन-क्रिया से उत्पन्न फलगत वेग होता है।
द्रवत्व का स्वरूप
किसी तरल वस्तु के चूने, टपकने या एक स्थान से दूसरे स्थान तक बहकर पहुँचने में अनेक स्पन्दनक्रियाएँ होती है। उनमें से प्रथम स्पन्दन का असमवायिकारण द्रवत्व (तरलता) कहलाता है, जो कि भूमि, तेज और जल में रहता है। घृत आदि पार्थिव द्रवत्व तथा सुवर्ण आदि में जो द्रवत्व है, वह नैमित्तिक (अग्निसंयोगजन्य) होता है, जब कि जल में जो द्रवत्व है वह स्वाभाविक है। पहली क्रिया के बाद की जो स्पन्दन क्रियाएँ होती हैं, उनका असमवायिकारण वेग होता है।
स्नेह का स्वरूप
'चिकनापन' नामक जो गुण है, वह स्नेह कहलाता है। वह केवल जल में रहता है। स्नेह ऐसा गुण है, जिसके कारण पृथक्-पृथक् रूप से विद्यमान कण या अंश पिण्ड रूप में परिणत हो जाते हैं। स्नेह दो प्रकार का होता है- नित्य और अनित्य। जल के परमाणुओं में नित्य होता है और कार्यरूप जल में अनित्य। अनित्य स्नेह कारण गुणपूर्वक होता है और तभी तक रहता है, जब तक उसका आश्रय द्रव्य द्वयणुक आदि रहता है।
शब्द (गुण) का स्वरूप
शब्द वह गुण है जिसका ग्रहण श्रोत्र के द्वारा किया जाता है। शब्द का आश्रय द्रव्य आकाश है। अत: यह आकाश का विशेष गुण भी कहा जाता है। शब्द दो प्रकार का होता है- ध्वन्यात्मक और वर्णात्मक। भेरी आदि से उत्पन्न शब्द ध्वन्यात्मक और कण्ठ से उत्पन्न शब्द वर्णात्मक कहलाता है। भेरी आदि दइश में उत्पन्न शब्द श्रोत्र तक कैसे पहुँचता है, इस सम्बन्ध में नैयायिकों ने मुख्यत: जिन दो न्यायों का उल्लेख किया है, वे हैं-

  1. वीचितरंगन्याय और
  2. कदम्बमुकुलन्याय।

बुद्धि का स्वरूप
गुणों में बुद्धि का भी परिगणन किया गया है। बुद्धि आत्मा का गुण है, क्योंकि आत्मा को ही मन तथा बाह्येन्द्रियों के द्वारा अर्थ का प्रकाश अर्थात ज्ञान होता है। सांख्य में बुद्धि को महततत्त्व कहा गया है किन्तु वैशेषिक यह मानते हैं कि बुद्धि ज्ञान का पर्याय है।

सुख का स्वरूप

  1. सामान्यसुख, जो कि प्रिय वस्तुओं की उपलब्धि, अनुषंग आदि से प्राप्त होता है;
  2. स्मृतिसुख, जो कि भूतकाल के विषयों के स्मरण से होता है,
  3. संकल्पज, जो अनागत विषयों के संकल्प से होता है और
  4. विद्या शमसन्तोषादिजन्यसुख, जो कि पूर्वोक्त तीन प्रकार के कारणों से भिन्न विद्या आदि से जन्य एक विशिष्ट सुख होता है।
  1. वैषयिक, जो सांसारिक वस्तुओं के भोग से मिलता है;
  2. मानसिक, जो कि इच्छित विषयों के अनुसरण से प्राप्त होता है;
  3. आभ्यासिक, जो किसी क्रिया के लगातार करते रहने से प्राप्त होता है; और
  4. आभिमानिक, जो वैदुष्य आदि धर्मों के आरोप की अनुभूति से प्राप्त होता है।

दु:ख का स्वरूप
गुणों में दु:ख की भी गणना की गई है। दु:ख साधारण: पीड़ा को कहते हैं, जिसको सामान्यत: कोई भी नहीं चाहता। न्यासूत्र में दु:ख की गणना बारह प्रमेयों में की गई है।
इच्छा का स्वरूप
केशव मिश्र ने राग को और अन्नंभट्ट ने काम को इच्छा कहा है। इच्छा का विस्तृत निरूपण प्रशस्तपादभाष्य में उपलब्ध होता है। सामान्यत: अप्राप्त को प्राप्त करने की अभिलाषा इच्छा कहलाती है, प्राप्ति की अभिलाषा अपने लिये हो चाहे दूसरे के लिए। यह आत्मा का गुण है। इसकी उत्पत्ति स्मृतिसापेक्ष या सुखादिसापेक्ष आत्ममन:संयोगरूपी असमवायिकरण से आत्मारूप समवायिकाकरण में होती हैं इसके दो प्रकार होते हैं: सोपाधिक तथा निरुपाधिक। सुख के प्रति जो इच्छा होती है, वह निरुपाधिक होती है और सुख के साधनों के प्रति जो इच्छा होती है, वह सोपाधिक होती है। इच्छा प्रयत्न, स्मरण, धर्म, अधर्म आदि का कारण होती है।
द्वेष का स्वरूप

  1. द्रोह- उपकारी के प्रति भी अपकार कर बैठना,
  2. मन्यु- अपकारी व्यक्ति के प्रति अपकार करने में असमर्थ रहने पर अन्दर ही अन्दर उत्पन्न होने वाला द्वेष,
  3. अक्षमा दूसरे के गुणों को न सह सकना अर्थात् असहिष्णुता,
  4. अमर्ष- अपने गुणों के तिरस्कार की आशंका से दूसरे में गुणों के प्रति विद्वेष,
  5. अभ्यसूया- अपकार को सहन करने में असमर्थ व्यक्ति के मन में चिरकाल तक रहने वाला द्वेष। यह सभी द्वेष पुन: स्वकीय और परकीय प्रकार से हो सकते हैं। स्वकीय द्वेष का ज्ञान मानस प्रत्यक्ष से और परकीय द्वेष का ज्ञान अनुमान आदि से होता है।

प्रयत्न का स्वरूप
अन्नंभट्ट ने 'कृति' को प्रयत्न कहा है। प्रशस्तपाद के अनुसार प्रयत्न, संरम्भ और उत्साह पर्यायवाची शब्द हैं। प्रयत्न दो प्रकार का होता है- (1) जीवनपूर्वक और (2) इच्छाद्वेषपूर्वक। सुप्तावस्था में वर्तमान प्राणी के प्राण तथा अपान वायु के श्वास-प्रश्वास रूप व्यापार को चलाने वाला और जाग्रदवस्था में अन्त:करण को बाह्य इन्द्रियों से संयुक्त करने वाला प्रयत्न जीवनयोनि प्रयत्न कहलाता है। इसमें धर्म तथा अधर्म रूप निमित्त कारण की अपेक्षा करने वाला आत्मा तथा मन का संयोग असमवायिकारण है। हित की प्राप्ति और अहित की निवृत्ति करानेवाली शरीर की क्रियाओं का हेतु इच्छा या द्वेषमूलक प्रयत्न कहलाता है। इसमें इच्छा अथवा द्वेषरूप निमित्त कारण की अपेक्षा करनेवाला आत्मा तथा मन का संयोग असमवायिकारण है।
धर्म और अधर्म का स्वरूप
अन्नंभट्ट ने विहित कर्मों से जन्य अदृष्ट को धर्म और निषिद्ध कर्मों से उत्पन्न अदृष्ट को अधर्म कहा है। केशवमिश्र के अनुसार सुख तथा दु:ख के असाधारण कारण क्रमश: धर्म और अधर्म कहलाते हैं। इनका ज्ञान प्रत्यक्ष से नहीं, अपितु आगम या अनुमान से होता है। अनुमान का रूप इस प्रकार होगा-देवदत्त के शरीर आदि देवदत्त के विशेष गुणों से उत्पन्न होते हैं (प्रतिज्ञा), क्योंकि ये कार्य होते हैं (प्रतिज्ञा), क्योंकि ये कार्य होते हुये देवदत्त के भोग के हेतु हैं। (हेतु), जैसे देवदत्त के प्रयत्न से उत्पन्न होने वाली वस्तु वस्त्र आदि (उदाहरण), इस प्रकार शरीर आदि का निमित्त होनेवाले विशेष गुण ही धर्म तथा अधर्म हैं।
संस्कार का स्वरूप

द्रव्यों में गुण-बोधक चक्र
भारतीय दर्शनसार नामक ग्रन्थ (पृ.240) में आचार्य बलदेव उपाध्याय ने कारिकावली के आधार पर द्रव्य में गुणों के अवस्थान की तालिका निम्नलिखित रूप से दी है-

पृथ्वी

जल

तेज

वायु

आकाश

काल

दिक्

ईश्वर

जीवात्मा

मन

स्पर्श

स्पर्श

स्पर्श

स्पर्श

संख्या

संख्या

संख्या

संख्या

संख्या

संख्या

संख्या

संख्या

संख्या

संख्या

परिमाण

परिमाण

परिमाण

परिमाण

परिमाण

परिमाण

परिमाण

परिमाण

परिमाण

परिमाण

पृथक्त्व

पृथक्त्व

पृथक्त्व

पृथक्त्व

पृथक्त्व

पृथक्त्व

पृथक्त्व

पृथक्त्व

पृथक्त्व

पृथक्त्व

संयोग

संयोग

संयोग

संयोग

संयोग

संयोग

संयोग

संयोग

संयोग

संयोग

विभाग

विभाग

विभाग

विभाग

विभाग

विभाग

वियोग

वियोग

वियोग

वियोग

शब्द

 

 

बुद्धि

बुद्धि

परत्व

परत्व

परत्व

परत्व

परत्व

 

 

 

इच्छा

इच्छा

अपरत्व

अपरत्व

अपरत्व

अपरत्व

अपरत्व

 

 

 

यत्न

यत्न

वेग

वेग

वेग

वेग

वेग

 

 

 

 

सुख

 

गुरुत्व

गुरुत्व

द्रवत्व

 

 

 

 

 

दु:ख

 

द्रवत्व

द्रवत्व

रूप

 

 

 

 

 

द्वेष

 

रूप

रूप

 

 

 

 

 

 

भावना

 

रस

रस

 

 

 

 

 

 

धर्म

 

गंध

स्नेह

 

 

 

 

 

 

अधर्म

 

14 गुण

14 गुण

11 गुण

9 गुण

6 गुण

5 गुण

5 गुण

8 गुण

14 गुण

8 गुण

कर्म का स्वरूप

कर्म का आशय है क्रिया या गति, जैसे चलना, फिरना आदि। कर्म मूर्त द्रव्य में ही रहता है।

  1. उत्क्षेपण,
  2. अपेक्षेपण,
  3. आकुंचन,
  4. प्रसारण तथा
  5. गमन।

ऊर्ध्व देश के साथ होने वाले संयोग के प्रति कारणभूत क्रिया उत्क्षेपण और अधोदेश के साथ होनेवाले संयोग के प्रति कारणभूत क्रिया अपक्षेपण कहलाती है। शरीर से सन्निकृष्ट संयोग का जनक कर्म आकुंचन तथा शरीर से विप्रकष्ट संयोग का जनक कर्म है- प्रसारण। इनके अतिरिक्त अन्य सब कर्म गमन कहलाते हैं। भ्रमण, रेचन आदि अन्य भी असंख्य कर्म हैं, किन्तु उनका गमन में ही अन्तर्भाव हो जाता है। उत्क्षेपण आदि कर्म नियत दिग्-देश-संयोगानुकूल होते हैं, जबकि भ्रमण, रेचन आदि अनियतदिग्देशसंयोगानुकूल होते हैं। इसके साथ ही यह भी ज्ञातव्य है कि उत्क्षेपण आदि इच्छा-सापेक्ष कर्म हैं, जब कि रेचन आदि पर यह नियम लागू नहीं होता। उदाहरण के रूप में गेंद को मैदान में पटकने के बाद जो उछाल उसमें आता है, वह उत्क्षेपण नहीं कहला सकता। क्योंकि वह उत्प्लवन स्वत: होता है, किसी की इच्छा से नहीं।

सामान्य का स्वरूप

  1. सामान्य अर्थात केवल अनुवृत्ति बुद्धि से सम्बद्ध सामान्य तथा
  2. सामान्यविशेष अर्थात अनुवृत्ति और व्यावृत्ति रूप उभयविध बुद्धि से सम्बद्ध सामान्य। सूत्रकार कणाद ने सामान्य का कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिया।

विशेष का स्वरूप

घट आदि से लेकर द्वयणुकपर्यन्त प्रत्येक वस्तु का परस्पर भेद अपने-अपने अवयवों के भेद से माना जाता है, किन्तु अवयवों के आधार पर भेद करते-करते और स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाते-जाते जब हम परमाणु तक पहुँचते हैं तो एक ऐसी भी स्थिति आ जाती है कि उसके भेद अवयव के आधार पर नहीं किये जा सकते, क्योंकि परमाणु का अवयव होता ही नहीं है। ऐसी स्थिति में परमाणु आदि का पारस्परिक भेद बताने के लिये वैशेषिक ने 'विशेष' नामक पदार्थ की कल्पना की है और न्याय के उत्तरवर्ती ग्रन्थों में भी उसकी चर्चा की गई है। संक्षेप में 'विशेष' के लक्षण में दो बातें मुख्य हैं।

  1. एक तो यह कि विशेष वस्तुओं में पारस्परिक व्यावर्तन का अन्तिम तत्त्व या धर्म है। विशेष का कोई विशेष नहीं होता अर्थात यह स्वतोव्यावर्तक अर्थात स्वयं को सबसे भिन्न करनेवाला भी होता है इसी लिए इसको 'अन्त्य विशेष' कहा जाता है।
  2. दूसरी बात यह है कि विशेष केवल नित्य द्रव्यों अर्थात पृथ्वी आदि चार प्रकाहर के अणुओं और आकाशादि चार विभु द्रव्यों में रहता है। 'विशेष अन्तिम होता है'- इस प्रकार का आशय यह है कि जैसे सबसे अधिक देश वाली 'जाति' को सत्ता कहा जाता है, उसी प्रकार ऐसे सबसे छोटे धर्म को जो केवल एक ही पदार्थ में रहे, विशेष कहा जाता है। सामान्य-विशेष की सर्वाधिक व्यापक अन्तिम सीमा का नाम सत्ता है और निम्नतम सीमा का नाम विशेष है। विशेष केवल एक पदार्थ में रहता है, अत: वह सामान्य नहीं हो सकता। वह केवल विशेष ही रहता है। 'विशेष नित्य द्रव्यों में रहता है'- इस कथन का यह आशय है कि घट आदि कार्यों का सूक्ष्म से सूक्ष्मतम रूप ढूँढ़ते-ढूँढ़ते हम अन्त में द्वयणुक तक पहुँचते हैं। द्वयणुक से भी सूक्ष्म 'अणु' है, वे अलग-अलग व्यक्ति हैं और नित्य हैं। विशेष उन्हीं भिन्न-भिन्न और नित्य व्यक्तियों में रहते हैं।

समवाय का स्वरूप

जिन दो पदार्थों में कोई विनश्यता की अवस्था को प्राप्त हुए बिना अपराश्रित ही रहता है, उनके बीच जो सम्बन्ध होता है, उसको समवाय कहते हैं। इन दो पदार्थों में से कोई एक पदार्थ (यथा पट) ही दूसरे (यथा तन्तु) पर आश्रित रहता है। दोनों का एक दूसरे पर आश्रित रहना आवश्यक नहीं है, क्योंकि उदाहरणतया तन्तु तो बिना पट के भी रह सकता है।

  1. अवयव और अवयवी में,
  2. गुण (रूप) और गुणी
  3. क्रिया और क्रियावान् में,
  4. जाति (घटत्व) और व्यक्ति (घट) में तथा
  5. विशेष और अधिकरण नित्य (आकाश, परमाणु आदि) द्रव्य में।

अभाव का स्वरूप

प्रत्येक प्रतीति किसी सद्वस्तु पर आधारित होती है। अत: अभावात्मक प्रतीति का भी कोई आश्रय है, उसी को अभाव कहते हैं। प्राचीन नैयायिकों और वैशेषिकों ने केवल भाव पदार्थों का उल्लेख किया थां किन्तु उत्तरवर्ती प्रकरणग्रन्थकारों ने भी न्याय-वैशेषिक परम्पराओं को संयुक्त रूप में आगे बढ़ाया है और उनके ग्रन्थों में अभाव का भी विश्लेषण किया गया है। वैसे पदार्थ के रूप में अभाव का प्रमुख रूप से प्रतिपादन शिवादित्य ने किया है।

वैसे अभाव का सामान्य अर्थ है- 'निषेध- मुखप्रमाणगम्यत्व' अर्थात् 'न' शब्द से अभिलाप किये जानेवाले ज्ञान का विषय।*

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